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Exclusive: ‘जल्द रिटायर हो जाएं, वरना जेल जाएंगे’, PM Modi को सुब्रह्मण्यम स्वामी का अल्टीमेटम!

सुब्रह्मण्यम स्वामी ने PM Modi को Retire Soon or Go to Jail की चेतावनी दी. उन्होंने Economy, Foreign Policy, Unemployment और Government Decisions पर सवाल उठाए.

Exclusive: ‘जल्द रिटायर हो जाएं, वरना जेल जाएंगे’, PM Modi को सुब्रह्मण्यम स्वामी का अल्टीमेटम!
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भारतीय राजनीति में कुछ बयान ऐसे होते हैं जिन्हें सुनकर लगता है कि किसी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं, बल्कि सियासी बारूद का डिब्बा खोल दिया है. बीजेपी के वरिष्ठ नेता और अर्थशास्त्री सुब्रह्मण्यम स्वामी का प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को दिया ताजा संदेश भी कुछ ऐसा ही है. स्टेट मिरर से बातचीत में जब उनसे पूछा गया कि मौजूदा राजनीतिक माहौल में वह पीएम मोदी को क्या सलाह देना चाहेंगे, तो स्वामी ने बिना भूमिका बांधे कहा- “रिटायर होकर जल्दी जाओ, नहीं तो जेल जाओगे.”

यानी सलाह भी ऐसी कि शुभकामना और चेतावनी के बीच की पूरी दीवार ही गिर गई. स्वामी ने अपने बयान को दोहराते हुए यह भी संकेत दिया कि अगर मोदी ने वैसा नहीं किया, जैसा वह कह रहे हैं, तो उनकी कही बात सच भी हो सकती है. ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक था- आखिर ऐसा क्या हो गया कि स्वामी सीधे रिटायरमेंट से जेल तक पहुंच गए?

स्वामी यहीं नहीं रुके, उन्होंने इंदिरा गांधी का उदाहरण देकर बढ़ाया सियासी तापमान और बढ़ा दिया. जब उनसे दोबारा पूछा गया कि वह आखिर ऐसा क्यों कह रहे हैं, तो स्वामी ने इंदिरा गांधी का उदाहरण सामने रख दिया. उनका कहना था कि शायद लोगों को अंदाजा नहीं है कि राजनीतिक तौर पर बड़े लोगों के साथ क्या-क्या हो सकता है. उन्होंने याद दिलाया कि इंदिरा गांधी को भी जेल मैंने ही भिजवाया था.

स्वामी के इस अंदाज में संदेश साफ था- सत्ता कितनी भी बड़ी हो, राजनीतिक हिसाब-किताब का दरवाजा कभी स्थायी रूप से बंद नहीं होता. उनके मुताबिक, आज जो असंभव लगता है, राजनीति में कल वही संभव दिखाई दे सकता है. यानी सत्ता के गलियारों में कुर्सी मजबूत हो सकती है, लेकिन इतिहास की कुर्सी किसी के लिए आरक्षित नहीं रहती.

अर्थव्यवस्था पर स्वामी का ‘पुराना हिसाब, नया दावा’

मोदी सरकार के कामकाज पर सवाल उठाते हुए स्वामी ने देश की अर्थव्यवस्था को भी निशाने पर लिया. उनका आरोप है कि देश की आर्थिक स्थिति कमजोर हुई है और सही आंकड़े अखबारों में सामने नहीं आने दिए जाते.

स्वामी का तर्क है कि आर्थिक विकास को मापने के लिए जिस आधार का इस्तेमाल अब किया जा रहा है, उसकी विश्वसनीयता पर सवाल हैं. सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) ने अर्थव्यवस्था में आए बदलावों और डिजिटल विकास को सही ढंग से मापने के लिए इसे बदलकर 2022-23 कर दिया है. इससे पहले २०११-12 था. उसी आधार पर विकास दर को देखा जाए तो यह करीब 4 से 4.5 प्रतिशत ही रह जाएगी. उनके मुताबिक इतनी विकास दर तो इंदिरा गांधी के दौर में भी हुआ करती थी.

यानी स्वामी का सवाल सीधा है- अगर आंकड़ों का चश्मा बदलकर विकास तेज दिखाई देने लगे, तो क्या जमीन पर भी सड़क उसी अनुपात में चौड़ी हो जाती है? उनके निशाने पर सरकार का आर्थिक नैरेटिव है और सवाल यह कि उपलब्धियों का हिसाब किस तराजू से किया जा रहा है.

कानून बना, लेकिन अमल कहां गया?

स्वामी ने मोदी सरकार पर कानून बनाने के बाद उसके प्रभावी क्रियान्वयन में कमजोरी का आरोप लगाया. महिला आरक्षण का उदाहरण देते हुए उन्होंने सवाल उठाया कि कानून बनने के बावजूद क्या इसका राजनीतिक लाभ जमीन पर दिखाई दिया?

