2003 में आई Dwikhondito में ऐसा क्या, जिसकी वजह से 2007 में तसलीमा नसरीन को छोड़ना पड़ा था कोलकाता, विरोध में क्या-क्या हुआ, पूरी टाइमलाइन
2003 की Dwikhandito पर विवाद और प्रतिबंध से लेकर 2007 के कोलकाता हिंसक प्रदर्शन तक, जानिए तसलीमा नसरीन को शहर छोड़ने पर मजबूर करने वाली पूरी टाइमलाइन.
लगभग दो दशक बाद तसलीमा नसरीन फिर कोलकाता लौटी हैं, लेकिन उनकी इस वापसी के पीछे एक ऐसी कहानी है जिसने 2007 में पूरे शहर को हिंसा की आग में झोंक दिया था. कहानी शुरू होती है, 2003 में प्रकाशित उनकी आत्मकथा ‘Dwikhandito’ से. किताब को लेकर धार्मिक भावनाएं आहत करने के आरोप लगे, पश्चिम बंगाल की तत्कालीन बुद्धदेव भट्टाचार्य की सरकार ने इसे प्रतिबंधित कर दिया. फिर हाईकोर्ट ने प्रतिबंध हटा दिया. लेकिन विवाद खत्म नहीं हुआ. 2007 में हैदराबाद में उन पर हमला, कोलकाता में उनके खिलाफ फिर से फतवे और नवंबर में हिंसक प्रदर्शन ने हालात ऐसे बनाए कि राज्य सरकार ने उन्हें कोलकाता से बाहर भेज दिया. आखिर उस किताब में ऐसा क्या था और चार साल में मामला इतना बड़ा कैसे हो गया?
‘Dwikhandito’ में ऐसा क्या था, 2003 में विवाद खड़ा हो गया?
तसलीमा नसरीन की बांग्ला आत्मकथा ‘Dwikhandito’ यानी ‘Split in Two’ 2003 में प्रकाशित हुई थी. यह उनकी आत्मकथा के तीसरे हिस्से के तौर पर सामने आई थी. किताब में उनके निजी जीवन, रिश्तों, समाज, धर्म और महिलाओं की स्थिति पर उनके विचार शामिल थे. पुस्तक के कुछ हिस्सों को लेकर विवाद इतना बढ़ा कि पश्चिम बंगाल सरकार ने नवंबर 2003 में इसके प्रकाशन, बिक्री और प्रचार पर रोक लगा दी. सरकार ने तब भारतीय दंड संहिता की धारा 153A का इस्तेमाल किया और कहा कि किताब से समुदायों के बीच वैमनस्य फैलने तथा सांप्रदायिक सौहार्द बिगड़ने की आशंका है. पुलिस ने कॉलेज स्ट्रीट में छापेमारी कर 2,500 से ज्यादा प्रतियां भी जब्त की थीं.
विवाद केवल धार्मिक भावनाओं तक सीमित नहीं था. किताब में एक कवि के साथ कथित संबंधों के वर्णन को लेकर मानहानि का मुकदमा भी हुआ था. इसके अलावा किताब के कुछ हिस्सों में धर्म और महिलाओं की स्थिति को लेकर नसरीन के तीखे विचारों ने विरोध को और बढ़ाया.
2003 से 2005: किताब पर रोक अदालत ने क्यों हटाई?
पश्चिम बंगाल सरकार की कार्रवाई को अदालत में चुनौती दी गई. पहले 2003 में सरकार ने किताब पर रोक लगाई. बाद में 2004 में एक नया नोटिफिकेशन जारी किया गया, जिसमें किताब के कुछ हिस्सों पर भारतीय दंड संहिता की धारा 295A के तहत रोक कायम रखी गई. इस कार्रवाई के खिलाफ याचिका दाखिल हुई.
22 सितंबर 2005 को कलकत्ता हाईकोर्ट की विशेष पीठ ने सरकार की रोक हटा दी. अदालत ने माना कि किताब पर प्रतिबंध लगाने का आधार टिकाऊ नहीं था और इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के संदर्भ में देखा जाना चाहिए. अदालत ने सरकार को जब्त किताबें प्रकाशक को लौटाने का भी निर्देश दिया.
2005 तक कानूनी स्थिति यह थी कि किताब पर लगा प्रतिबंध अदालत ने हटा दिया था. यही कारण है कि 2007 में हुई हिंसा को सीधे यह कहना कि “किताब के कारण ही उन्हें निकाल दिया गया” पूरी कहानी नहीं बताता. 2007 में उनके खिलाफ विरोध का दायरा किताब से आगे बढ़कर उनकी मौजूदगी और उनके लेखन को लेकर धार्मिक-राजनीतिक विरोध में बदल चुका था.
2007 में क्या बदला और मामला अचानक फिर क्यों भड़क उठा?
2007 में तसलीमा के खिलाफ माहौल फिर तेज हुआ. 9 अगस्त 2007 को वह अपनी किताब ‘Shodh’ के तेलुगु अनुवाद के कार्यक्रम के लिए हैदराबाद गई थीं. वहां उन पर भीड़ ने हमला किया. उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक प्रदर्शन में AIMIM से जुड़े कुछ विधायकों के शामिल होने के आरोप लगे. इस घटना ने उनकी सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ा दी.
इसके कुछ ही दिनों बाद, 17 अगस्त को कोलकाता में मुस्लिम धार्मिक नेताओं की ओर से उनके खिलाफ फिर कड़े बयान और धमकियां सामने आईं. न्यूज एजेंसी Reuters और उस समय की रिपोर्टों में उनके खिलाफ जान से मारने की धमकियों और भारत छोड़ने की मांग का जिक्र मिलता है.
