16 की उम्र, पिता का अंतिम समय और जिंदगीभर के लिए रह गई एक कसक... गांधी ने खुद बताया अपना ये किस्सा
महात्मा गांधी ने ‘सत्य के प्रयोग’ में पिता की अंतिम रात पत्नी के पास जाने, काम-वासना और अपने ‘दोहरी शर्म’ वाले अपराधबोध के बारे में विस्तार से लिखा था.
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जी का आज जन्मदिन है. वह एक ऐसे महान व्यक्तित्व थे, जिन्हें काफी संख्या में लोग बहुत प्रेम करते हैं और बड़ा सम्मान देते हैं, तो कुछ लोग उन्हें बहुत बुरा भी मानते हैं. और वो महान नाम है 'मोहनदास करमचंद गांधी'. गांधी जी की सबसे खास बात यह है कि उन्होंने अपनी जीवनी खुद लिखी. उन्होंने अपनी आत्मकथा ‘सत्य के प्रयोग’ में जीवन की कई ऐसी घटनाओं के बारे में भी लिखा, जिनमें उनकी गलतियां और पछतावे भी शामिल हैं. उन्हीं में एक घटना ऐसी है, जिसके बारे में जानकर आप भी चौंक जाएंगे.
तो क्या गांधी जी से सच में किशोरावस्था में ऐसी गलती हुई, जिसकी कल्पना आज का Gen Z भी नहीं कर सकता? लेकिन ये बात पूरी तरह सच है. यह घटना उनकी जिंदगी का शर्मिंदगी और अफसोस का ऐसा पहलू है, जिस पर जब तक जिंदा रहे, उन्हें खुद भी अफसोस रहा.
क्या गांधी ने अपनी ऑटोबायोग्राफी ‘दोहरी शर्म’ की बात लिखी?
द लल्लनटॉप की मास्टरजी क्लासरूम में एजुकेटर अवध ओझा ने 5 सितंबर 2026 को गांधी जी के जीवन से जुड़ी ऐसी ही एक घटना का जिक्र किया था. उन्होंने कहा, ‘जब गांधी जी के पिता अंतिम सांस लेने के करीब थे, उस समय भी वो वहां से सीधे अपनी पत्नी (कस्तूरता) के पास गए, दरवाजा बंद किया और जबरदस्ती की. जब उन्होंने जबरदस्ती की, तभी बगल के कमरे से उनके चाचा की चीख आई. मतलब पिताजी मर गए थे. फिर भी उन्होंने अपनी पत्नी को नहीं छोड़ा. परिणाम यह हुआ कि पत्नी के पेट में जो बच्चा था, वह भी मर गया और पिता भी मर गए.’ इस घटना का पश्चाताप गांधी जी को जीवरभर रहा.
हालांकि, गांधी की अपनी आत्मकथा में पत्नी के साथ ‘जबरदस्ती’ करने की बात नहीं लिखी है. गांधी ने इसे अपनी सेक्स की इच्छा और सेल्फ कंट्रोल की कमी के रूप में लिखा है. इसी तरह बच्चे की मृत्यु का उल्लेख तो उन्होंने किया है, लेकिन बच्चे की मौत उस संबंध की वजह से हुई, ऐसा चिकित्सकीय प्रमाण उन्होंने नहीं दिया.
पिता की बीमारी के दौरान गांधी की क्या जिम्मेदारी थी?
महात्मा गांधी ने खुद अपनी आत्मकथा ‘सत्य के प्रयोग’ में इस बात का विस्तार से जिक्र किया है. उन्होंने लिखा- यह मेरे सोलहवें साल की बात है. जैसा कि हमने देखा है, मेरे पिता फिस्टुला यानी भगंदर की बीमारी के कारण बिस्तर पर पड़े थे. मेरी मां और मैं ही उनकी मुख्य देखभाल करने वाले थे. मुझ पर नर्स वाला काम था, जिसमें मुख्य रूप से पिता जी के घाव की पट्टी करना, पिता को दवा देना और जब घर पर दवा बनानी होती थी, तो उसे तैयार करना शामिल था.
हर रात मैं उनके पैरों की मालिश करता था और तभी सोता था, जब वे मुझे ऐसा करने के लिए कहते थे या जब वे सो जाते थे. मुझे यह सेवा करना अच्छा लगता था. मुझे याद नहीं कि मैंने कभी इसमें कोई लापरवाही की हो. रोज के कामों के बाद मेरे पास जो भी समय बचता था, वह स्कूल और पिता की सेवा में बंटा होता था. मैं शाम की सैर के लिए तभी बाहर जाता था, जब वे मुझे इजाजत देते थे या जब उनकी तबीयत ठीक होती थी.
