वंदे मातरम न गाना अपराध नहीं, फिर अपमान कैसे बनता है क्राइम? समझिए कानून का पूरा फर्क
वंदे मातरम न गाना कब अपराध नहीं और अपमान कब बन सकता है क्राइम? जानिए Bijoe Emmanuel Case, National Honour Act और freedom of conscience का पूरा कानूनी फर्क.
राष्ट्रीय गीत का सम्मान करना और उसे हर हाल में गाना, क्या कानून की नजर में एक ही बात है? करीब चार दशक पहले सुप्रीम कोर्ट के सामने ऐसा ही सवाल राष्ट्रगान को लेकर आया था. तीन स्कूली बच्चों ने अपनी धार्मिक मान्यता के कारण ‘जन गण मन...’ नहीं गाया, लेकिन राष्ट्रगान के दौरान सम्मानपूर्वक खड़े रहे. सुप्रीम कोर्ट ने उनके पक्ष में फैसला देते हुए कहा कि सिर्फ राष्ट्रगान न गाना अपने आप में उसका अपमान नहीं है. लेकिन अगर कोई व्यक्ति जानबूझकर राष्ट्रगान या उसके गायन में बाधा डालता है, तो स्थिति अलग हो जाती है. यही ‘न गाना’ और ‘अपमान करना’ का कानूनी फर्क आज वंदे मातरम के विवाद में भी महत्वपूर्ण हो गया है. समझें क्या है पूरा मामला?
क्या राष्ट्र गान या गीत न गाना अपराध है?
1986 के बिजो इमैनुएल बनाम केरल सरकार मामले में सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया था कि ऐसा कोई कानून नहीं है जो प्रत्येक नागरिक को राष्ट्रगान गाने के लिए मजबूर करता हो. मामले में तीन बच्चे- बिजो इमैनुएल, बिनु मोल और बिंदु इमैनुएल ने अपनी धार्मिक मान्यता के कारण राष्ट्रगान नहीं गाते थे. लेकिन जब राष्ट्रगान बजता था, तब वे सम्मानपूर्वक खड़े रहते थे. स्कूल ने उन्हें इसी वजह से निष्कासित कर दिया था.
मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तो अदालत ने बच्चों के मौलिक अधिकारों को ध्यान में रखते हुए, उनका निष्कासन रद्द कर दिया. कोर्ट ने माना कि बच्चों ने राष्ट्रगान के दौरान कोई व्यवधान नहीं डाला और न ही किसी दूसरे व्यक्ति को राष्ट्रगान गाने से रोका. इसलिए केवल उनका खुद राष्ट्रगान नहीं गाना, राष्ट्रगान के अपमान के बराबर नहीं माना जा सकता.
बिजो इमैनुएल कौन थे?
बिजो इमैनुएल के नाम से चर्चित यह मामला वास्तव में तीन भाई-बहनों से जुड़ा था. वे Jehovah's Witnesses धार्मिक समुदाय से संबंधित थे. उनकी धार्मिक मान्यता के कारण वे राष्ट्रगान नहीं गाते थे. हालांकि, राष्ट्रगान के समय वे खड़े होकर सम्मान प्रकट करते थे.
स्कूल ने इसे अनुशासनहीनता माना और बच्चों को स्कूल से निकाल दिया. केरल हाईकोर्ट से राहत नहीं मिलने के बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा. 11 अगस्त 1986 को जस्टिस ओ. चिनप्पा रेड्डी और जस्टिस एम.एम. दत्त की पीठ ने फैसला सुनाते हुए बच्चों को राहत दी.
सुप्रीम कोर्ट ने क्या मानदंड तय किया?
सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) में मिले अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और अनुच्छेद 25(1) में मिले अंतरात्मा तथा धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार को महत्वपूर्ण माना. अदालत ने यह भी देखा कि संविधान के अनुच्छेद 51-A(a) के तहत नागरिकों का कर्तव्य है कि वे राष्ट्रगान का सम्मान करें.
लेकिन अदालत ने सम्मान और गायन को एक ही चीज नहीं माना. कोर्ट के अनुसार यदि कोई व्यक्ति राष्ट्रगान के समय सम्मानपूर्वक खड़ा रहता है और गायन में बाधा नहीं डालता, तो सिर्फ उसके न गाने को राष्ट्रगान का अपमान नहीं कहा जा सकता.
अपमान और न गाने में फर्क क्या?
यही इस पूरे मामले का सबसे अहम कानूनी बिंदु है. न गाना एक बात है और राष्ट्रगान के गायन में बाधा डालना दूसरी बात. Prevention of Insults to National Honour Act, 1971 की धारा 3 में राष्ट्रगान के गायन को जानबूझकर रोकने या राष्ट्रगान गाने वाली सभा में व्यवधान पैदा करने को दंडनीय बनाया गया है.
