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नेहरू से मोदी तक: 75 साल में 40 फैसले, जब जनता, आंदोलनों और अदालतों के दबाव में केंद्र सरकारों को बदलना पड़ा रुख

नेहरू से मोदी तक 75 वर्षों में केंद्र सरकारों के 40 ऐसे बड़े फैसले जानिए, जिनमें जनता के दबाव, जनआंदोलनों या अदालतों के फैसलों के बाद नीतियां या सरकारी रुख बदला.

नेहरू से मोदी तक: 75 साल में 40 फैसले, जब जनता, आंदोलनों और अदालतों के दबाव में केंद्र सरकारों को बदलना पड़ा रुख
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लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत केवल चुनाव नहीं, बल्कि जनता की आवाज, जनआंदोलन और न्यायपालिका की निगरानी भी होती है. स्वतंत्र भारत के 75 वर्षों में कई ऐसे मौके आए, जब केंद्र सरकारों को अपने फैसलों पर दोबारा विचार करना पड़ा. चाहे वो सरकारें कितनी ही मजबूत क्यों न रही हों? कहीं सड़कों पर उतरे लाखों लोगों के आंदोलन ने सरकार को झुकने पर मजबूर किया, कहीं सुप्रीम कोर्ट के फैसलों ने कानून बदलने का रास्ता दिखाया, तो कहीं व्यापक जनमत ने नीतियों की दिशा बदल दी. जवाहरलाल नेहरू से लेकर नरेंद्र मोदी तक लगभग हर प्रधानमंत्री के कार्यकाल में ऐसे उदाहरण मिलते हैं. हालांकि, इन सभी मामलों में कारण अलग-अलग थे, लेकिन एक बात समान रही- भारतीय लोकतंत्र में सरकार का अंतिम संवाद जनता और संविधान से ही होता है.

जवाहरलाल नेहरू (1947-1964)

भारत का संविधान, संसद की कार्यवाही, सुप्रीम कोर्ट के फैसले, राजपत्र, प्रेस इन्फॉर्मेशन ब्यूरो (PIB), राष्ट्रीय अभिलेखागार और मंत्रालयों के आधिकारिक दस्तावेज के अनुसार स्वतंत्र भारत के शुरुआती वर्षों में नेहरू सरकार को सबसे अधिक चुनौती भाषाई पहचान, सामाजिक सुधार और संघीय ढांचे से जुड़ी मांगों से मिली. देश नया था, इसलिए कई फैसलों में जनता की भावनाओं और आंदोलनों के बाद बदलाव करने पड़े. इनमें:

  1. आंध्र राज्य का गठन (1953) - पोट्टी श्रीरामुलु के आमरण अनशन और व्यापक जनआंदोलन के बाद अलग आंध्र राज्य बनाया गया.
  2. राज्यों का भाषाई पुनर्गठन (1956) - भाषाई आंदोलनों के दबाव के बाद राज्य पुनर्गठन आयोग की सिफारिशों पर नए राज्यों का गठन हुआ.
  3. हिंदू कोड बिल में बदलाव - भारी सामाजिक और राजनीतिक विरोध के बाद इसे एक कानून की जगह अलग-अलग अधिनियमों में पारित किया गया.
  4. राजभाषा विवाद पर आश्वासन - हिंदी को लेकर दक्षिण भारत की चिंताओं के बीच केंद्र ने अंग्रेजी के समानांतर उपयोग का भरोसा दिया.

लाल बहादुर शास्त्री (1964-1966)

शास्त्री का कार्यकाल छोटा रहा, लेकिन भाषा का सवाल सबसे बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन गया.

  1. हिंदी विरोध आंदोलन के बाद नरम रुख - तमिलनाडु सहित दक्षिण भारत में विरोध के बाद केंद्र ने अंग्रेजी जारी रखने का संकेत दिया.
  2. राजभाषा नीति में व्यावहारिक बदलाव - Official Languages Act के प्रभावी क्रियान्वयन में गैर-हिंदी राज्यों की आशंकाओं को ध्यान में रखा गया.

