बेल्जियम जन्मभूमि, भारत कर्मभूमि, नागरिकता भी ली... कौन हैं Jean Drèze जो दिल्ली प्रोटेस्ट में शामिल हुए, सरकार को कहा डरपोक
जीन द्रेज ने दिल्ली के जंतर-मंतर पर CJP के प्रदर्शन के दौरान भारी सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल उठाए और आरोप लगाया कि सरकार को लोगों के मतदान अधिकारों को लेकर जागरूक होने का डर है.
10 अक्टूबर 2026 शनिवार को दिल्ली के जंतर-मंतर पर CJP ने CEC के प्रमुख ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे को लेकर प्रदर्शन करने का ऐलान किया था. जिसमें इस प्रदर्शन के अब तक 3000 से अधिक लोगों को दिल्ली पुलिस ने हिरासत में ले लिया है वहीं अब इसी बीच दिल्ली के प्रोटेस्ट में विदेशी धरती पर पैदा हुए Jean Drèze शामिल हुए हैं और उन्होंने मोदी सरकार के खिलाफ हमला बोला दिया है.
बेल्जियम में जन्मे अर्थशास्त्री जीन द्रेज ने अपनी जिंदगी का बड़ा हिस्सा भारत में गरीबी, भूख, सामाजिक असमानता और आम लोगों के अधिकारों से जुड़े मुद्दों पर काम करते हुए बिताया है. भारत में रहने के दौरान उन्होंने यहां की नागरिकता भी हासिल की. वह सिर्फ एक अर्थशास्त्री नहीं, बल्कि देश की सामाजिक कल्याण नीतियों और खाद्य सुरक्षा से जुड़े विमर्श में अहम भूमिका निभाने वाले सामाजिक कार्यकर्ता भी हैं. शनिवार को दिल्ली के जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के प्रदर्शन के बीच जीन द्रेज की मौजूदगी ने उन्हें फिर चर्चा में ला दिया.
उन्होंने प्रदर्शन के आसपास भारी सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए इसे जरूरत से ज्यादा बल प्रदर्शन बताया. उनका आरोप था कि सरकार को हिंसा या सुरक्षा का डर नहीं, बल्कि इस बात का डर है कि लोगों को उनके वोट देने के अधिकार पर मंडराते खतरे का एहसास हो जाएगा. हालांकि, यह द्रेज का राजनीतिक आरोप है, कोई स्थापित तथ्य नहीं. आखिर कौन हैं जीन द्रेज, जिन्होंने बेल्जियम में जन्म लेने के बावजूद भारत को अपना घर बनाया और सामाजिक अधिकारों की बहस में लगातार सक्रिय रहे हैं?
जंतर-मंतर पर क्या बोले जीन द्रेज?
द्रेज ने कहा कि वह उन लोगों की ओर से बोल रहे हैं, जो सुरक्षा बलों की भारी तैनाती के कारण प्रदर्शन स्थल तक नहीं पहुंच पाए. उन्होंने इस व्यवस्था को जरूरत से कहीं ज्यादा बल का प्रदर्शन बताया. उनका आरोप था कि सरकार को हिंसा या सुरक्षा का खतरा नहीं, बल्कि इस बात का डर है कि देश के लोगों को यह समझ आ जाएगा कि उनका वोट देने का अधिकार छीना जा रहा है.
उनके बयान का सीधा संबंध SIR को लेकर चल रही बहस से था. प्रदर्शनकारी आरोप लगा रहे थे कि मतदाता सूची में बदलाव से लोगों के मतदान के अधिकार पर असर पड़ सकता है. दूसरी ओर, निर्वाचन आयोग की प्रक्रिया को लेकर उठाए गए आरोपों और उनके आधार का अलग-अलग सत्यापन जरूरी है. द्रेज का बयान इस मुद्दे पर उनका नजरिया और सरकार की कार्रवाई की आलोचना है, न कि किसी कथित साजिश का स्वतंत्र प्रमाण.
कौन हैं जीन द्रेज?
जीन द्रेज बेल्जियम में जन्मे भारतीय विकास अर्थशास्त्री, सामाजिक वैज्ञानिक और सामाजिक कार्यकर्ता हैं. उन्हें भारत में गरीबी, भुखमरी, खाद्य सुरक्षा, शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक कल्याण से जुड़े मुद्दों पर किए गए काम के लिए जाना जाता है. उनकी पहचान केवल अकादमिक शोध तक सीमित नहीं है; वह सरकारी नीतियों और आम लोगों के जीवन पर उनके असर को लेकर भी लंबे समय से सक्रिय रहे हैं.
द्रेज का जन्म 22 जनवरी 1959 को बेल्जियम के ल्यूवेन शहर में हुआ था. उनके पिता जैक्स द्रेज भी जाने-माने अर्थशास्त्री थे. जीन द्रेज ने गणितीय अर्थशास्त्र की पढ़ाई की और बाद में दिल्ली स्थित भारतीय सांख्यिकी संस्थान (ISI) से पीएचडी की. इसके बाद उनका अकादमिक और सामाजिक काम भारत के विकास संबंधी सवालों से गहराई से जुड़ गया.
