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Exclusive: सोनागाछी की मिट्टी से बनती है मां दुर्गा की प्रतिमा, फिर उन्हीं महिलाओं को पूजा से क्यों रोका गया? हाईकोर्ट तक पहुंची लड़ाई

कोलकाता के सोनागाछी में यौनकर्मियों ने दुर्गा पूजा के अधिकार के लिए विरोध का सामना किया और हाईकोर्ट तक लड़ाई लड़ी. जानिए उनके संघर्ष, जिंदगी और समाज के दोहरे रवैये की कहानी.

Exclusive: सोनागाछी की मिट्टी से बनती है मां दुर्गा की प्रतिमा, फिर उन्हीं महिलाओं को पूजा से क्यों रोका गया? हाईकोर्ट तक पहुंची लड़ाई
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कोलकाता के सोनागाछी में दुर्गा पूजा सिर्फ एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि अपने अधिकारों और सम्मान के लिए लड़ी गई लंबी लड़ाई की कहानी भी है. एशिया के सबसे बड़े रेड लाइट इलाकों में शामिल सोनागाछी की यौनकर्मियों को कभी मां दुर्गा की पूजा करने से रोका गया था. स्थानीय लोगों के विरोध और पुलिस की रोक के बावजूद महिलाओं ने हार नहीं मानी.

उन्होंने घरों के भीतर मूर्ति रखकर पूजा की और फिर अपने अधिकार के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाया. लंबी कानूनी लड़ाई के बाद आज यहां महिलाएं खुले तौर पर दुर्गा पूजा आयोजित कर रही हैं. बुधवार, 14 अक्टूबर को सोनागाछी में 14वें दुर्गा पूजा उत्सव की शुरुआत हुई. इस मौके पर NB न्यूज के संवाददाता हिरक ज्योति डेका ने यहां की महिलाओं से बात की और उनके संघर्ष, जिंदगी और समाज के दोहरे रवैये को समझने की कोशिश की.

जब मां दुर्गा की पूजा करने से रोक दिया गया

सोनागाछी की महिलाओं के लिए दुर्गा पूजा आयोजित करने का रास्ता आसान नहीं था. दरबार महिला समन्वय समिति (DMSC) से जुड़ी महिलाओं के मुताबिक, जब उन्होंने साल 2013 में पूजा शुरू करने की कोशिश की, तब स्थानीय लोगों और पुलिस की ओर से विरोध का सामना करना पड़ा. महिलाओं को यह कहकर रोका गया कि वे पूजा कैसे कर सकती हैं.

एक महिला ने NB न्यूज को बताया कि पुलिस-प्रशासन ने करीब दो साल तक उन्हें पूजा करने की अनुमति नहीं दी. इसके बावजूद महिलाओं ने अपनी आस्था नहीं छोड़ी. उन्होंने घर के भीतर मां दुर्गा की प्रतिमा स्थापित की और पूजा-अर्चना जारी रखी.

यह उनके लिए सिर्फ धार्मिक आस्था का सवाल नहीं था. वे उस सोच को चुनौती देना चाहती थीं, जो उनके पेशे के कारण उन्हें समाज के बाकी लोगों से अलग मानती थी. उनके मन में सवाल था कि जब वे भी मां दुर्गा की भक्त हैं, तो उन्हें पूजा करने से क्यों रोका जाए?

अधिकार के लिए हाईकोर्ट पहुंचीं महिलाएं

बार-बार विरोध का सामना करने के बाद सोनागाछी की महिलाओं ने कानूनी रास्ता चुना. उन्होंने पूजा आयोजित करने के अधिकार के लिए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया. महिला के मुताबिक, अदालत में लड़ाई लड़ने के बाद उन्हें पूजा के लिए जगह मिली, जहां अब वे हर साल मां दुर्गा की आराधना करती हैं. महिलाओं ने साफ किया कि पूजा का आयोजन मुख्य रूप से वे खुद करती हैं. उनके लिए यह आयोजन किसी की दया या सहानुभूति का नतीजा नहीं, बल्कि अपने अधिकार के लिए किए गए संघर्ष का परिणाम है.

सोनागाछी की इस कहानी में आस्था के साथ-साथ सामाजिक भेदभाव के खिलाफ आवाज भी शामिल है. महिलाएं चाहती हैं कि उनके काम के आधार पर उनकी धार्मिक स्वतंत्रता और इंसानी सम्मान को कम न आंका जाए.

‘सोनागाछी की मिट्टी के बिना पूजा नहीं होती, फिर हमें क्यों रोका गया?’

बातचीत के दौरान सोनागाछी की महिलाओं से यह सवाल भी उठा कि जिस मिट्टी को दुर्गा प्रतिमा निर्माण की परंपरा से जोड़ा जाता है, उसी इलाके की महिलाओं को पूजा करने से कैसे रोका जा सकता है? इस पर एक महिला ने कहा कि उन्होंने तय कर लिया था कि वे पूजा करेंगी और अपने इस फैसले से पीछे नहीं हटेंगी. इसी सोच के साथ वे अदालत पहुंचीं और अपने अधिकार के लिए लड़ाई लड़ी.

यह सवाल उनके संघर्ष का सबसे अहम पहलू सामने लाता है. दुर्गा पूजा के दौरान महिलाओं की आस्था और योगदान की चर्चा होती है, लेकिन सोनागाछी की यौनकर्मियों को उसी धार्मिक परंपरा में अपनी जगह बनाने के लिए कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ी.