इंदिरा गांधी (1966–1977, 1980–1984)

इंदिरा गांधी के लंबे कार्यकाल में सबसे अधिक जनआंदोलन, न्यायिक टकराव और राजनीतिक संकट देखने को मिले.

  1. बैंक राष्ट्रीयकरण पर न्यायिक चुनौती के बाद नया कानून - सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद संशोधित कानून लाया गया.
  2. प्रिवी पर्स समाप्त करने के लिए संविधान संशोधन - न्यायिक अड़चन के बाद 26वां संशोधन किया गया.
  3. चिपको आंदोलन का प्रभाव - पर्यावरण आंदोलनों के बाद वन संरक्षण नीति को मजबूती मिली.
  4. आपातकाल समाप्त कर चुनाव कराना - व्यापक राजनीतिक दबाव और जन असंतोष के बीच 1977 में चुनाव घोषित किए गए.
  5. प्रेस पर नियंत्रण में ढील - आपातकाल के अंत के साथ मीडिया पर लगाए गए कई प्रतिबंध हटे.

मोरारजी देसाई (1977-1979)

जनता पार्टी सरकार का मुख्य उद्देश्य आपातकाल की व्यवस्थाओं को बदलना था.

  1. 44वां संविधान संशोधन - आपातकाल के दौरान बढ़ी सरकारी शक्तियों को सीमित किया गया.
  2. MISA जैसे कठोर प्रावधानों को हटाने की पहल - नागरिक स्वतंत्रताओं को बहाल करने के लिए कदम उठाए गए.

राजीव गांधी (1984-1989)

राजीव गांधी के दौर में अदालत और राजनीति के बीच कई बड़े टकराव हुए.

  1. शाह बानो फैसले के बाद कानून - सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद मुस्लिम महिला (तलाक) कानून बनाया गया.
  2. असम समझौते का क्रियान्वयन - लंबे छात्र आंदोलन के बाद समझौते को लागू किया गया.
  3. बोफोर्स विवाद के बाद रक्षा खरीद प्रक्रिया में बदलाव - पारदर्शिता को लेकर नई प्रक्रियाओं पर जोर दिया गया.

वी.पी. सिंह (1989–1990)

  1. मंडल आयोग लागू - पिछड़े वर्गों के आरक्षण संबंधी लंबित सिफारिशें लागू की गईं.
  2. आरक्षण विरोध प्रदर्शनों के बाद स्पष्टीकरण - विरोध के बीच सरकार ने नीति की व्याख्या और बचाव किया.

पी.वी. नरसिम्हा राव (1991-1996)

आर्थिक सुधारों के साथ-साथ संवैधानिक बदलाव भी हुए.

  1. 73वां संविधान संशोधन - जन दबाव में पंचायतों को संवैधानिक दर्जा दिया गया.
  2. 74वां संविधान संशोधन - जनता के दबाव में नगर निकायों को अधिक अधिकार मिले.
  3. बाबरी मस्जिद के बाद कार्रवाई - कानून-व्यवस्था और संवैधानिक प्रावधानों के तहत कई कदम उठाए गए.

अटल बिहारी वाजपेयी (1998-2004)

  1. चुनावी उम्मीदवारों के हलफनामे - सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद उम्मीदवारों की संपत्ति और आपराधिक मामलों की जानकारी अनिवार्य हुई.
  2. Freedom of Information Act - सूचना के अधिकार की दिशा में पहला केंद्रीय कानून बना.
  3. POTA पर लगातार बहस और संशोधन - मानवाधिकार संगठनों के दबाव में कई प्रावधानों पर चर्चा हुई.

डॉ. मनमोहन सिंह (2004-2014)

इस दौर में जनआंदोलनों और नागरिक समाज का प्रभाव सबसे अधिक दिखाई दिया.

