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सैम पित्रोदा ने CJP आंदोलन की तुलना अरब क्रांति से की, जिसने हिला दी तानाशाहों की कुर्सियां, किस-किस की गई सत्ता, कहां छिड़ा गृह युद्ध

सैम पित्रोदा ने CJP आंदोलन की तुलना अरब स्प्रिंग से की. जानिए कैसे ट्यूनीशिया, मिस्र, लीबिया और यमन में सत्ता बदली और सीरिया समेत कई देशों में संघर्ष भड़का.

सैम पित्रोदा ने CJP आंदोलन की तुलना अरब क्रांति से की, जिसने हिला दी तानाशाहों की कुर्सियां, किस-किस की गई सत्ता, कहां छिड़ा गृह युद्ध
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अरब स्प्रिंग एक बार फिर हेडलाइंस में है. वजह है कांग्रेस से जुड़े वरिष्ठ नेता और इंडियन ओवरसीज कांग्रेस के प्रमुख सैम पित्रोदा का 15 अक्टूबर को दिया गया बयान. उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ 'कॉकरोच जनता पार्टी' (CJP) के विरोध प्रदर्शन की तुलना 'अरब स्प्रिंग' से की. 15 अक्टूबर 2026 को न्यूज एजेंसी IANS से बातचीत में पित्रोदा ने इस आंदोलन को युवाओं के साहस, निडर विरोध और जागरूकता का प्रतीक करार दिया है.

सैम पित्रोदा का कहना था कि युवाओं को अपनी बात रखने और व्यवस्था के खिलाफ आवाज उठाने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए. उनसे गलतियां हो सकती हैं, लेकिन इससे उनके विरोध की अहमियत खत्म नहीं हो जाती. हाल ही में उन्होंने अपने एक लेख में ऐसे जनउभार को 'भारतीय मानसून' भी कहा था और इसकी तुलना अरब स्प्रिंग से की थी.

प्रदर्शनकारियों के गुस्से पर क्या बोले?

CJP के विरोध प्रदर्शन के दौरान कथित तौर पर अमर्यादित भाषा के इस्तेमाल पर सवाल उठने के बाद पित्रोदा ने कहा कि कुछ प्रदर्शनकारियों ने तेज आवाज में बात की और अनुचित शब्दों का इस्तेमाल किया. हालांकि, उनके मुताबिक प्रदर्शनकारियों के गुस्से ने कई नए सवालों और चर्चाओं के लिए रास्ता खोला.

उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि वह अनुचित भाषा का समर्थन नहीं करते, लेकिन प्रदर्शन के पीछे मौजूद नाराजगी को समझना जरूरी है. आम आदमी पार्टी (AAP) से CJP के कथित संबंधों के सवाल पर उन्होंने कहा कि इस दावे पर टिप्पणी करने के लिए उनके पास पर्याप्त जानकारी नहीं है. उन्होंने प्रदर्शनकारी युवाओं की हिम्मत, अपनी बात रखने की क्षमता और संघर्ष करने के जज्बे की तारीफ की.

अरब स्प्रिंग की शुरुआत कैसे हुई?

अरब स्प्रिंग 2010 के अंत और 2011 के दौरान पश्चिम एशिया तथा उत्तरी अफ्रीका में फैले जनआंदोलनों की लहर थी. इन आंदोलनों में लोगों ने लंबे समय से सत्ता में बैठे शासकों, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, महंगाई, आर्थिक असमानता और राजनीतिक पाबंदियों के खिलाफ आवाज उठाई.

इसकी शुरुआत दिसंबर 2010 में ट्यूनीशिया से हुई. वहां मोहम्मद बुआजीजी नाम के एक युवा रेहड़ी-पटरी विक्रेता ने सरकारी उत्पीड़न के विरोध में आत्मदाह कर लिया. इस घटना ने जनता के गुस्से को व्यापक विरोध प्रदर्शन में बदलने में अहम भूमिका निभाई. देखते ही देखते आंदोलन दूसरे अरब देशों तक पहुंच गया और कई जगह सरकारों को गंभीर चुनौती मिली.

आंदोलन किन देशों तक पहुंचा?

अरब स्प्रिंग का असर ट्यूनीशिया, मिस्र, लीबिया, यमन, सीरिया, बहरीन, मोरक्को, अल्जीरिया, जॉर्डन और ओमान सहित कई देशों में देखने को मिला. हालांकि, हर देश में आंदोलन का स्वरूप, जनता की मांगें और उसके परिणाम अलग-अलग रहे.

