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सुलगते ईरान के बीच भारत को सता रहा किस बात का डर? अगर Khamenei की सरकार जाती है तो पाकिस्तान को नफा या नुकसान!

ईरान में भड़कते विरोध-प्रदर्शनों और बढ़ती हिंसा ने भारत की रणनीतिक चिंता बढ़ा दी है. नई दिल्ली को डर है कि अगर खामेनेई की सरकार कमजोर हुई या सत्ता परिवर्तन हुआ, तो चाबहार पोर्ट जैसे अहम प्रोजेक्ट और मध्य एशिया तक भारत की पहुंच खतरे में पड़ सकती है. वहीं, ईरान के कमजोर होने से पाकिस्तान को अप्रत्यक्ष फायदा मिल सकता है, क्योंकि क्षेत्र में संतुलन टूटेगा और उसकी पकड़ अफगानिस्तान व आसपास के इलाकों में बढ़ सकती है.

सुलगते ईरान के बीच भारत को सता रहा किस बात का डर? अगर Khamenei की सरकार जाती है तो पाकिस्तान को नफा या नुकसान!
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( Image Source:  Sora_ AI )
सागर द्विवेदी
By: सागर द्विवेदी

Published on: 14 Jan 2026 11:55 PM

ईरान के शहरों में आर्थिक बदहाली और राजनीतिक थकान से उपजे विरोध-प्रदर्शन अब केवल आंतरिक संकट नहीं रह गए हैं. सड़कों पर उतरती भीड़, बढ़ती हिंसा और सत्ता के खिलाफ गूंजते नारों के बीच भारत की नजर इन घटनाक्रमों पर बेहद सतर्कता से टिकी है. नई दिल्ली के लिए सवाल यह नहीं है कि ईरान का मौजूदा धार्मिक नेतृत्व इस संकट से उबर पाएगा या नहीं, बल्कि यह है कि अगर ईरानी राज्य कमजोर पड़ा या बिखर गया, तो भारत के पहले से सीमित रणनीतिक विकल्पों पर इसका क्या असर पड़ेगा?

टाइम्स ऑफ इंडिया में छपी रिपोर्ट के मुताबिक, भारत और ईरान के रिश्ते कभी विचारधारा से संचालित नहीं रहे. यह संबंध भूगोल, पहुंच और क्षेत्रीय संतुलन की मजबूरी से बने हैं. पाकिस्तान द्वारा अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक ज़मीनी रास्ते बंद किए जाने के बाद ईरान ही भारत के लिए पश्चिम की ओर खुलने वाला इकलौता व्यावहारिक गलियारा रहा है. साथ ही, ईरान लंबे समय से पाकिस्तान के क्षेत्रीय प्रभाव के खिलाफ एक संतुलनकारी शक्ति और भारत की वेस्ट एशिया नीति का अहम स्तंभ रहा है.

कमजोर ईरान, बढ़ती अनिश्चितता

अगर ईरान अचानक कमजोर होता है या सत्ता संरचना ढहती है, तो यह किसी साफ-सुथरे बदलाव में नहीं बदलेगा. बल्कि इससे अनिश्चितता का ऐसा दौर शुरू होगा, जब भारत पहले ही कई मोर्चों पर दबाव झेल रहा है. बांग्लादेश में अस्थिरता और अल्पसंख्यकों पर हमलों की खबरें, पाकिस्तान की पुरानी हरकतें, चीन का लगातार बढ़ता दखल और डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिका की अप्रत्याशित वैश्विक नीति. ईरान में किसी भी तरह का बड़ा झटका भारत की वर्षों से साधी गई व्यापारिक राहों, कूटनीतिक समीकरणों और सुरक्षा गणनाओं को प्रभावित कर सकता है.

मध्य एशिया का भारत का प्रवेशद्वार

दशकों से ईरान भारत के लिए अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुंचने का सबसे अहम ज़मीनी पुल रहा है. पाकिस्तान के इनकार के चलते तेहरान भारत की पश्चिमी कनेक्टिविटी रणनीति की रीढ़ बना. इस रणनीति का केंद्र है चाबहार पोर्ट, जिसे भारतीय सहयोग से विकसित किया गया. इसका मकसद था पाकिस्तान को बायपास कर सीधे ईरानी तट तक पहुंच बनाना और वहां से सड़क-रेल नेटवर्क के जरिए आगे बढ़ना. भारत के लिए चाबहार सिर्फ एक बंदरगाह नहीं, बल्कि यह संदेश था कि भूगोल ही किस्मत नहीं तय करता.