  1. सूचना का अधिकार कानून (RTI) - लंबे नागरिक अभियानों के बाद कानून लागू हुआ.
  2. मनरेगा - ग्रामीण रोजगार की मांग के बीच ऐतिहासिक कानून बना.
  3. वन अधिकार कानून - आदिवासी संगठनों की मांग के बाद पारित हुआ.
  4. निर्भया आंदोलन के बाद आपराधिक कानून संशोधन (2013) - महिलाओं की सुरक्षा से जुड़े कानून कड़े किए गए.
  5. लोकपाल कानून - अन्ना हज़ारे आंदोलन के बाद संसद ने कानून पारित किया.
  6. भूमि अधिग्रहण कानून 2013 - किसानों और सामाजिक संगठनों की मांगों को ध्यान में रखते हुए नया कानून बनाया गया.

नरेंद्र मोदी (2014–वर्तमान)

मोदी सरकार के दौरान भी कई फैसलों में अदालतों और जनदबाव की भूमिका दिखाई दी.

  1. भूमि अधिग्रहण अध्यादेश वापस - व्यापक राजनीतिक विरोध के बाद अध्यादेश आगे नहीं बढ़ाया गया.
  2. आधार कानून में संशोधन - सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद कई प्रावधान बदले गए.
  3. SC/ST Act संशोधन - सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद संसद ने संशोधन कर मूल प्रावधान बहाल किए.
  4. कृषि कानून वापसी (2021) - एक वर्ष से अधिक चले किसान आंदोलन के बाद तीनों कानून वापस लिए गए.
  5. चुनावी बॉन्ड योजना समाप्त - सुप्रीम Court द्वारा योजना असंवैधानिक घोषित किए जाने के बाद इसे बंद करना पड़ा.
  6. आईटी नियमों में समय-समय पर संशोधन - न्यायिक टिप्पणियों और हितधारकों की प्रतिक्रिया के बाद बदलाव किए गए.
  7. कुछ विधेयकों को संसदीय समिति के पास भेजना - विपक्ष और विशेषज्ञों की मांग के बाद चुनिंदा मामलों में विस्तृत समीक्षा कराई गई.
  8. आपराधिक कानूनों के क्रियान्वयन पर स्पष्टीकरण - नए कानून लागू होने के दौरान राज्यों और अदालतों की टिप्पणियों के आधार पर दिशा-निर्देश जारी किए गए.
  9. डिजिटल डेटा और निजता से जुड़े नियमों में बदलाव - न्यायिक फैसलों और हितधारकों की प्रतिक्रियाओं के बाद सुधार किए गए.
  10. समकालीन नीतियों में न्यायिक निर्देशों के अनुरूप संशोधन- 2025–26 के दौरान विभिन्न मामलों में अदालतों के निर्देशों के अनुसार प्रशासनिक बदलाव किए गए.

किस प्रधानमंत्री को सबसे ज्यादा रुख बदलना पड़ा?

यदि जनआंदोलन, न्यायिक हस्तक्षेप और नीतिगत संशोधनों की संख्या को देखा जाए, तो इंदिरा गांधी, डॉ. मनमोहन सिंह और नरेंद्र मोदी के कार्यकाल सबसे अधिक चर्चा में रहे.

इंदिरा गांधी के दौर में न्यायपालिका, विपक्ष और बड़े जनआंदोलनों से लगातार टकराव हुए. डॉ. मनमोहन सिंह के समय नागरिक समाज, RTI, लोकपाल और निर्भया आंदोलन जैसे अभियानों ने नीति निर्माण को प्रभावित किया.

नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में सुप्रीम कोर्ट के कई महत्वपूर्ण फैसलों तथा किसान आंदोलन जैसे बड़े जनदबाव के बाद कुछ प्रमुख नीतियों और कानूनों में बदलाव देखने को मिले. हालांकि, हर बदलाव केवल दबाव का परिणाम नहीं था. कई फैसले राजनीतिक सहमति, संवैधानिक बाध्यता, न्यायिक निर्देश, प्रशासनिक आवश्यकता और बदलती परिस्थितियों के संयुक्त प्रभाव से लिए गए.

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