यानी कोई व्यक्ति खुद नहीं गाता, लेकिन शांत रहता है और सम्मानपूर्वक खड़ा रहता है, तो यह स्थिति उस व्यक्ति से अलग है जो जानबूझकर राष्ट्रगान रुकवाता है, लोगों को गाने से रोकता है या कार्यक्रम में व्यवधान डालता है. कानून का फोकस इसी अंतर पर है.
वंदे मातरम में सवाल क्यों उठा?
यही पुराना कानूनी सिद्धांत अब वंदे मातरम से जुड़े विवाद में चर्चा का विषय बना है. 22 सितंबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने संगीतकार टी.एम. कृष्णा की याचिका पर केंद्र सरकार से जवाब मांगा. कृष्णा ने राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम से जुड़े 2026 के कानूनी बदलाव और गृह मंत्रालय के निर्देशों को चुनौती दी है.
उनकी याचिका में यह सवाल उठाया गया है कि क्या राष्ट्रीय गीत के गायन को इस तरह अनिवार्य किया जा सकता है कि धार्मिक या अंतरात्मा से जुड़ी आपत्ति रखने वाले व्यक्ति को आपराधिक कार्रवाई का सामना करना पड़े.
किसकी याचिका पर सुनवाई हुई?
सुप्रीम कोर्ट में यह मामला कर्नाटक संगीतकार टी.एम. कृष्णा की याचिका से जुड़ा है. अहम यह है कि 22 सितंबर की सुनवाई में अदालत ने उनकी याचिका खारिज नहीं की. कोर्ट ने केंद्र सरकार से जवाब मांगा और सुनवाई के दौरान 1986 के बिजो इमैनुएल फैसले से तय मानदंडों का जिक्र किया.
कोर्ट के सामने मूल सवाल यह है कि अगर कोई व्यक्ति धार्मिक या अंतरात्मा की वजह से वंदे मातरम नहीं गाता, लेकिन दूसरों के गायन में कोई बाधा नहीं डालता, तो क्या उसे अपराधी माना जा सकता है.
तो अपराध आखिर कब बनता है?
बिजो इमैनुएल फैसले का सार यही है कि किसी राष्ट्रीय गीत या राष्ट्रगान का सम्मान और उसका गायन दो अलग-अलग कानूनी प्रश्न हो सकते हैं. किसी व्यक्ति का खुद न गाना अपने आप में अपमान नहीं बन जाता. लेकिन जानबूझकर गायन रोकना, उसमें व्यवधान डालना या कानून में परिभाषित तरीके से राष्ट्रीय सम्मान का अपमान करना अलग स्थिति है.
इसलिए वंदे मातरम विवाद में असली कानूनी सवाल सिर्फ यह नहीं है कि कोई व्यक्ति गाता है या नहीं. बड़ा सवाल यह है कि उसका आचरण केवल व्यक्तिगत असहमति या अंतरात्मा की स्वतंत्रता तक सीमित है, या वह राष्ट्रीय गीत के गायन में जानबूझकर बाधा या अपमान की कानूनी सीमा को पार करता है. यही वह फर्क है, जिसे समझने के लिए सुप्रीम कोर्ट का बिजो इमैनुएल फैसला आज फिर महत्वपूर्ण हो गया है. इस पर जस्टिस बागची ने कहा कि अदालत को उम्मीद है कि 'बिजो एमैनुएल' मामले में सुप्रीम कोर्ट की ओर से तय कानून इस मामले पर भी लागू होगा.
जस्टिस बागची ने कहा कि राष्ट्रीय गीत क्या है, इस पर विवाद नहीं है. उन्होंने कहा कि 'बिजो एमैनुएल' मामले में सुप्रीम कोर्ट ने जो कानून तय किया था, उसे अब तक चुनौती नहीं दी गई है. उन्होंने कहा कि लोकतांत्रिक सरकार यह तय कर सकती है कि राष्ट्रीय गीत का कौन सा संस्करण इस्तेमाल होगा, चाहे उसमें दो अंतरे हों या चार.
कानून क्या कहता है?
Prevention of Insults to National Honour Act 1971 की संशोधित धारा 3 के तहत राष्ट्रगान या राष्ट्रगीत के गायन को जानबूझकर रोकना या गायन कर रही सभा में व्यवधान डालना अपराध है. इसके लिए अधिकतम 3 साल तक की जेल, जुर्माना या दोनों का प्रावधान है. दूसरी या बाद की दोषसिद्धि पर कम से कम 1 साल की जेल हो सकती है.




