क्या Meta मोदी सरकार के कंट्रोल से बाहर है, अगर नहीं तो क्यों चल रहा बच्चों के शोषण का विज्ञापन?
सरकारी कार्रवाई के बाद भी Meta पर CSAM विज्ञापनों का मामला AI moderation, प्लेटफॉर्म की जवाबदेही और बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा पर गंभीर सवाल उठाता है.
सोशल मीडिया पर दिखने वाला एक विज्ञापन कुछ सेकंड का हो सकता है, लेकिन उससे उठने वाला सवाल बेहद गंभीर है. जब भारत में बच्चों के यौन शोषण से जुड़ी सामग्री के खिलाफ कानून हैं, सरकार Meta को कार्रवाई के निर्देश पहले ही दे चुकी है और कंपनी खुद ऐसी सामग्री के खिलाफ “zero tolerance” नीति का दावा करती है, तो फिर Instagram और Facebook पर ऐसे विज्ञापन चल कैसे रहे हैं? Tech Transparency Project (TTP), BBC, MeitY, NHRC और NCPCR की जांच ने Meta की विज्ञापन सिस्टम पर फिर गंभीर सवाल खड़े किए हैं.
क्या Meta भारत सरकार के नियंत्रण से बाहर है?
Meta भारत में Information Technology Act और IT Rules के दायरे में काम करता है. सरकार के पास गैरकानूनी सामग्री हटाने के निर्देश देने और प्लेटफॉर्म से जवाब मांगने के अधिकार हैं. जुलाई 2026 में BBC की पड़ताल के बाद इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) ने Instagram पर बच्चों के यौन शोषण से जुड़ी सामग्री यानी CSAM वाले कंटेंट और विज्ञापनों के खिलाफ कार्रवाई के निर्देश दिए थे.
इसलिए असली सवाल यह नहीं है कि सरकार Meta को नियंत्रित कर सकती है या नहीं. सवाल यह है कि सरकारी कार्रवाई के बावजूद ऐसे विज्ञापन दोबारा प्लेटफॉर्म तक कैसे पहुंच रहे हैं.
सरकारी कार्रवाई के बाद भी विज्ञापन कैसे चले?
TTP के मुताबिक फेसबुक और इंस्टाग्राम पर CSAM से जुड़े 332 विज्ञापन मिले. इनमें 274 विज्ञापन अगस्त 2026 में चलाए गए थे. रिपोर्ट के अनुसार 84 विज्ञापन भारत में दिखाए गए और इनमें से 78 विज्ञापन सरकारी कार्रवाई के बाद प्रकाशित हुए.
TTP ने भारत में मिले 84 विज्ञापनों में से 55 को Meta के रिपोर्टिंग सिस्टम के जरिए रिपोर्ट करने की कोशिश की. रिपोर्ट के मुताबिक 43 मामलों में Meta ने जवाब दिया कि विज्ञापन उसके advertising स्टैंडर्ड का उल्लंघन नहीं करते. 11 विज्ञापनों के बारे में बताया गया कि वे पहले ही हटाए जा चुके थे.
यहीं Meta की शुरुआती जांच व्यवस्था पर सवाल उठता है. अगर किसी बाहरी जांच में संदिग्ध सामग्री सामने आ रही है, लेकिन प्लेटफॉर्म की अपनी व्यवस्था उसे तुरंत नहीं पकड़ पा रही, तो समस्या सिर्फ कंटेंट हटाने की नहीं बल्कि उसे पहचानने की भी है.
क्या AI moderation सिस्टम नाकाम हो रहा है?
Meta का कहना है कि वह AI और automated systems की मदद से विज्ञापनों की निगरानी करता है. कंपनी के मुताबिक उसके सिस्टम नियमों का उल्लंघन करने वाले विज्ञापनों को रोकते हैं और जो सामग्री शुरुआती जांच में छूट जाती है, उसे बाद में हटाया जाता है.
