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क्षेत्रीय दलों की कमाई में राजा कौन? ADR रिपोर्ट में हुआ खुलासा, BRS और TMC की तिजोरी सबसे भारी

नेशनल इलेक्शन वॉच और एसोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) की ताजा रिपोर्ट ने एक ऐसा आईना दिखाया है, जिसमें साफ नजर आता है कि कौन सा क्षेत्रीय दल चुनावी राजनीति में सिर्फ नारेबाजी नहीं, बल्कि पैसों के दम पर भी सबसे मजबूत खड़ा है. जहां BRS और TMC पैसों के मामले में सबसे अमीर पार्टी है.

क्षेत्रीय दलों की कमाई में राजा कौन? ADR रिपोर्ट में हुआ खुलासा, BRS और TMC की तिजोरी सबसे भारी
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( Image Source:  X-@MamataOfficial and ANI )
हेमा पंत
Edited By: हेमा पंत5 Mins Read

Updated on: 11 Sept 2025 12:01 PM IST

देश की सियासत में जहां बीजेपी और कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय पार्टियां सुर्खियों में रहती हैं, वहीं ताज़ा नेशनल इलेक्शन वॉच और एसोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) रिपोर्ट ने दिखा दिया है कि क्षेत्रीय दल भी कमाई के मामले में किसी से पीछे नहीं हैं.

वित्त वर्ष 2023-24 में तेलंगाना की भारत राष्ट्र समिति (BRS) और पश्चिम बंगाल की ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने अपनी तिजोरियों को सबसे ज्यादा भरा है. आंकड़े साफ़ बताते हैं कि ये पार्टियां भले ही राज्यों तक सीमित हों, लेकिन फंडिंग और वित्तीय ताकत के दम पर राष्ट्रीय स्तर पर भी बड़ी चुनौती पेश कर रही हैं.

BRS बनी सबसे बड़ी खिलाड़ी

तेलंगाना के पूर्व मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव की पार्टी भारत राष्ट्र समिति (BRS) इस रेस में सबसे आगे निकली. वित्त वर्ष 2023-24 में बीआरएस ने 685.51 करोड़ रुपये की आय घोषित की, जो कुल क्षेत्रीय दलों की कमाई का 27.07% है. यानी अकेले बीआरएस ने चौथाई से ज्यादा आय पर कब्जा कर लिया. यह आंकड़ा यह बताने के लिए काफी है कि तेलंगाना की राजनीति में बीआरएस भले ही सत्ता से बाहर हो, लेकिन आर्थिक रूप से वह अब भी सबसे ताकतवर दल है.

तृणमूल कांग्रेस का उभार

इस सूची में दूसरा नाम है पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस (AITC) का. 2023-24 में तृणमूल ने 646.39 करोड़ रुपये की आय दर्ज की. यह कुल आय का 25.53% है. दिलचस्प बात यह है कि तृणमूल कांग्रेस ने सिर्फ एक साल में अपनी कमाई लगभग दोगुनी कर ली. 2022-23 में इसकी आय 333.45 करोड़ रुपये थी, जबकि 2023-24 में यह बढ़कर 646.39 करोड़ रुपये पहुंच गई. यानी 312.19 करोड़ रुपये की रिकॉर्ड बढ़ोतरी. ममता बनर्जी का यह आर्थिक उभार बताता है कि बंगाल की राजनीति में उनका किला और भी मजबूत हुआ है.

तीसरे नंबर पर बीजेडी

ओडिशा की राजनीति में दशकों तक राज करने वाले नवीन पटनायक की बीजू जनता दल (BJD) ने भी अपनी ताकत दिखा दी है. बीजेडी ने 2023-24 में 297.80 करोड़ रुपये की आय दर्ज की. बीआरएस और तृणमूल के मुकाबले यह आंकड़ा भले ही छोटा लगे, लेकिन क्षेत्रीय दलों की दुनिया में यह कमाई काफी बड़ी मानी जाती है. खासकर तब, जब रिपोर्ट बताती है कि बीजेडी की आय में पिछले साल के मुकाबले 116.75 करोड़ रुपये की बढ़ोतरी हुई है.

दो दलों की झोली में आधे से ज्यादा कमाई सिर्फ

रिपोर्ट का सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि सिर्फ दो दल – बीआरएस और तृणमूल कांग्रेस ने ही कुल कमाई का आधे से भी ज्यादा हिस्सा अपने नाम कर लिया है. दोनों दलों की संयुक्त आय 1,331.90 करोड़ रुपये रही, जो कुल क्षेत्रीय दलों की आय का 52.39% है. यह आंकड़ा बताता है कि भले ही देश में क्षेत्रीय राजनीति का दायरा बहुत बड़ा है, लेकिन आर्थिक ताकत कुछ चुनिंदा हाथों में सिमटी हुई है.

रिपोर्ट का आधार

ADR और नेशनल इलेक्शन वॉच ने यह रिपोर्ट उन आंकड़ों के आधार पर तैयार की है, जो राजनीतिक दलों ने खुद चुनाव आयोग को सौंपे हैं. यह विश्लेषण 60 में से 40 क्षेत्रीय दलों की ऑडिटेड रिपोर्ट पर आधारित है. यानी ये वही आंकड़े हैं जिन्हें पार्टियों ने आधिकारिक तौर पर अपनी आय और खर्च के रूप में घोषित किया है.

चुनावी मैदान में पैसों का पलड़ा भारी

ADR की ताजा रिपोर्ट ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि राजनीति में पैसों की ताकत कितनी मायने रखती है. बीआरएस और तृणमूल कांग्रेस जैसे क्षेत्रीय दल सिर्फ राज्यों तक सीमित दिखते हैं, लेकिन उनकी आर्थिक ताकत उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर भी बड़ा खिलाड़ी बना देती है. वहीं बीजेडी, टीडीपी और डीएमके जैसे दल भी इस दौड़ में पीछे नहीं हैं. कुल मिलाकर, यह तस्वीर साफ है कि क्षेत्रीय दलों की दुनिया में आर्थिक असमानता बहुत गहरी है. कुछ ही दल करोड़ों की कमाई कर रहे हैं, जबकि दर्जनों दल नाममात्र की आय पर निर्भर हैं. राजनीति के इस आर्थिक खेल से एक बात और साफ होती है कि चुनावी रणभूमि में जीत सिर्फ विचारधारा और जनसमर्थन से नहीं, बल्कि पैसों के दम पर भी तय होती है.

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