जेएनयू के प्रोफेसर राजन कुमार ने टाइम्स ऑफ इंडिया से बातचीत में कहा कि 'ईरान भारत के लिए मध्य एशिया तक पहुंचने का सबसे अहम ज़मीनी गलियारा बना हुआ है, क्योंकि पाकिस्तान भारत को ओवरलैंड मार्गों से पहुँच की अनुमति नहीं देता.' तालिबान की वापसी और प्रतिबंधों के कारण परियोजनाओं में रुकावट के बावजूद चाबहार की रणनीतिक अहमियत कम नहीं हुई है. अगर ईरान में लंबे समय तक अस्थिरता रही, तो ये परियोजनाएं खतरे में पड़ सकती हैं. कुमार चेतावनी देते हैं, 'खामेनेई के बाद संभावित सत्ता संघर्ष की स्थिति में चाबहार एक रणनीतिक संपत्ति के बजाय अस्थिरता का बंधक बन जाने का खतरा पैदा हो सकता है.'

पाकिस्तान के खिलाफ संतुलनकारी भूमिका

ईरान का महत्व केवल भूगोल तक सीमित नहीं रहा. मुस्लिम बहुल देश होने के बावजूद तेहरान ने कभी पाकिस्तान के भारत-विरोधी नैरेटिव को खुलकर समर्थन नहीं दिया. उलटे, ईरान ने हमेशा उन सुन्नी चरमपंथी संगठनों का विरोध किया है, जो शिया समुदाय और भारतीय हितों के लिए खतरा रहे हैं. 1990 और 2000 के दशक में जब पाकिस्तान तालिबान को समर्थन दे रहा था, तब भारत और ईरान एक ही पक्ष में खड़े थे. इस तालमेल ने पाकिस्तान को क्षेत्र में पूरी तरह हावी होने से रोका. प्रो. कुमार साफ शब्दों में कहते हैं कि 'अगर ईरान अंदरूनी तौर पर कमजोर पड़ता है या बिखरता है, तो इसका अप्रत्यक्ष फायदा पाकिस्तान को मिलेगा.'

शिया फैक्टर और भारत की वेस्ट एशिया नीति

ईरान दुनिया की सबसे बड़ी शिया शक्ति है और यही उसे सऊदी अरब जैसे सुन्नी-बहुल देशों से अलग भूमिका देता है. अगर ईरान का मौजूदा शिया नेतृत्व कमजोर पड़ता है या उसकी जगह कोई सुन्नी-झुकाव वाली सरकार आती है, तो पूरा वेस्ट एशिया संतुलन बदल सकता है. भारत ने वर्षों से तेहरान, रियाद, अबूधाबी, तेल अवीव और वॉशिंगटन, सभी से रिश्ते साधे हैं. यह बहु-संरेखण (multi-alignment) भारत की कूटनीतिक ताकत रहा है. कुमार कहते हैं कि 'पश्चिम एशिया में प्रमुख शिया शक्ति होने के नाते ईरान से भारत को चुपचाप रणनीतिक लाभ मिलता रहा है.'

क्या सत्ता परिवर्तन सब कुछ बदल देगा?

कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि सत्ता परिवर्तन का मतलब उदार सरकार नहीं होता. डॉ. अशोक शर्मा का कहना है कि 'भले ही सत्ता परिवर्तन हो जाए, इसका यह मतलब नहीं है कि अगली सरकार अपने आप उदार होगी या मूल रूप से अलग ही होगी.' भारत के लिए परिचित लेकिन कठोर व्यवस्था से निपटना, पूरी तरह अनिश्चित विकल्प से कहीं आसान रहा है.

व्यापार, निवेश और चाबहार का दांव

भारत-ईरान व्यापार भले ही सीमित हो, लेकिन अहम है. बीते सालों में यह 1.3 से 1.7 अरब डॉलर के बीच रहा है. भारत ने चाबहार और उससे जुड़े प्रोजेक्ट्स में 1 अरब डॉलर से ज्यादा निवेश किया है. किसी भी सत्ता परिवर्तन से इन निवेशों पर सीधा असर पड़ सकता है. ईरान-चीन 25 साल के रणनीतिक समझौते के बाद बीजिंग का असर तेजी से बढ़ा है. पश्चिमी प्रतिबंधों के चलते ईरान चीन पर और निर्भर हुआ है. अगर ईरान में अस्थिरता बढ़ती है, तो चीन वहां और मजबूत पकड़ बना सकता है, जिससे भारत की भूमिका और सीमित हो जाएगी.

पाकिस्तानवर्ल्‍ड न्‍यूज
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