लेकिन TTP के मुताबिक कई विज्ञापनों में AI-generated या AI-manipulated तस्वीरों और वीडियो का इस्तेमाल किया गया. रिपोर्ट में कुछ वास्तविक बच्चों की तस्वीरों को AI की मदद से आपत्तिजनक सामग्री में बदले जाने का भी दावा किया गया है.
AI के बढ़ते इस्तेमाल ने चुनौती और मुश्किल कर दी है. अब प्लेटफॉर्म को केवल तस्वीर और टेक्स्ट नहीं, बल्कि विज्ञापनदाता, भुगतान व्यवस्था, लिंक और एक जैसे विज्ञापन चलाने वाले खातों के नेटवर्क की भी निगरानी करनी होगी.
क्या सिर्फ विज्ञापन हटाना पर्याप्त है?
हकीकत यह है कि बच्चों के यौन शोषण से जुड़े मामलों में “शिकायत के बाद हटा दिया” पर्याप्त जवाबदेही नहीं हो सकती. सवाल यह है कि ऐसा विज्ञापन पहली जगह Meta के सिस्टम से पास ही क्यों हुआ.
TTP के मुताबिक कई विज्ञापन यूजर्स को ऐसे AI ऐप्स की ओर ले जा रहे थे जिनका इस्तेमाल नकली यौन तस्वीरें बनाने के लिए किया जा सकता है. यानी Facebook और Instagram पर विज्ञापन केवल कंटेंट दिखाने तक सीमित नहीं था, बल्कि यूजर को दूसरी सेवाओं तक पहुंचाने का जरिया भी बन रहा था.
इसलिए Meta को यह स्पष्ट करना चाहिए कि विज्ञापनदाताओं की पहचान कैसे सत्यापित हुई और प्रतिबंधित खातों या नेटवर्क ने नए तरीकों से दोबारा विज्ञापन कैसे चलाए.
भारत में सरकार क्या कार्रवाई कर रही है?
BBC की शुरुआती पड़ताल के बाद राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) समेत कई संस्थाएं एक्टिव हुईं. चाइल्ट राइट्स के क्षेत्र में काम करने वाले Just Rights for Children Alliance ने भी CSAM की पहचान और रिपोर्टिंग को लेकर सुप्रीम कोर्ट Bureau की निदेशक शिखा गोयल से इस बात की शिकायत की है.
Cyber Security ब्यूरो से जुड़ी एक अफसर के मुताबिक मेटा के लिए यह बड़ी चुनौती है. आखिर यूजर का एक प्लेटफॉर्म से दूसरे प्लेटफॉर्म पर आसानी से कैसे चला जाता है. इससे पूरे नेटवर्क को ट्रैक करना मुश्किल हो जाता है.
असली जिम्मेदारी किसकी?
नियम के अनुसार इसकी जिम्मेदारी सरकार और Meta दोनों की है. सरकार को कानून और निर्देशों का प्रभावी पालन सुनिश्चित करना होगा, जबकि Meta को अपने विज्ञापन मॉडरेशन सिस्टम की खामियां दूर करनी होंगी.
TTP की रिपोर्ट यह साबित नहीं करती कि Meta भारत सरकार के नियंत्रण से बाहर है. बल्कि यह सवाल उठाती है कि कानून, सरकारी निर्देश और Meta की “zero tolerance” नीति मौजूद होने के बावजूद enforcement क्यों विफल हो रहा है.
अब Meta से सिर्फ विज्ञापन हटाने का जवाब विज्ञापन बार-बार पर्याप्त नहीं होना चाहिए. कंपनी को बताना चाहिए कि ऐसे विज्ञापन सिस्टम से पास कैसे हुए, कितने लोगों तक पहुंचे, उनसे किसने कमाई की और जिम्मेदार खातों पर क्या कार्रवाई हुई.
आखिर सवाल सीधा है- अगर सरकार के पास कार्रवाई के अधिकार हैं और Meta के पास AI आधारित moderation technology, तो बच्चों के शोषण से जुड़े विज्ञापन बार-बार सिस्टम से निकल क्यों रहे हैं?




