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जब खून से लाल हो गई थी जलियांवाला बाग की मिट्टी, आज 106 साल बाद भी जिंदा है जख्म

13 अप्रैल 1919 को अमृतसर के जलियांवाला बाग में शांतिपूर्ण सभा कर रहे निहत्थे लोगों पर जनरल डायर ने अंधाधुंध गोलियां चलवाईं. बैसाखी की खुशियां मातम में बदल गईं. सैकड़ों लोग मारे गए, कई कुएं में कूदकर जान बचाने की कोशिश में मारे गए. इस नरसंहार ने भारत की आज़ादी की लड़ाई को निर्णायक मोड़ दिया और ब्रिटिश राज की क्रूरता को बेनकाब कर दिया.

जब खून से लाल हो गई थी जलियांवाला बाग की मिट्टी, आज 106 साल बाद भी जिंदा है जख्म
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नवनीत कुमार
Edited By: नवनीत कुमार3 Mins Read

Published on: 13 April 2025 7:13 AM

आज 13 अप्रैल 2025 को जलियांवाला बाग हत्याकांड की 106वीं बरसी है. यह घटना सिर्फ इतिहास नहीं, एक चेतावनी है कि आज़ादी यूं ही नहीं मिली. इसकी कीमत हजारों मासूमों के खून से चुकाई गई है. जलियांवाला बाग की मिट्टी अब एक स्मारक है, लेकिन उस दिन की चीखें, आंसू और खून आज भी हर भारतवासी के दिल में दर्ज हैं. यह दिन हमें हर साल याद दिलाता है कि स्वतंत्रता का मतलब सिर्फ आज़ाद हवा में सांस लेना नहीं, बल्कि उसकी रक्षा करना भी है.

13 अप्रैल 1919 का दिन, जो पंजाब और उत्तर भारत में पारंपरिक रूप से खुशी और फसल का पर्व ‘बैसाखी’ मनाया जा रहा था. ये साल एक भयानक नरसंहार की वजह से इतिहास के सबसे काले दिनों में दर्ज हो गया. अमृतसर के जलियांवाला बाग में हजारों लोग इकट्ठा हुए थे. कुछ त्योहार के लिए, कुछ अपने नेताओं की गिरफ्तारी के खिलाफ शांतिपूर्ण विरोध जताने के लिए. लेकिन उन्हें नहीं पता था कि इस सभा पर मौत मंडरा रही है.

फौज से चलवाई गोलियां

ब्रिटिश ब्रिगेडियर जनरल रेजिनॉल्ड डायर को जैसे ही इस सभा की खबर लगी, उसने अपनी फौज के साथ बाग को घेर लिया. बिना चेतावनी दिए उसने गोलियां चलवानी शुरू कर दीं. जलियांवाला बाग चारों तरफ से बंद था और केवल एक संकरा रास्ता ही बाहर जाने का था जिसे डायर ने खुद अपने सैनिकों से घेर रखा था. लोग न भाग पाए, न छिप पाए. देखते ही देखते बाग चीखों से गूंज उठा और मिट्टी खून से सन गई.

गोलियों की बौछार और चीखों का सन्नाटा

करीब 10-15 मिनट तक गोलियां चलती रहीं. रिपोर्ट्स के अनुसार लगभग 1650 राउंड गोलियां चलाई गईं. बहुत से लोग भगदड़ में कुचले गए, कई कुएं में कूद गए जहां से 120 शव निकाले गए. मरने वालों की आधिकारिक संख्या 379 बताई गई, लेकिन स्वतंत्र स्रोतों और समिति की रिपोर्टों के अनुसार 500 से अधिक लोग मारे गए. कर्फ्यू के कारण घायल लोग इलाज तक नहीं पा सके, वे वहीं तड़प-तड़प कर दम तोड़ते रहे.

शांतिपूर्ण सभा बनी नरसंहार का शिकार

जलियांवाला बाग में उस दिन दो प्रस्तावों पर चर्चा होनी थी. पहला 10 अप्रैल को अमृतसर में हुए गोलीकांड की निंदा, और दूसरा डॉक्टर सत्यपाल व सैफुद्दीन किचलू जैसे नेताओं की रिहाई की मांग. यह सभा किसी हिंसक आंदोलन का हिस्सा नहीं थी, बल्कि ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ लोकतांत्रिक विरोध का स्वर थी. लेकिन डायर ने इसे विद्रोह मानकर निर्दोषों पर गोलियां बरसाईं, जिसमें महिलाएं, बच्चे और बुज़ुर्ग तक नहीं बचे.

हंटर कमीशन और ब्रिटिश बेपरवाही

विश्वभर में इस घटना की निंदा हुई. ब्रिटिश सरकार ने जांच के लिए ‘हंटर कमीशन’ की नियुक्ति की. जनरल डायर ने खुलकर कहा कि वह पहले से ही जानता था कि उसे गोली चलानी है और उसने तोपें भी मंगवाई थीं, जो रास्ता तंग होने के कारण बाग में लाई नहीं जा सकीं. बावजूद इसके, उसे कोई सज़ा नहीं दी गई. उल्टे उसे पदोन्नत करके कर्नल बना दिया गया और ‘रिटायरमेंट’ की सूची में डाल दिया गया.

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