Exclusive: स्वामी से सीधा सवाल- आरक्षण कब तक? बोले, ‘डर तो पैदा करना ही होगा’
आरक्षण पर Swami से सीधा सवाल पूछा गया कि यह कब तक चलेगा. जवाब में उन्होंने कहा, “डर तो पैदा करना ही होगा.” बयान ने Reservation और Social Justice पर बहस तेज की.
आरक्षण पर देश में बहस कोई नई बात नहीं है. पिछले कुछ दिनों से दिल्ली व देश के अन्य हिस्सों में आरक्षण विरोधियों के प्रदर्शन ने इस मसले को अचानक सुर्खियों में ला दिया है. इस बीच बीजेपी के बेबाक नेता सुब्रह्मण्यम स्वामी के हालिया बयान ने इस बहस को फिर तेज कर दिया है. स्टेट मिरर के सवालों के जवाब में स्वामी ने कहा कि आरक्षण को बेवजह बड़ा मुद्दा बना दिया गया. उनका तर्क है कि आरक्षण होना चाहिए, लेकिन इसका आधार केवल जाति नहीं बल्कि आर्थिक स्थिति भी होनी चाहिए.
उन्होंने मोदी सरकार के आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण के फैसले को अच्छा कदम बताया. स्वामी के मुताबिक व्यवस्था का लक्ष्य कमजोर वर्गों को मुख्यधारा में लाना होना चाहिए, लेकिन इसके साथ मेरिट से समझौता नहीं किया जाना चाहिए. उनके बयान का दूसरा पहलू यह है कि कानून तभी प्रभावी माना जाएगा, जब उसका असर सिस्टम में दिखाई दे.
क्या स्वामी आरक्षण खत्म करने की बात कर रहे हैं?
सुब्रह्मण्यम स्वामी की बात को सीधे-सीधे आरक्षण खत्म करने की मांग के तौर पर देखना उनके पूरे रुख को अधूरा पढ़ना होगा. उनका जोर आरक्षण के आधार और उस पर अमल को लेकर है. वह जाति आधारित आरक्षण की मौजूदा संरचना पर सवाल उठाते रहे हैं. 2019 में आर्थिक रूप से कमजोर सामान्य वर्गों के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण के फैसले का उन्होंने समर्थन किया था.
इसी बहस में उनका पुराना रुख भी सामने आता है कि गरीब सवर्णों को आर्थिक आधार पर आरक्षण मिलने का स्वागत किया जाना चाहिए. यानी स्वामी की बहस का केंद्रीय सवाल यह है कि सामाजिक प्रतिनिधित्व और आर्थिक कमजोरी के बीच आरक्षण की प्राथमिकता कैसे तय हो.
‘डर तो पैदा करना होगा’ से उनका क्या मतलब है?
बीजेपी नेता स्वामी ने कानून के प्रभाव को लेकर जिस तरह की बात रखी, उसमें उनका जोर केवल कानून बनाने पर नहीं बल्कि उसे प्रभावी ढंग से लागू करने पर था. उनके अनुसार कोई भी कानून तभी प्रभाव पैदा करता है, जब उसके पालन का वास्तविक असर व्यवस्था में दिखाई दे. इसी संदर्भ में उन्होंने ‘डर पैदा करने’ की बात कही. आरक्षण जैसे संवेदनशील विषय पर यही वाक्य राजनीतिक बहस को तीखा बना सकता है, क्योंकि सवाल केवल आरक्षण की सीमा का नहीं बल्कि सरकार की नीति और उसके अमल का भी है.
क्या मोदी का आर्थिक आरक्षण मॉडल नई दिशा है?
2019 में लागू हुआ 103वां संविधान संशोधन आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों यानी EWS के लिए शिक्षा और सरकारी नौकरियों में 10 प्रतिशत तक आरक्षण का संवैधानिक आधार बना. स्वामी इसी व्यवस्था को आरक्षण की बहस में महत्वपूर्ण बदलाव के रूप में देखते हैं. उनके तर्क में आर्थिक कमजोरी को अवसर देने का आधार बनाया गया है. हालांकि, भारत की आरक्षण व्यवस्था केवल गरीबी उन्मूलन की नीति नहीं है; SC, ST और OBC के लिए आरक्षण ऐतिहासिक सामाजिक वंचना और प्रतिनिधित्व से जुड़ा है. इसलिए आर्थिक आरक्षण और सामाजिक आरक्षण को एक-दूसरे का सीधा विकल्प मानना संवैधानिक बहस को सरल बना देना होगा.
क्या 'लेटरल एंट्री' ने आरक्षण की बहस को और धार दे दी?
