अंतरिक्ष में फिट कैसे रहेंगे इंसान? चूहों पर हुई रिसर्च ने खोले NASA के बड़े राज
अंतरिक्ष में इंसानी शरीर कैसे बदलता है? NASA की चूहों पर हुई रिसर्च से सामने आए बड़े खुलासे, मंगल मिशन के लिए क्या है नई चुनौती. आइए जानते हैं पूरी कहानी.
अंतरिक्ष की चमक-दमक और रोमांचक तस्वीरों के पीछे एक सख्त हकीकत छिपी है. यह इंसानी शरीर के लिए सबसे कठिन परीक्षाओं में से एक है. जैसे ही कोई अंतरिक्ष यात्री धरती के गुरुत्वाकर्षण से बाहर निकलता है, शरीर में ऐसे बदलाव शुरू हो जाते हैं जो सामान्य जीवन की कल्पना से परे हैं.
माइक्रोग्रैविटी में मांसपेशियां तेजी से कमजोर होने लगती हैं, हड्डियां अपना घनत्व खो देती हैं और संतुलन बनाए रखना भी चुनौती बन जाता है. ऐसे में वैज्ञानिकों के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है. आखिर लंबे समय तक अंतरिक्ष में रहने वाले इंसान को स्वस्थ, मजबूत और मिशन के लिए तैयार कैसे रखा जाए?
मंगल ग्रह जैसे मिशन, जहां यात्रा कई सालों तक चल सकती है, इस चैलेंज को और गंभीर बना देते हैं. लेकिन हैरानी की बात यह है कि इस जटिल समस्या का समाधान किसी हाई-टेक मशीन में नहीं, बल्कि छोटे-से जीव- चूहों में मिल रहा है. अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) पर किए गए हालिया प्रयोगों ने अंतरिक्ष में शरीर की फिटनेस को लेकर कई अहम राज खोले हैं.
चूहे आखिर अंतरिक्ष रिसर्च के 'हीरो' कैसे बन गए?
इंसानों की तरह ही चूहों के शरीर की बनावट और जैविक प्रक्रिया कई मामलों में मिलती-जुलती है, यही वजह है कि वैज्ञानिक दशकों से उन्हें रिसर्च का अहम हिस्सा मानते आए हैं. NASA के अनुसार, चूहों पर किए गए प्रयोगों से यह समझना आसान हो जाता है कि अंतरिक्ष जैसी कठिन परिस्थितियों में इंसानी शरीर—खासकर मांसपेशियां और हड्डियां, कैसे प्रतिक्रिया देती हैं?
एक महत्वपूर्ण प्रयोग के तहत चूहों को अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) भेजा गया, जहां उन्हें अलग-अलग गुरुत्वाकर्षण स्थितियों में करीब एक महीने तक रखा गया. इस दौरान उनकी शारीरिक गतिविधियों, मांसपेशियों की ताकत और ओवरऑल हेल्थ का बारीकी से विश्लेषण किया गया, जिससे वैज्ञानिकों को बेहद अहम डेटा मिला.
यूनिवर्सिटी ऑफ रोड आइलैंड की फिजियोलॉजिस्ट Marie Mortreux बताती हैं कि 'extremely complicated and costly' होने के कारण इंसानों पर सीधे ऐसे प्रयोग करना बेहद मुश्किल होता है. ऐसे में चूहे वैज्ञानिकों के लिए एक भरोसेमंद और प्रभावी विकल्प बन जाते हैं, जो कम समय में बड़े और उपयोगी नतीजे देने में सक्षम हैं.
क्या है ‘ग्रैविटी थ्रेशोल्ड’ और क्यों है यह इतना अहम?
इस रिसर्च की सबसे बड़ी खोज रही. ग्रैविटी थ्रेशोल्ड, यानी वह न्यूनतम गुरुत्वाकर्षण स्तर जो मांसपेशियों को स्वस्थ बनाए रख सके.
वैज्ञानिकों ने क्या पाया?
0.33g गुरुत्वाकर्षण पर: मांसपेशियों का आकार तो बना रहा, लेकिन ताकत कम हो गई. 0.67g गुरुत्वाकर्षण पर: मांसपेशियां लगभग पूरी तरह सुरक्षित रहीं. अब सबसे बड़ी चिंता ये है कि मंगल ग्रह का गुरुत्वाकर्षण केवल 0.38g है. जो इस थ्रेशोल्ड से कम है. मंगल पर रहने से शरीर फिट नहीं रह पाएगा.
क्या एक्सरसाइज ही है अंतरिक्ष फिटनेस का समाधान?
गुरुत्वाकर्षण के अलावा वैज्ञानिक अब एक्सरसाइज पर भी फोकस कर रहे हैं और इसमें भी चूहों ने अहम भूमिका निभाई है. Johns Hopkins University की एक स्टडी में पाया गया कि जंपिंग एक्सरसाइज से चूहों के कार्टिलेज की गुणवत्ता 26% तक बेहतर हुई.
इस रिसर्च के लीड साइंटिस्ट Marco Chiaberge ने कहा कि 'ये परिणाम अप्रत्याशित थे, और इसे अंतरिक्ष यात्रियों पर लागू करने की संभावना पर विचार करना दिलचस्प है.' भविष्य में अंतरिक्ष यात्रियों के लिए हाई-इम्पैक्ट एक्सरसाइज जरूरी हो सकती है. स्पेशल ट्रेनिंग प्रोग्राम बनाए जाएंगे, स्पेस के लिए अलग फिटनेस सिस्टम तैयार होगा. मंगल तक पहुंचने में सालों लग सकते हैं और इस दौरान अंतरिक्ष यात्री लंबे समय तक लो-ग्रैविटी में रहेंगे.
इस रिसर्च से तीन बड़े निष्कर्ष सामने आए-
- मंगल का गुरुत्वाकर्षण शरीर के लिए पर्याप्त नहीं
- आर्टिफिशियल ग्रैविटी या एक्सरसाइज मशीन जरूरी होंगी
- जानवरों पर रिसर्च भविष्य के मिशन के लिए बेहद जरूरी है
NASA के वैज्ञानिकों के अनुसार 'चूहे वैज्ञानिकों को पूरे शरीर में मांसपेशियों की कमी का अध्ययन करने की अनुमति देते हैं, जो पृथ्वी पर इस तरह से संभव नहीं है.'
क्या चूहों से तय होगा इंसानों का अंतरिक्ष भविष्य?
जो प्रयोग दिखने में छोटे लगते हैं, वही भविष्य के सबसे बड़े मिशन की नींव बन रहे हैं. चूहों पर की गई ये रिसर्च न सिर्फ अंतरिक्ष यात्रियों की फिटनेस को समझने में मदद कर रही है, बल्कि बेहतर स्पेसक्राफ्ट और मिशन डिजाइन करने में भी अहम भूमिका निभा रही है.




