Strategic Autonomy या Tactical Adjustment! मोदी सरकार की विदेश नीति का पूरा सच क्या?
मोदी सरकार की विदेश नीति में Strategic Autonomy, Tactical Adjustment और Multi-alignment का क्या संतुलन है? रूस, अमेरिका, चीन और पश्चिम एशिया से संबंधों के जरिए समझिए.
इजरायल गाजा वॉर, ईरान अमेरिका वॉर और रूस-यूक्रेन वॉर की वजह से पूरी दुनिया अस्थिरता के दौर में हैं. ऐसे में पीएम मोदी सरकार की विदेश नीति और भारतीय हित को समझने के लिए सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या केंद्र सरकार Strategic Autonomy यानी रणनीतिक स्वायत्तता के रास्ते पर चल रही है या बदलते संकटों के बीच अलग-अलग शक्तियों के साथ Tactical Adjustment यानी सामरिक तालमेल कर रही है? रूस-यूक्रेन युद्ध से लेकर अमेरिका-चीन तनाव और पश्चिम एशिया के संघर्ष तक भारत ने किसी एक गुट के साथ पूरी तरह खड़े होने के बजाय अपने राष्ट्रीय हितों के अनुसार अलग-अलग देशों के साथ संबंध साधे हैं.
इस नीति की खासियत यह है कि भारत अमेरिका के साथ रक्षा, तकनीक और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सहयोग बढ़ा रहा है, तो दूसरी ओर रूस के साथ रक्षा और ऊर्जा संबंध भी बनाए हुए है. 2023-24 में भारत-रूस द्विपक्षीय व्यापार 65.70 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा. वहीं फरवरी 2025 में भारत और अमेरिका ने रक्षा सहयोग को आगे बढ़ाने के लिए नए 10 वर्षीय ढांचे पर काम करने और 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को 500 अरब डॉलर तक ले जाने का लक्ष्य रखा. यानी सवाल यह नहीं है कि भारत किस खेमे में है, बल्कि यह है कि भारत किस मुद्दे पर किस देश के साथ और क्यों खड़ा है?
Strategic Autonomy क्या है?
Strategic Autonomy का अर्थ है कि भारत किसी एक महाशक्ति या सैन्य गठबंधन पर पूरी तरह निर्भर हुए बिना अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर विदेश नीति के फैसले ले. यह अवधारणा मोदी सरकार के साथ शुरू नहीं हुई है. भारत की विदेश नीति में स्वतंत्र निर्णय और रणनीतिक स्वायत्तता की सोच लंबे समय से मौजूद रही है.
मोदी सरकार ने इस सोच पर जोर देते हुए कई शक्तियों के साथ एक साथ संबंध मजबूत किए हैं. अमेरिका के साथ रक्षा और तकनीकी सहयोग बढ़ा है, रूस के साथ रक्षा और ऊर्जा संबंध कायम हैं, पश्चिम एशिया में इजरायल और ईरान दोनों के साथ भारत ने अपने हितों के अनुसार संबंध बनाए हैं और विकासशील देशों के बीच अपनी भूमिका बढ़ाने की कोशिश की है.
इसका एक बड़ा उदाहरण 2023 में आयोजित Voice of Global South Summit है, जिसमें 125 देशों ने भाग लिया था. इसका मकसद विकासशील देशों की चिंताओं को वैश्विक मंच पर अधिक मजबूती से रखना था. इसलिए रणनीतिक स्वायत्तता का अर्थ दुनिया से दूरी बनाना नहीं है. इसका अर्थ है- ज्यादा से ज्यादा देशों से संबंध रखना, लेकिन किसी एक शक्ति पर पूरी तरह निर्भर न होना.
Tactical Adjustment कैसे काम करता है?
यहां एक जरूरी बात समझना महत्वपूर्ण है. Tactical Adjustment भारत सरकार द्वारा घोषित कोई औपचारिक विदेश नीति सिद्धांत नहीं है. यह एक डिप्लोमैटिक स्ट्रेटजी है, जिसके जरिए भारत के रुख को दूसरे देशों के साथ कैसा, को समझा जा सकता है. इसका मतलब है कि किसी संकट के समय भारत अपने दीर्घकालिक हितों को बनाए रखते हुए तत्काल परिस्थितियों के अनुसार अपनी कूटनीतिक प्राथमिकताओं में बदलाव करता है.
