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सुप्रीम कोर्ट में 4 जज बढ़ाने की नौबत क्यों आई? समझिए मुकदमों के बोझ से लेकर न्याय की रफ्तार तक पूरा हिसाब

सुप्रीम कोर्ट में 4 जज बढ़ाने की जरूरत क्यों पड़ी? जानिए 96 हजार से ज्यादा लंबित मामलों, पुराने केस और न्याय की धीमी रफ्तार की पूरी कहानी.

Supreme Court 4 Judges Pending Cases India
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भारत की सबसे बड़ी अदालत में अब सिर्फ फैसले नहीं, मुकदमों का पहाड़ भी बढ़ रहा है. सुप्रीम कोर्ट में पेंडिंग मामलों की संख्या 96 हजार के पार पहुंच चुकी है और इनमें 26 मामले ऐसे हैं जो 30 साल से ज्यादा पुराने हैं. दूसरी तरफ पूरे देश की अदालतों में करोड़ों मुकदमे न्याय का इंतजार कर रहे हैं. ऐसे वक्त में केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट की स्वीकृत जज संख्या 34 से बढ़ाकर 38 करने की पहल की है.

सवाल है- क्या चार जज न्याय की रफ्तार बदल देंगे? या समस्या अदालत की क्षमता से कहीं बड़ी है? आंकड़े बताते हैं कि मामला सिर्फ चार कुर्सियां बढ़ाने का नहीं, बल्कि पूरे न्यायिक सिस्टम के दबाव का है.

4 जज बढ़ाने की जरूरत आखिर क्यों पड़ी?

मई 2026 में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने सुप्रीम कोर्ट में CJI को छोड़कर जजों की संख्या 33 से बढ़ाकर 37 करने को मंजूरी दी. यानी CJI समेत कुल स्वीकृत संख्या 34 से बढ़कर 38 होगी. इसके बाद 16 मई को अध्यादेश आया और 20 जुलाई 2026 को Supreme Court (Number of Judges) Amendment Bill, 2026 लोकसभा में पेश किया गया, जो उस अध्यादेश को replace करेगा.

सरकार का तर्क- अतिरिक्त जजों से अदालत ज्यादा प्रभावी ढंग से काम कर सकेगी और मामलों के निपटारे की गति बढ़ेगी. इससे एक साथ ज्यादा बेंच बैठाने की क्षमता भी बढ़ेगी. खासकर उन मामलों में यह महत्वपूर्ण है जहां नियमित सुनवाई के साथ बड़ी संविधान पीठ की जरूरत पड़ती है.

सुप्रीम कोर्ट में कितने मुकदमे अटके हैं?

पेंडेंसी का सबसे हालिया पैमाना संकट की गंभीरता दिखाता है. 28 जुलाई 2026 के उपलब्ध NJDG-आधारित आंकड़ों के अनुसार सुप्रीम कोर्ट में 95,936 मामले लंबित थे. वहीं 13 मार्च 2026 को सरकारी आंकड़ों में यह संख्या 92,621 थी, जिनमें 24,445 मामले पांच साल से अधिक पुराने थे. यानी कुछ महीनों में लंबित मामलों की संख्या और बढ़ी.

23 जुलाई को राज्यसभा में सरकार ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट में 96 हजार से ज्यादा मामले लंबित हैं; 26 मामले 30 साल से ज्यादा और 558 मामले 20 साल से ज्यादा समय से लंबित हैं. यह सिर्फ आंकड़ा नहीं, बल्कि उस व्यक्ति की वर्षों लंबी कानूनी लड़ाई है जिसका अंतिम फैसला अभी बाकी है.

क्या पूरे न्याय तंत्र का बोझ सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच रहा है?

समस्या की जड़ नीचे से शुरू होती है. NJDG के मौजूदा आंकड़ों में जिला और अधीनस्थ अदालतों में करीब 4.99 करोड़ मामले, जबकि हाई कोर्ट में करीब 64.63 लाख मामले लंबित हैं. 23 जुलाई को सरकार ने पूरे न्यायिक तंत्र में करीब 5.64 करोड़ लंबित मामलों का आंकड़ा राज्यसभा में बताया था; अलग-अलग तारीखों के NJDG snapshots के कारण कुल संख्या में अंतर दिखता है.

निचली अदालतों में लंबित मामलों का करीब 77% हिस्सा आपराधिक और 23% दीवानी है. यहां 4,800 से ज्यादा न्यायिक पदों की रिक्तियां भी लंबे समय से दबाव बढ़ाती रही हैं.

हाईकोर्ट की तस्वीर भी कम चिंताजनक नहीं है. 16 जुलाई के आंकड़ों में सभी हाई कोर्ट में 64.72 लाख से ज्यादा मामले लंबित थे और 80,660 मामले 30 साल से अधिक पुराने थे. इनमें इलाहाबाद हाई कोर्ट सबसे ऊपर था, जहां करीब 12.28 लाख मामले लंबित थे.

क्या सिर्फ चार जजों से बैकलॉग खत्म हो जाएगा?

ऐसा नहीं हो सकता. चार जजों से बेंचों की क्षमता बढ़ेगी, लेकिन पेंडेंसी की पूरी समस्या खत्म नहीं होगी. कानून मंत्रालय के अनुसार देरी के पीछे केवल जजों की संख्या नहीं, बल्कि मामलों की जटिलता, सबूतों की प्रकृति, वकीलों, जांच एजेंसियों, गवाहों और पक्षकारों का सहयोग जैसे कई कारण होते हैं.

यही वजह है कि केस मैनेजमेंट, अनावश्यक स्थगन पर नियंत्रण, पर्याप्त कोर्ट स्टाफ, डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और निचली अदालतों में खाली पद भरना उतना ही जरूरी है. सुप्रीम कोर्ट खुद पुराने मामलों के लिए विशेष बेंच और तेज निपटारे की व्यवस्था करता रहा है. अदालत की वेबसाइट पर 2026 में भी पुराने मामलों और विशेष बेंचों से जुड़े लगातार नोटिस दर्ज हैं.

न्याय की रफ्तार बढ़ाने के लिए और क्या करना होगा?

चार नए जज क्षमता बढ़ाने का जरूरी कदम हैं, लेकिन इसे अंतिम समाधान मानना गलती होगी. संविधान पीठों के लिए पांच या उससे अधिक जजों की जरूरत पड़ सकती है; इसलिए अतिरिक्त न्यायिक ताकत से नियमित मामलों और संवैधानिक मामलों के बीच बेहतर संतुलन बनाया जा सकेगा.

साथ ही निचली अदालतों की रिक्तियां भरना, हाईकोर्ट की पेंडेंसी कम करना, डिजिटल केस मैनेजमेंट और पुराने मामलों की अलग से निगरानी जरूरी है. हालिया न्यायिक दिशा-निर्देशों में भी सुरक्षित फैसलों में देरी पर निगरानी और समयबद्ध pronouncement पर जोर दिया गया है.

दरअसल, सुप्रीम कोर्ट में 34 से 38 जज करना समस्या का इलाज नहीं, बल्कि इलाज की क्षमता बढ़ाने की कोशिश है. असली चुनौती उस 5 करोड़ से ज्यादा मामलों वाले न्यायिक ढांचे की है जहां नीचे की अदालत से शुरू हुआ मुकदमा सालों बाद हाई कोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच सकता है. चार जज ऊपर का दबाव कुछ कम कर सकते हैं, लेकिन समय पर न्याय तभी मिलेगा जब पूरी न्यायिक सीढ़ी की रफ्तार एक साथ बढ़े.

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