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Operation Sindoor: आकाओं को खुश करने में लगा आतंकिस्तान! अमेरिका के बाद चीन को दिया सीजफायर का क्रेडिट

मई 2025 के भारत-पाकिस्तान टकराव और ऑपरेशन सिंदूर को लेकर पाकिस्तान ने एक बार फिर यू-टर्न लिया है. अब तक संघर्ष विराम का श्रेय अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump को देने वाला पाकिस्तान अचानक China को मध्यस्थ बताने लगा है. भारत ने साफ किया है कि सैन्य विराम पाकिस्तान के DGMO की अपील पर हुआ था, किसी तीसरे देश की दखल से नहीं. पाकिस्तान का देर से आया यह बयान उसकी कूटनीतिक मजबूरी, चीन-पाक गठजोड़ और झूठे अंतरराष्ट्रीय नैरेटिव को उजागर करता है.

Operation Sindoor: आकाओं को खुश करने में लगा आतंकिस्तान! अमेरिका के बाद चीन को दिया सीजफायर का क्रेडिट
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( Image Source:  ANI )
नवनीत कुमार
Edited By: नवनीत कुमार

Updated on: 3 Jan 2026 9:05 AM IST

मई 2025 में हुए भारत–पाकिस्तान टकराव (ऑपरेशन सिंदूर) को लेकर पाकिस्तान ने अब एक नया दावा ठोक दिया है. इस बार इस्लामाबाद कह रहा है कि संघर्ष को रोकने में चीन ने मध्यस्थ की भूमिका निभाई. सवाल यह है कि अगर ऐसा था, तो पाकिस्तान करीब एक साल तक चुप क्यों रहा? यह बयान सच्चाई से ज्यादा पाकिस्तान की बौखलाहट और बदलते आकाओं की कहानी कहता है.

अब तक पाकिस्तान इस टकराव के थमने का पूरा श्रेय अमेरिका और तत्कालीन राष्ट्रपति Donald Trump को देता रहा. लेकिन अब वही पाकिस्तान पलटी मारकर बीजिंग के सुर में सुर मिला रहा है. यह साफ दिखाता है कि पाकिस्तान की विदेश नीति सिद्धांतों पर नहीं, बल्कि मालिक बदलने की सुविधा पर टिकी है.

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चीन को खुश करने की कूटनीति

पाक विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ताहिर अंद्राबी ने दावा किया कि चीनी नेतृत्व लगातार पाकिस्तान के संपर्क में था और भारत से भी बातचीत कर रहा था. पाकिस्तान ने चीन के इस दावे को “डिप्लोमेसी फॉर पीस” बताकर समर्थन दे दिया. असल में यह बयान China को खुश करने की कोशिश ज्यादा और तथ्य कम लगता है.

भारत का साफ रुख: कोई तीसरा नहीं

भारत ने शुरू से स्पष्ट किया है कि सैन्य कार्रवाई रोकने का फैसला किसी तीसरे देश की मध्यस्थता से नहीं हुआ. नई दिल्ली के मुताबिक, संघर्ष विराम पाकिस्तान के DGMO की अपील पर हुआ था, न कि वॉशिंगटन या बीजिंग के इशारे पर. भारत ने चीनी विदेश मंत्री वांग यी के उस दावे को भी सिरे से खारिज कर दिया था, जिसमें चीन की मध्यस्थता की बात कही गई थी.

देर से आया बयान

पाकिस्तान का यह “पहला आधिकारिक बयान” अपने आप में कई सवाल खड़े करता है. अगर चीन वाकई मई 2025 में निर्णायक भूमिका में था, तो यह बात उसी समय क्यों नहीं कही गई? एक साल बाद अचानक यह दावा करना बताता है कि पाकिस्तान अपनी नाकामी और सैन्य दबाव को कूटनीतिक जीत में बदलने की कोशिश कर रहा है.

चीन–पाक गठजोड़ की पुरानी चाल

पाकिस्तान ने खुले तौर पर कहा कि वह चीन की स्थिति का “दृढ़ समर्थन” करता है. यह वही पाकिस्तान है, जो हर अंतरराष्ट्रीय मंच पर चीन के बयान को आंख मूंदकर समर्थन देता आया है. चाहे वह भारत के खिलाफ हो या वैश्विक कूटनीति में अपनी प्रासंगिकता साबित करने का मुद्दा.

अमेरिका vs बीजिंग: पाकिस्तान की दुविधा

दिलचस्प यह है कि चीन का यह दावा अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के उन बयानों से मेल खाता है, जिनमें उन्होंने खुद को भारत–पाक टकराव रोकने का नायक बताया था. फर्क बस इतना है कि पाकिस्तान अब तय नहीं कर पा रहा कि किसका एहसान ज्यादा माने- अमेरिका का या चीन का. यही उसकी रणनीतिक उलझन को उजागर करता है.

पाकिस्तान की कहानी नहीं बदली

हकीकत यह है कि भारत ने ऑपरेशन सिंदूर में निर्णायक बढ़त बनाई और उसी दबाव में पाकिस्तान को डी-एस्केलेशन की गुहार लगानी पड़ी. न अमेरिका ने युद्ध रोका, न चीन ने. पाकिस्तान का यह नया दावा सिर्फ अपने घरेलू और अंतरराष्ट्रीय दर्शकों के लिए गढ़ी गई कहानी है, जिसे भारत पहले ही तथ्यों के साथ खारिज कर चुका है.

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