लेटरल एंट्री इसी विवाद का सबसे महत्वपूर्ण उदाहरण बनकर सामने आई. इसके तहत निजी क्षेत्र, सार्वजनिक उपक्रमों, शोध संस्थानों और विश्वविद्यालयों समेत अन्य क्षेत्रों के विशेषज्ञों को सीधे केंद्र सरकार के वरिष्ठ पदों पर नियुक्त करने की व्यवस्था है. संयुक्त सचिव, निदेशक और उप सचिव स्तर के पद इसके दायरे में आते हैं. 2017 में नीति आयोग के तीन वर्षीय एक्शन एजेंडा और प्रशासनिक सुधारों से जुड़ी सिफारिशों के बाद सरकार ने 2018 में इसकी औपचारिक प्रक्रिया शुरू की. 2019 में पहली बार नौ विशेषज्ञों को संयुक्त सचिव स्तर पर नियुक्त किया गया.
2024 में 45 पदों पर ऐसा क्या हुआ कि सरकार को पीछे हटना पड़ा?
अगस्त 2024 में UPSC ने केंद्र सरकार के 24 मंत्रालयों में संयुक्त सचिव, निदेशक और उप सचिव स्तर के 45 पदों पर लेटरल भर्ती के लिए विज्ञापन जारी किया था. विवाद का केंद्र यह था कि इन पदों पर SC, ST, OBC और EWS आरक्षण किस तरह लागू होगा. आलोचकों ने कहा कि अलग-अलग विभागों में एक-एक पद होने के कारण मौजूदा व्यवस्था में आरक्षण लागू नहीं हो रहा था.
इसके बाद विपक्ष और NDA के कुछ सहयोगियों की आपत्तियों के बीच सरकार ने UPSC से विज्ञापन वापस लेने को कहा. इस घटनाक्रम ने यह सवाल जरूर खड़ा कर दिया कि विशेषज्ञता और आरक्षण को एक साथ लागू करने का व्यावहारिक मॉडल क्या होगा.
क्या स्वामी का पुराना बयान आज फिर चर्चा में क्यों?
स्वामी का आरक्षण पर रुख वर्षों से बहस का विषय रहा है. 2019 में लेटरल एंट्री पर चर्चा के दौरान उनके पुराने बयान को लेकर यह तर्क सामने आया था कि अगर सरकारी व्यवस्था में पारंपरिक भर्ती के बाहर से नियुक्तियां बढ़ती हैं, तो आरक्षण की मौजूदा संरचना का प्रभाव कम हो सकता है.
दूसरी ओर, स्वामी ने खुद कई मौकों पर यह स्पष्ट किया है कि वे आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों को अवसर देने के विचार के खिलाफ नहीं हैं. इसलिए उनकी पूरी राजनीति को सिर्फ ‘आरक्षण विरोध’ के एक वाक्य में समेटना सही तस्वीर नहीं देता. असल सवाल अब यही- भारत आरक्षण व्यवस्था को किस दिशा में ले जाना चाहता है?
Credit : State Mirror
सुब्रह्मण्यम स्वामी ने आरक्षण पर कब और क्या कहा?
2015: जाट आरक्षण पर समर्थन
मार्च 2015 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा जाट आरक्षण रद्द किए जाने के बाद सुब्रह्मण्यम स्वामी ने केंद्र सरकार से कानून के अनुरूप नया प्रावधान लाकर जाट समुदाय को आरक्षण देने की मांग की थी. यह बयान उन्होंने सुप्रीम कोर्ट द्वारा मार्च 2015 के शुरुआत में जाट आरक्षण के प्रस्ताव को रद्द किए जाने के कुछ ही दिनों बाद स्वामी ने यह बयान दिया था. उन्होंने केंद्र सरकार से सुप्रीम कोर्ट के मानकों का पालन करते हुए चार महीने के भीतर नया अध्यादेश लाकर जाटों को आरक्षण देने का आग्रह किया था. इस सिलसिले में उन्होंने तत्कालीन वित्त मंत्री अरुण जेटली से भी मुलाकात की थी.
2019: आर्थिक आधार पर आरक्षण का समर्थन
जनवरी 2019 में मोदी सरकार द्वारा आर्थिक रूप से कमजोर सामान्य वर्ग (EWS) के लिए 10% आरक्षण देने के फैसले का स्वामी ने समर्थन किया. उन्होंने इसे एक महत्वपूर्ण कदम बताया.
2019: मुस्लिम आरक्षण पर सवाल
दिसंबर 2019 में मुस्लिम आरक्षण की मांग पर स्वामी ने सवाल उठाया. उन्होंने तर्क दिया कि लंबे समय तक देश पर शासन करने के बावजूद मुस्लिम समुदाय को आरक्षण की आवश्यकता क्यों पड़ रही है.
2019: लेटरल एंट्री और आरक्षण की बहस
लेटरल एंट्री को लेकर 2019 में हुई बहस के दौरान स्वामी के पुराने बयानों का हवाला दिया गया. आलोचकों ने आशंका जताई कि विशेषज्ञों की सीधी नियुक्तियों से सरकारी नौकरियों में आरक्षण की मौजूदा व्यवस्था प्रभावित हो सकती है.