'मैं अपनी मर्जी से आई थी, किसी के दबाव में नहीं'

सोनागाछी की महिलाओं की जिंदगी सिर्फ पूजा के संघर्ष तक सीमित नहीं है. उनके सामने परिवार, आर्थिक आत्मनिर्भरता, सामाजिक पहचान और अकेलेपन जैसी चुनौतियां भी हैं. NB न्यूज से बातचीत में एक महिला ने बताया कि उसके परिवार में बेटा, बेटी और नाती भी हैं. उसने कहा कि वह अपनी मर्जी से इस पेशे में आई थी और किसी के दबाव में नहीं आई. उसने अपनी जिंदगी को लेकर संतुष्टि भी जताई. हालांकि, हर महिला का अनुभव एक जैसा नहीं है. एक दूसरी महिला ने बताया कि उसका भी परिवार था, लेकिन बाद में सभी उसे छोड़कर चले गए. अब वह खुद कमाती है और उसी से अपना गुजारा करती है. इन महिलाओं की बातें बताती हैं कि सोनागाछी में रहने वाली हर महिला की कहानी अलग है. किसी के लिए यह आजीविका का जरिया है, तो किसी के जीवन में परिवार से दूरी और अकेलेपन का दर्द भी शामिल है.

'रात में बड़े-बड़े लोग आते हैं, दिन में घिन आती है'

बातचीत के दौरान एक महिला ने समाज के दोहरे रवैये पर सवाल उठाया. उसने कहा कि कई प्रभावशाली और बड़े लोग रात में यहां आते हैं, लेकिन दिन के उजाले में इसी इलाके और यहां रहने वाली महिलाओं को लेकर घृणा का भाव दिखाते हैं. उसकी बात उस सामाजिक विरोधाभास की ओर इशारा करती है, जिसमें एक तरफ यौनकर्मियों की सेवाएं लेने वाले लोग मौजूद हैं, वहीं दूसरी तरफ उन्हीं महिलाओं को सम्मान और स्वीकार्यता देने में समाज पीछे हटता है.

यौनकर्मियों के लिए मुश्किल सिर्फ रोजी-रोटी कमाना नहीं है. उन्हें अपनी पहचान के कारण तिरस्कार, सामाजिक दूरी और अपमान का सामना भी करना पड़ता है. ऐसे में सम्मान के साथ जीने और अपनी आस्था के अनुसार पूजा करने की उनकी मांग, उनके व्यापक सामाजिक संघर्ष का हिस्सा बन जाती है.

पेट पालने के लिए काम करती हैं बुजुर्ग महिलाएं

सोनागाछी में कुछ बुजुर्ग महिलाएं भी काम करती हैं. बातचीत में एक महिला ने बताया कि कई उम्रदराज महिलाएं पेट भरने और रोटी के लिए पैसे जुटाने की मजबूरी में यहां आती हैं. यह पहलू सोनागाछी की जिंदगी का एक कठिन सच सामने रखता है. उम्र बढ़ने के साथ आजीविका के विकल्प सीमित हो सकते हैं, लेकिन जरूरतें खत्म नहीं होतीं. ऐसी महिलाओं के लिए रोज की कमाई ही भोजन और जीवन चलाने का सहारा बनती है. उनकी स्थिति यह सवाल भी खड़ा करती है कि उम्रदराज और आर्थिक रूप से कमजोर महिलाओं के लिए सामाजिक सुरक्षा, स्वास्थ्य सुविधाएं और वैकल्पिक आजीविका के अवसर कितने जरूरी हैं.

'सोनागाछी नाम है, लेकिन हर घर में अपनी समस्या है'

जब महिलाओं से पूछा गया कि सोनागाछी में रहने वाली कितनी महिलाएं मानसिक रूप से खुश हैं, तो जवाब में एक महिला ने कहा कि सोनागाछी का नाम भले ही एक जैसा हो, लेकिन यहां हर घर की अपनी समस्या है. यह बात इस इलाके को लेकर बनी एकतरफा छवि से आगे देखने की जरूरत बताती है. यहां रहने वाली सभी महिलाओं की परिस्थितियां, पसंद, मजबूरियां और अनुभव एक जैसे नहीं हैं. किसी की कहानी परिवार से बिछड़ने की है, किसी की आर्थिक आत्मनिर्भरता की, तो किसी की रोजमर्रा के संघर्ष की.

इन महिलाओं को केवल उनके पेशे के आधार पर देखना उनकी पूरी जिंदगी को नजरअंदाज करना होगा. उनके अनुभव बताते हैं कि सम्मान, सुरक्षा, स्वास्थ्य, आर्थिक अवसर और अपने फैसले लेने की आजादी उनके लिए भी उतनी ही जरूरी है, जितनी किसी दूसरे व्यक्ति के लिए.

सोनागाछी की दुर्गा पूजा सिर्फ उत्सव नहीं, अधिकार की पहचान है

सोनागाछी में दुर्गा पूजा का आयोजन उन महिलाओं के लंबे संघर्ष की याद दिलाता है, जिन्होंने विरोध के बावजूद अपनी आस्था को बनाए रखा. पूजा शुरू करने से रोकने के आरोपों से लेकर हाईकोर्ट में अधिकार की लड़ाई तक, उनका सफर बताता है कि धार्मिक स्वतंत्रता और सामाजिक सम्मान की मांग उनके लिए कितनी अहम रही है.

आज जब ये महिलाएं मिलकर मां दुर्गा की पूजा करती हैं, तो यह आयोजन उनके सामूहिक प्रयास और अपने अधिकारों के प्रति दृढ़ता को भी सामने लाता है. उनकी कहानी सिर्फ सोनागाछी तक सीमित नहीं है, बल्कि उस सामाजिक सोच पर भी सवाल उठाती है, जिसमें किसी के पेशे के आधार पर उसकी आस्था और सम्मान को परखने की कोशिश की जाती है.

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