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11 साल तक सस्पेंड फिर नौकरी से निकाला... सुरेखा डोमाजी बेले केस में सुप्रीम कोर्ट ने पलटा HC का फैसला, कहीं कई बड़ी बातें

सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले में अहम फैसला सुनाया है. दरअसल, एक कर्मचारी को 11 साल तक सस्पेंड रखा गया और फिर उसे बर्खास्त कर दिया गया. इस मामले में कोर्ट ने नोटिस जारी किया है और हाई कोर्ट से भी सवाल किया है.

11 साल तक सस्पेंड फिर नौकरी से निकाला... सुरेखा डोमाजी बेले केस में सुप्रीम कोर्ट ने पलटा HC का फैसला, कहीं कई बड़ी बातें
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( Image Source:  X-@ANI )
संजीव चौहान
By: संजीव चौहान5 Mins Read

Updated on: 16 Jun 2026 11:27 AM IST

“किसी भी कर्मचारी को उसकी सेवा (नौकरी) से बर्खास्त किया जाना उसे सजा का सबसे विकट या कठोर रुप होता है. इस प्रक्रिया को बेहद गंभीर मामलों में ही अमल में लाया जाना चाहिए. किसी भी आरोपी सेवारत कर्मचारी के खिलाफ इतनी कठोर कार्यवाही अमल में लाए जाने से पूर्व उसके बीते हुए लंबे सेवाकाल का रिकॉर्ड, कदाचार या जुर्म-अपराध का रुप, कर्मचारी की आयु और उसकी बेजा हरकत से कंपनी या विभाग को हुए नुकसान का भी पुष्ट आंकलन करना जरूरी है. किसी भी कर्मचारी को उसकी सेवा से बर्खास्त किए जाने से पहले इन सब बिंदुओं पर भी गहन पड़ताल किया जाना जरूरी है.”

एक मामले की सुनवाई के दौरान देश के सर्वोच्च न्यायालय ने इस बारे में बॉम्बे हाईकोर्ट के फैसले को खारिज करते हुए यह तमाम अहम टिप्पणियां की हैं. सर्वोच्च न्यायालय ने लिखा है कि मुकदमा अगर भ्रष्टाचार, अनैतिक आचरण या संस्थान को भारी नुकसान पहुंचाने या फिर रिश्वतखोरी-गबन आदि से जुड़ा न हो तो यह देखना भी बेहद जरूरी हो जाता है कि क्या हल्की सजा भी (सेवा से बर्खास्तगी के अलावा और कोई सजा) न्याय के उद्देश्य को पूरा कर पाने में सक्षम है.

क्या है मामला?

यह तमाम बातें या टिप्पणियां जस्टिस सजय करोल और जस्टिस एन के सिंह की दो सदस्यीय पीठ ने Surekha Domaji Bele Vs Executive Engineer, Testing Division, MSEDCL, Diary Number 11294 of 2025 के मुकदमे/मामले की सुनवाई के दौरान की. सुप्रीम कोर्ट में मुकदमे की अपीलकर्ता सुरेखा डोमाजी बेले हैं. जोकि सन 1985 से महाराष्ट्र इलेक्ट्रिसिटी डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी लिमिटेड यानी एमएसईडीसीएल में नौकरी करती थीं. साल 2006 में कंपनी ने उन्हें पहले सस्पेंड किया उसके बाद साल 2017 में जांच के बाद आरोप सिद्ध होने पर उनको नौकरी से बर्खास्त कर दिया गया.

सुरेखा के खिलाफ क्या थे आरोप?

सुरेखा बेले के खिलाफ 2006 में विभागीय जांच शुरू की गई. उन पर आरोप था कि उन्होंने सेवा नियमों का उल्लंघन किया, वरिष्ठ अधिकारियों के निर्देशों की अवहेलना की, कार्यालयी अनुशासन का पालन नहीं किया, आधिकारिक दस्तावेजों में कथित तौर पर बदलाव किए, कार्य में लापरवाही बरती और कंपनी की संपत्ति का अनुचित उपयोग किया. इन आरोपों के आधार पर उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू की गई थी.

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

पीड़िता मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट पहुंची. जहां पाया गया कि कंपनी ने जिस तरह की जांच और तथ्यों को आधार बनाकर अपीलकर्ता को नौकरी से निकाला था, वे कदाचित उचित नहीं थे. सुप्रीम कोर्ट ने देखा कि सन् 2008 के पुराने शो-कॉज नोटिस के आधार पर उनकी साल 2017 में कर दी गई सेवा-बर्खास्तगी भी अनुचित थी. अब अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि जांच लंबित रहने की अवधि में सेवा-निलंबन की अवधि को अलग सजा की तरह कंपनी द्वारा इस्तेमाल किया जाना भी गलत है.

सुरेखा के मामले में कंपनी ने तकरीबन 11 साल तक उनका सेवा-निलंबन जारी रखा. सर्वोच्च न्यायालय ने कंपनी के इस कदम को भी (11 साल तक लगातार निलंबन) गंभीर बिंदु कहते हुए इस पर भी चिंता व्यक्त की. न्यायालय ने कहा कि कर्मचारी को निर्वाह भत्ता से वंचित करना उसके जीवन और तथा बाकी जरूरतों की पूर्ति पर एकदम विपरीत असर डालता है. इतना ही नहीं सुप्रीम अदालत ने साफ कहा कि किसी कर्मचारी को एक ही कदाचार के लिए इस तरह दोहरी सजा नहीं दिया जाना चाहिए. जबकि सेवा-नियमावली में इसका कहीं कोई उल्लेख तक न हो. बिना नियम-कानून के इस तरह की सजा सुनाया जाना सरासर गलत है.

इसी के साथ इस मामले में फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट की दो सदस्यीय खंडपीठ ने इस मामले में पूर्व में सुनाए गए फैसले को भी रद्द कर दिया. साथ ही संबंधित विभाग/कंपनी MSEDCL को निर्देश दिया कि वह नए सिरे से कारण बताओ नोटिस संबंधित कर्मचारी को जारी करके, अपने फैसले पर नए सिरे से विचार करे. ताकि आगे से किसी विभाग/ कंपनी के किसी और कर्मचारी के साथ इस तरह की दंडात्मक प्रक्रिया अमल में लाए जाने से बचा जा सके.

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