कहीं बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हुए, तो कहीं सरकारों ने विरोध को दबाने की कोशिश की. कुछ देशों में राजनीतिक सुधारों की घोषणाएं हुईं, जबकि अन्य जगह आंदोलन हिंसक संघर्ष और गृहयुद्ध में बदल गए. इस आंदोलन ने पूरे क्षेत्र में शासन व्यवस्था, लोकतंत्र और नागरिक अधिकारों पर बहस को नई दिशा दी.

किन शासकों को छोड़नी पड़ी सत्ता?

अरब स्प्रिंग के दौरान चार देशों में लंबे समय से सत्ता संभाल रहे शासकों को पद छोड़ना पड़ा या सत्ता से हटा दिया गया.

1. ट्यूनीशिया - जीन अल इआबिदीन बेन अली: ट्यूनीशिया के राष्ट्रपति बेन अली ने जनवरी 2011 में व्यापक विरोध प्रदर्शनों के बीच सत्ता छोड़ दी और सऊदी अरब चले गए. उनकी विदाई को अरब स्प्रिंग की शुरुआती बड़ी सफलता माना गया.

2. मिस्र होस्नी मुबारक - करीब तीन दशक तक सत्ता में रहे राष्ट्रपति होस्नी मुबारक ने फरवरी 2011 में जनआंदोलन के दबाव में इस्तीफा दे दिया. राजधानी काहिरा के तहरीर चौक पर हुए प्रदर्शनों ने इस आंदोलन को वैश्विक पहचान दिलाई.

3. लीबिया मुअम्मर गद्दाफी - चार दशक से अधिक समय तक लीबिया पर शासन करने वाले गद्दाफी के खिलाफ 2011 में विद्रोह शुरू हुआ. संघर्ष के दौरान उनका शासन समाप्त हो गया और अक्टूबर 2011 में उनकी हत्या कर दी गई.

4. यमन अली अब्दुल्ला सालेह - यमन के राष्ट्रपति सालेह ने नवंबर 2011 में सत्ता हस्तांतरण संबंधी समझौते पर सहमति जताई. फरवरी 2012 में उनके उत्तराधिकारी अब्दरब्बुह मंसूर हादी ने पद संभाला. हालांकि, बाद में यमन गंभीर राजनीतिक संकट और गृहयुद्ध में फंस गया.

सीरिया में सत्ता कब बदली?

सीरिया में भी 2011 में राष्ट्रपति बशर अल-असद के खिलाफ विरोध प्रदर्शन शुरू हुए थे. लेकिन ट्यूनीशिया, मिस्र और लीबिया के उलट असद उस समय सत्ता से नहीं हटे. विरोध प्रदर्शन धीरे-धीरे लंबे और विनाशकारी गृहयुद्ध में बदल गए, जिसमें लाखों लोग विस्थापित हुए.

दिसंबर 2024 में विद्रोही बलों के दमिश्क पहुंचने के बाद असद सरकार गिर गई. इसके बाद बशर अल-असद रूस चले गए. इस तरह सीरिया में सत्ता परिवर्तन अरब स्प्रिंग की शुरुआत के करीब 13 साल बाद हुआ.

सैम पित्रोदा कौन हैं?

सैम पित्रोदा का पूरा नाम सत्यनारायण गंगाराम पित्रोदा है. पित्रोदा का जन्म 4 मई 1942 को ओडिशा के तितलागढ़ में हुआ था. वह इंजीनियर, इनवेंटर्स और टेलीकम्युनिकेशन एक्सपर्ट हैं. पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के तकनीकी सलाहकार के रूप में उन्होंने भारत में दूरसंचार नेटवर्क के विकास में अहम भूमिका निभाई. वह सेंटर फॉर डेवलपमेंट ऑफ टेलीमैटिक्स (C-DOT) से भी जुड़े रहे.

पित्रोदा कांग्रेस के वरिष्ठ सलाहकार और इंडियन ओवरसीज कांग्रेस के प्रमुख के रूप में जाने जाते हैं. उनके कई सार्वजनिक बयान पहले भी राजनीतिक बहस और विवाद का कारण बने हैं.

अरब स्प्रिंग से क्या सबक मिला?

अरब स्प्रिंग ने दिखाया कि बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, राजनीतिक दमन और बेहतर भविष्य की उम्मीद जनता को बड़े आंदोलनों के लिए एकजुट कर सकती है. हालांकि, शासकों को हटाना अपने आप में स्थायी लोकतंत्र की गारंटी नहीं बना.

अपने इसी ऐतिहासिक विरासत की वजह से अरब स्प्रिंग का नाम आज भी किसी बड़े जनआंदोलन, युवा असंतोष और सत्ता के खिलाफ उठती आवाजों के संदर्भ में लिया जाता है. सैम CJP के विरोध प्रदर्शन से इसकी तुलना ने भी इसी बहस को फिर सुर्खियों में ला दिया है.

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