बेल्जियम छोड़कर भारत आए, 2002 में मिली नागरिकता
जीन द्रेज साल 1979 में भारत आए थे. इसके बाद उन्होंने यहां रहकर गरीबी, असमानता और सामाजिक कल्याण से जुड़े मुद्दों पर शोध और जमीनी स्तर पर काम किया. भारत में लंबे समय तक रहने के बाद उन्होंने साल 2002 में भारतीय नागरिकता हासिल की. भारतीय नागरिकता लेने के बाद उन्हें बेल्जियम की नागरिकता छोड़नी पड़ी थी.
यही वजह है कि जीन द्रेज की कहानी में बेल्जियम में जन्म और भारत को कर्मभूमि बनाने का पहलू खास है. उन्होंने अपने अकादमिक ज्ञान का इस्तेमाल भारत में सामाजिक और आर्थिक चुनौतियों को समझने के लिए किया. उनका काम इस सवाल पर केंद्रित रहा है कि आर्थिक विकास का लाभ समाज के गरीब और वंचित तबकों तक किस तरह पहुंचे.
अमर्त्य सेन के साथ किया काम, भूख और गरीबी पर शोध
जीन द्रेज ने नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन के साथ भी काम किया है. दोनों ने भूख, अकाल, गरीबी और सामाजिक सुरक्षा जैसे विषयों पर लेखन और शोध किया. द्रेज का काम इस बात पर जोर देता रहा है कि भूख और गरीबी को केवल अनाज या आय की कमी के रूप में नहीं देखा जा सकता. इनके पीछे रोजगार, सार्वजनिक वितरण व्यवस्था, स्वास्थ्य, शिक्षा और सरकारी नीतियों की भूमिका भी महत्वपूर्ण होती है. उन्होंने अर्थशास्त्री एंगस डीटन सहित दूसरे विद्वानों के साथ भी काम किया है. उनके शोध और लेखन में यह समझने की कोशिश की गई है कि सरकारी योजनाएं आम लोगों तक कितनी प्रभावी तरीके से पहुंचती हैं और उनके क्रियान्वयन में कहां कमियां रह जाती हैं.
मनरेगा और सूचना के अधिकार से क्या रहा जुड़ाव?
जीन द्रेज का नाम भारत में सामाजिक कल्याण से जुड़ी कई महत्वपूर्ण नीतिगत बहसों के साथ जुड़ा रहा है. वह महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) और सूचना के अधिकार (RTI) जैसे मुद्दों पर हुए विमर्श में सक्रिय रहे. मनरेगा का उद्देश्य ग्रामीण परिवारों को मांग के आधार पर मजदूरी वाला रोजगार उपलब्ध कराना है, जबकि सूचना का अधिकार कानून नागरिकों को सरकारी कामकाज से संबंधित जानकारी मांगने का अधिकार देता है.
द्रेज ने रोजगार, खाद्य सुरक्षा और सामाजिक जवाबदेही से जुड़े अधिकारों की वकालत की. वह इस बात पर जोर देते रहे हैं कि सरकारी योजनाओं का आकलन केवल कागजों पर दर्ज उपलब्धियों से नहीं, बल्कि लोगों के जीवन में आए बदलावों से होना चाहिए.
वह भारत में राइट टू फूड अभियान से भी जुड़े रहे हैं. इस अभियान में भोजन और पोषण की सुरक्षा को सामाजिक अधिकार के रूप में देखने तथा सार्वजनिक वितरण प्रणाली और कल्याणकारी योजनाओं को मजबूत बनाने की मांग की जाती रही है. शिक्षा की स्थिति पर तैयार की गई चर्चित PROBE रिपोर्ट के सह-लेखन में भी उनका योगदान रहा है.
दिल्ली प्रोटेस्ट में उनकी मौजूदगी क्यों अहम है?
जीन द्रेज की मौजूदगी इसलिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि वह लंबे समय से सामाजिक अधिकारों और सरकारी नीतियों के प्रभाव पर सवाल उठाते रहे हैं. CJP के प्रदर्शन में उन्होंने मतदाता सूची के पुनरीक्षण और भारी सुरक्षा व्यवस्था को लेकर अपनी चिंता जाहिर की.
हालांकि, द्रेज की आर्थिक और सामाजिक नीतियों पर विशेषज्ञता को चुनावी प्रक्रिया से जुड़े हर आरोप की पुष्टि नहीं माना जा सकता. SIR को लेकर उठे सवालों का आकलन निर्वाचन आयोग के रिकॉर्ड, मतदाता सूची में हुए बदलावों और संबंधित पक्षों के जवाब के आधार पर किया जाना चाहिए.
उनका बयान इस व्यापक बहस का हिस्सा है कि लोकतंत्र में चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता और शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन के अधिकार को किस तरह सुनिश्चित किया जाए. जीन द्रेज ने जंतर-मंतर पर इसी सवाल को उठाते हुए सुरक्षा व्यवस्था की आलोचना की और दावा किया कि सरकार को लोगों के मतदान अधिकारों को लेकर जागरूक होने का डर है.
कुल मिलाकर, बेल्जियम में जन्मे जीन द्रेज ने भारत में चार दशक से अधिक समय बिताते हुए गरीबी, भूख, शिक्षा, रोजगार और सामाजिक अधिकारों पर काम किया है. भारतीय नागरिकता लेने के बाद भी उनका सार्वजनिक जीवन सामाजिक कल्याण और नीतिगत बहसों से जुड़ा रहा. दिल्ली के CJP प्रदर्शन में उनकी मौजूदगी ने एक बार फिर उन्हें चर्चा में ला दिया है.