रूस-यूक्रेन युद्ध इसका बड़ा उदाहरण है. भारत ने रूस के साथ अपने पुराने रक्षा और ऊर्जा संबंध खत्म नहीं किए. 2024 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रूस की यात्रा की और 22वें भारत-रूस वार्षिक शिखर सम्मेलन में हिस्सा लिया. इसी अवधि में दोनों देशों के बीच व्यापार 65.70 अरब डॉलर तक पहुंच गया.
दूसरी तरफ अमेरिका के साथ भारत ने रक्षा, तकनीक, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, महत्वपूर्ण आपूर्ति श्रृंखला और रक्षा उत्पादन जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाया. फरवरी 2025 के भारत-अमेरिका संयुक्त बयान में रक्षा सहयोग और 2030 तक 500 अरब डॉलर के व्यापार लक्ष्य का उल्लेख किया गया. यानी रणनीतिक लक्ष्य स्थिर रह सकता है, लेकिन संकट के समय व्यावहारिक तरीका परिस्थितियों के अनुसार बदल सकता है.
अमेरिका और रूस के बीच भारत का संतुलन
भारत की विदेश नीति को समझने के लिए अमेरिका और रूस के साथ उसके संबंध सबसे महत्वपूर्ण उदाहरण हैं. अमेरिका के साथ भारत का रक्षा संबंध अब केवल हथियार खरीद तक सीमित नहीं है. दोनों देशों ने रक्षा उत्पादन, स्वायत्त प्रणालियों, अंतरिक्ष, वायु रक्षा, समुद्री क्षेत्र और उन्नत तकनीक में सहयोग बढ़ाने की दिशा में कदम उठाए हैं. अमेरिका ने भारत को प्रमुख रक्षा साझेदार और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में महत्वपूर्ण साझेदार के रूप में रेखांकित किया है.
दूसरी ओर रूस के साथ भारत का रक्षा संबंध भी कायम है. विदेश मंत्रालय के अनुसार दोनों देशों के बीच सहयोग खरीद-बिक्री तक सीमित नहीं रहा है, बल्कि संयुक्त अनुसंधान, विकास और उत्पादन तक पहुंच चुका है. भारत में टी-90 टैंक और एसयू-30 एमकेआई जैसे सैन्य प्लेटफॉर्म का उत्पादन इसका उदाहरण है.
चीन के साथ संतुलित रणनीति
चीन के साथ भारत की रणनीति सुरक्षा और संवाद, दोनों को साथ लेकर चलने की है. 2020 के गलवान संघर्ष के बाद भारत ने सीमा पर सैन्य सतर्कता बढ़ाई, लेकिन कूटनीतिक बातचीत भी जारी रखी. 2024 में दोनों देशों के बीच पूर्वी लद्दाख में गश्त और सैन्य गतिरोध कम करने को लेकर सहमति बनी, जिसके बाद संबंधों को धीरे-धीरे सामान्य करने की कोशिश तेज हुई. 2026 में भी सीमा संबंधी संवाद जारी है और भारत का जोर सीमा पर शांति को द्विपक्षीय संबंधों की आधारशिला बनाए रखने पर है.
साथ ही भारत चीन पर आर्थिक निर्भरता घटाने, हिंद-प्रशांत में साझेदारियां मजबूत करने और अपनी सैन्य क्षमता बढ़ाने पर भी जोर दे रहा है. यानी नीति न पूरी टकराव की है, न पूरी नरमी की, सीमा पर दृढ़ता और कूटनीति में संवाद इसका मूल आधार है. यही वह बिंदु है, जहां भारत की रणनीतिक स्वायत्तता सबसे स्पष्ट दिखाई देती है. भारत अमेरिका के करीब जा रहा है, लेकिन रूस से अलग नहीं हो रहा.