यहीं से मामला सिर्फ ‘एक विवादित किताब’ का नहीं रहा. सवाल बन गया कि क्या तसलीमा को भारत में रहने दिया जाए और क्या पश्चिम बंगाल सरकार उनकी सुरक्षा सुनिश्चित कर सकती है.
कोलकाता में ऐसा क्या हुआ कि सेना बुलानी पड़ी?
21 नवंबर 2007 को All India Minority Forum के बैनर पर विरोध प्रदर्शन हुआ. प्रदर्शनकारियों की प्रमुख मांगों में तसलीमा नसरीन को भारत से बाहर भेजने या उनका वीजा रद्द करने की मांग शामिल थी. प्रदर्शन का दूसरा बड़ा मुद्दा नंदीग्राम हिंसा भी था. लेकिन प्रदर्शन जल्द ही हिंसक हो गया. पुलिस पर पथराव हुआ, वाहनों को नुकसान पहुंचाया गया और शहर के कई हिस्सों में स्थिति बिगड़ गई.
रिपोर्टों के मुताबिक पुलिस ने आंसू गैस और लाठीचार्ज का इस्तेमाल किया. Rapid Action Force को तैनात किया गया और स्थिति इतनी बिगड़ी कि राज्य सरकार ने सेना की मदद मांगी. सेना ने प्रभावित इलाकों में flag march किया. पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी के घायल होने और CPI(M) के दो कार्यालयों में आग लगाए जाने की भी रिपोर्ट सामने आई. करीब 60 लोगों की गिरफ्तारी की जानकारी उस समय राज्य सरकार ने दी थी.
इस हिंसा ने पश्चिम बंगाल की तत्कालीन वाम मोर्चा सरकार के सामने सबसे कठिन सवाल खड़ा कर दिया- एक लेखिका की सुरक्षा बनाम शहर की कानून-व्यवस्था.
Timeline: तसलीमा को कोलकाता क्यों छोड़ना पड़ा, आगे क्या हुआ?
21 नवंबर की हिंसा के अगले ही दिन, 22 नवंबर 2007 को तसलीमा नसरीन कोलकाता से जयपुर ले जाया गया. उस समय की रिपोर्टों के मुताबिक उन्हें सुरक्षा कारणों से एक सुरक्षित स्थान पर रखा गया.
इसके बाद केंद्र सरकार भी उनकी सुरक्षा को लेकर सक्रिय हुई. नवंबर के अंत में Cabinet Committee on Security की बैठक हुई और केंद्र ने उनकी लोकेशन को सार्वजनिक न करने का फैसला किया, क्योंकि उनकी मौजूदगी और आवाजाही से कट्टरपंथी समूहों के लिए खतरा बढ़ने की आशंका जताई गई थी. तत्कालीन विदेश मंत्री प्रणब मुखर्जी ने भी उस समय कहा था कि उनकी सुरक्षा सबसे महत्वपूर्ण प्राथमिकता है.
यहां पर इस बात का जिक्र कर दें कि तसलीमा की किताब Dwikhandito’ पर 2003 मेंप्रतिबंध, 2005 में हाईकोर्ट ने प्रतिबंध हटा दिया, 2007 में हैदराबाद में उन पर हमला हुआ, फिर कोलकाता में धमकियां मिलीं, 21 नवंबर को हिंसक घटनाएं हुईं और 22 नवंबर को सुरक्षा के मद्देनजर उन्हें कोलकाता से बाहर भेजना एक लंबी श्रृंखला बन गई.
इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि तसलीमा को 2007 में कोलकाता से हटाने का तत्काल कारण केवल Dwikhandito की सामग्री नहीं थी. 2007 तक विवाद उनके पूरे लेखन, धार्मिक आलोचना, सुरक्षा और उनके खिलाफ संगठित विरोध का मिश्रण बन चुका था. आज, 19 साल बाद उनकी कोलकाता वापसी उसी पुराने सवाल को फिर सामने लाती है— लोकतंत्र में किसी लेखक की अभिव्यक्ति की सीमा कहां खत्म होती है और राज्य की जिम्मेदारी कहां से शुरू होती है?
2003 से पहले क्या हुआ था?
2003 से पहले भी तसलीमा नसरीन का लेखन और निजी जीवन लगातार विवादों में रहा. 1962 में तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान के मयमनसिंह में जन्मीं तसलीमा ने चिकित्सा की पढ़ाई की और डॉक्टर के रूप में काम किया, लेकिन उनकी पहचान जल्द ही लेखिका और नारीवादी आवाज के रूप में बनी.
1980 के दशक में उनकी कविताओं और लेखों में महिलाओं की स्वतंत्रता, पितृसत्ता और धार्मिक रूढ़ियों की आलोचना प्रमुख थी. 1993 में प्रकाशित उनकी आत्मकथा ‘Amar Meyebela’ (My Girlhood) ने बांग्लादेश में बड़ा विवाद खड़ा किया और बाद में इस पर प्रतिबंध लगा. 1994 में उनके उपन्यास ‘Lajja’ के प्रकाशन के बाद कट्टरपंथी संगठनों ने उनके खिलाफ विरोध तेज किया और उन पर धार्मिक भावनाएं भड़काने के आरोप लगे. उनके खिलाफ फतवा जारी होने और गिरफ्तारी की मांग के बाद वह बांग्लादेश छोड़कर यूरोप चली गईं.
1990 के दशक में उन्होंने भारत में रहना शुरू किया और कोलकाता को अपना प्रमुख ठिकाना बनाया. 2003 में ‘Dwikhandito’ के विवाद तक यह संघर्ष उनके लेखन, धर्म, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और व्यक्तिगत सुरक्षा के सवालों में बदल चुका था.