उनका कहना है कि कोई भी राजनीतिक दल महिलाओं को पर्याप्त प्रतिनिधित्व देने के लिए तैयार नहीं है. ऐसे में कानून बन जाने भर से तस्वीर बदलने वाली नहीं. स्वामी की नजर में असली परीक्षा कागज पर बने कानून की नहीं, बल्कि उसके जमीन पर उतरने की है.

बेरोजगारी को लेकर भी उन्होंने सरकार को घेरा और कहा कि देश में बेरोजगारी चरम पर है. अगर समय रहते इसे नियंत्रित नहीं किया गया तो हालात सरकार के लिए मुश्किल हो सकते हैं. मतलब साफ है- फाइलों में कानून और भाषणों में उपलब्धियां काफी नहीं, जनता की जेब और नौकरी का सवाल आखिर कितने आंकड़ों से ढका जाएगा?

‘सख्त फैसले’ और सरकार की कथित कमजोरी

स्वामी ने आरोप लगाया कि मोदी सरकार ने कई बार सख्त फैसले लेने के बावजूद उन पर अमल करने में कमजोरी दिखाई है. उनके मुताबिक सरकार सख्त फैसलों को लागू करने से डरती है.

उन्होंने डिलिमिटेशन का मुद्दा उठाते हुए कहा कि इस पर भी स्थिति साफ नहीं है. उनका दावा है कि सरकार के पास दो-तिहाई बहुमत नहीं है. राम मंदिर के मुद्दे पर भी उन्होंने सवाल खड़े किए और चंदा चोरी के आरोपों का जिक्र करते हुए पूछा कि जब मामला सामने आया तो सरकार ने जांच अपने हाथ में क्यों नहीं ली.

यानी स्वामी के सवालों की सूची में सरकार के फैसले भी हैं और उन फैसलों की कथित अधूरी कहानी भी. उनके अंदाज में कहें तो सत्ता के पास कानून की किताब तो है, लेकिन उसके पन्ने पलटने की हिम्मत कितनी है- यह सवाल अभी बाकी है.

ट्रंप के सामने मोदी क्यों चुप हैं?

विदेश नीति पर आते ही स्वामी का निशाना और तेज हो गया. उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को लेकर मोदी सरकार की नीति पर सवाल उठाते हुए कहा कि प्रधानमंत्री ट्रंप से इतना डरते हैं कि उन्हें इस पर हंसी आती है.

स्वामी के मुताबिक, मोदी को इस मामले में मजबूती से खड़ा होना चाहिए था. उन्होंने विदेश मंत्री एस. जयशंकर के प्रभाव को लेकर भी टिप्पणी की और कहा कि उनका असर तब तक था, जब तक ट्रंप दोबारा राष्ट्रपति नहीं बने थे.

स्वामी का सवाल है कि आखिर मोदी इस मुद्दे पर संसद में बहस क्यों नहीं कराते? अगर सरकार के पास जवाब है और कोई खोट नहीं है, तो बहस से परहेज क्यों? राजनीति में यही सवाल सबसे ज्यादा परेशान करता है- जब सब कुछ साफ हो तो सवालों से डर कैसा?

‘मंदिर पर बहस क्यों नहीं कराई?’ -स्वामी का सबसे बड़ा सवाल

स्वामी ने इस पूरे मामले को कथित ‘चंदा चोरी’ के मुद्दे से जोड़ते हुए कहा कि संसद में अगर मोदी बयान देते तो यूपी समेत देशभर के लोग उन पर विश्वास नहीं करते. उनके मुताबिक, प्रधानमंत्री खुद इस स्थिति को जानते हैं और इसी वजह से बहस नहीं कराई गई.

यह स्वामी का आरोप है, लेकिन उनका अंदाज हमेशा की तरह ऐसा है कि आरोप से ज्यादा सवाल सुर्खियां बन जाते हैं. उनकी नजर में अगर सरकार के पास छिपाने के लिए कुछ नहीं है तो संसद में खुलकर बहस क्यों नहीं होती? और इसी सवाल के साथ उनकी शुरुआती सलाह फिर सामने आ जाती है- “जल्द रिटायर हो जाएं, वरना जेल जाएंगे.”

राजनीति में स्वामी के बयान अक्सर तलवार की तरह आते हैं- धार इतनी तेज कि सामने वाला बचाव में आए, उससे पहले बयान सुर्खी बन चुका होता है. मोदी सरकार को लेकर उनका यह ताजा बयान भी उसी अंदाज का है. अब इन आरोपों में कितनी सच्चाई है, यह अलग बहस है; लेकिन स्वामी ने इतना जरूर कर दिया है कि सत्ता के दरवाजे पर एक बार फिर वही पुराना सवाल खड़ा हो गया है- कुर्सी कितनी भी मजबूत हो, हिसाब-किताब से हमेशा के लिए बचा जा सकता है क्या?

स्टेट मिरर स्पेशलनरेंद्र मोदी
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