पश्चिम एशिया में भी एक ही खेमे की नीति नहीं
पश्चिम एशिया में भारत का रुख भी इसी संतुलन को दिखाता है. इजरायल के साथ भारत के रक्षा और तकनीकी संबंध मजबूत हैं. वहीं ईरान के साथ भारत का संपर्क भी जारी है. चाबहार बंदरगाह भारत के लिए ईरान के साथ संबंधों का महत्वपूर्ण आधार है.
अक्टूबर 2024 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन से मुलाकात की. दोनों नेताओं ने चाबहार बंदरगाह से जुड़े दीर्घकालिक समझौते को द्विपक्षीय संबंधों में महत्वपूर्ण कदम बताया. पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच दोनों पक्षों ने तनाव कम करने और कूटनीति के जरिए समाधान की जरूरत पर भी जोर दिया.
दूसरी ओर 2024-25 में भारत और इजरायल के बीच वस्तु व्यापार करीब 3.75 अरब डॉलर रहा. यानी भारत के सामने एक जटिल स्थिति है— इजरायल के साथ रणनीतिक सहयोग और ईरान के साथ संपर्क, दोनों को एक साथ बनाए रखना.
किस नीति पर ज्यादा जोर है?
मोदी सरकार की विदेश नीति को केवल Strategic Autonomy या केवल Tactical Adjustment कहना पूरी तस्वीर नहीं बताता. गहराई से देखें तो सही यह निकलता है कि Strategic Autonomy भारत का व्यापक रणनीतिक लक्ष्य है, जबकि Tactical Flexibility उस लक्ष्य को हासिल करने का व्यावहारिक तरीका है. इसके कम से कम तीन स्पष्ट संकेत हैं.
- पहला, भारत अमेरिका के साथ रक्षा और तकनीकी सहयोग बढ़ा रहा है, लेकिन किसी औपचारिक सैन्य गठबंधन का हिस्सा नहीं बना है.
- दूसरा, रूस के साथ रक्षा और ऊर्जा संबंध जारी हैं और दोनों देशों के बीच व्यापार 2023-24 में 65.70 अरब डॉलर तक पहुंचा.
- तीसरा, भारत बड़ी शक्तियों से आगे बढ़कर विकासशील देशों के साथ भी अपनी स्वतंत्र भूमिका बनाने की कोशिश कर रहा है. 2023 के Global South सम्मेलन में 125 देशों की भागीदारी इसका उदाहरण है.
इसलिए यह कहना बेहतर होगा कि भारत की मंजिल Strategic Autonomy है, लेकिन वहां पहुंचने का रास्ता बहु-साझेदारी और सामरिक लचीलेपन से होकर गुजरता है.
मोदी सरकार की नीति कितनी कारगर?
वर्तमान बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था में यह नीति भारत को काफी रणनीतिक लचीलापन देती है अमेरिका से रक्षा और तकनीक में सहयोग लेते हुए भारत रूस से ऊर्जा और रक्षा संबंध बनाए रख सकता है. यूरोप के साथ व्यापार और तकनीकी सहयोग बढ़ा सकता है और पश्चिम एशिया में अलग-अलग देशों के साथ अपने हितों के अनुसार संबंध रख सकता है. इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि भारत किसी एक शक्ति की विदेश नीति का अनुयायी बनने से बचता है. लेकिन इस नीति की सीमाएं भी हैं.
अगर अमेरिका और चीन के बीच प्रतिस्पर्धा और तेज होती है, रूस और पश्चिम के बीच टकराव लंबा चलता है और पश्चिम एशिया में संघर्ष बढ़ता है, तो सभी पक्षों के साथ संतुलन बनाए रखना कठिन हो सकता है. दूसरी चुनौती भरोसे की है. बहुत ज्यादा लचीलापन कभी-कभी साझेदार देशों को यह सोचने पर मजबूर कर सकता है कि संकट के समय भारत किस सीमा तक उनके साथ खड़ा रहेगा.
इसलिए इस नीति की असली सफलता केवल संबंधों की संख्या से नहीं, बल्कि राष्ट्रीय हित, विश्वसनीयता और रणनीतिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन से तय होगी. यानी भारत की विदेश नीति में Strategic Autonomy लक्ष्य है, Multi-alignment उसका ढांचा और Tactical Adjustment बदलते संकटों से निपटने का तरीका है.