गांधी के मन में पत्नी के पास जाने की इच्छा क्यों रहती थी?
यह वह समय भी था, जब मेरी पत्नी गर्भवती थी. ‘सत्य के प्रयोग’ में गांधी जी ने लिखा है कि यह एक ऐसी स्थिति थी, जैसा कि मैं आज देख सकता हूं, मेरे लिए दोहरी शर्म की बात थी. एक तो यह कि उस समय मैं छात्र था, तब मैंने खुद पर वह संयम नहीं रखा, जो मुझे रखना चाहिए था. और दूसरी बात, शारीरिक वासना ने पढ़ाई के प्रति मेरे कर्तव्य और उससे भी बड़े कर्तव्य यानी माता-पिता के प्रति मेरी सेवा-भावना पर हावी होकर उसे पीछे छोड़ दिया, जबकि बचपन से ही श्रवण कुमार मेरे आदर्श रहे थे.
हर रात जब मेरे हाथ पिता के पैरों की मालिश करने में व्यस्त होते थे, तो मेरा मन बेडरूम के आस-पास घूमता रहता था और वह भी ऐसे समय में, जब धर्म, मेडिकल साइंस और इंसानी समझ सभी यौन संबंध बनाने की मनाही करते थे. मैं हमेशा अपनी पिता की ड्यूटी से छुट्टी मिलने पर खुश होता था और पिता को प्रणाम करने के बाद सीधे बेडरूम में चला जाता था.
उस रात साढ़े दस या ग्यारह बजे आखिर क्या हुआ था?
उसी समय मेरे पिता की हालत हर दिन बिगड़ती जा रही थी. आयुर्वेदिक डॉक्टरों ने अपने सभी मरहम आजमा लिए थे, हकीमों ने अपने लेप और स्थानीय नीम-हकीमों ने अपने नुस्खे आजमा लिए थे. एक अंग्रेज सर्जन ने भी अपनी कुशलता का इस्तेमाल किया था.
आखिरी और एकमात्र उपाय के तौर पर उन्होंने सर्जरी की सलाह दी थी. लेकिन परिवार के डॉक्टर ने इसमें बाधा डाली. उन्हें इतनी अधिक उम्र में सर्जरी करना ठीक नहीं लगा. डॉक्टर काबिल और जाने-माने थे और उनकी सलाह ही मानी गई. ऑपरेशन नहीं हुआ और उसके लिए खरीदी गई दवाइयां बेकार हो गईं.
मुझे लगता है कि अगर डॉक्टर ने ऑपरेशन करने दिया होता, तो घाव आसानी से भर जाता. ऑपरेशन एक ऐसे सर्जन से होना था, जो उस समय बॉम्बे में बहुत मशहूर थे. लेकिन भगवान की मर्जी कुछ और ही थी. जब मौत सामने हो, तो सही इलाज के बारे में कौन सोच सकता है?
मेरे पिता ऑपरेशन का सारा सामान लेकर बॉम्बे से लौटे थे, जो अब किसी काम का नहीं था. उन्हें अब जीने की कोई उम्मीद नहीं बची थी. वे कमजोर होते जा रहे थे, यहां तक कि आखिर में उन्हें बिस्तर पर ही जरूरी काम करने के लिए कहना पड़ा. लेकिन आखिरी समय तक उन्होंने ऐसा कुछ भी करने से इनकार किया. वे हमेशा बिस्तर से उठने की तकलीफ उठाने पर जोर देते रहे. बाहरी सफाई के बारे में वैष्णव नियम बहुत सख्त होते हैं.
ऐसी सफाई बेशक बहुत जरूरी है, लेकिन वेस्टर्न मेडिकल साइंस ने हमें सिखाया है कि नहाना समेत सभी काम बिस्तर पर ही, सफाई का पूरा ध्यान रखते हुए और मरीज को जरा भी तकलीफ दिए बिना किए जा सकते हैं और बिस्तर हमेशा बिल्कुल साफ रहता है. मैं ऐसी सफाई को वैष्णव धर्म के बिल्कुल अनुकूल मानता हूं. लेकिन उस समय बिस्तर छोड़ने की मेरे पिता की जिद ने मुझे हैरान कर दिया था और मैं उनके इस जज्बे की तारीफ ही कर सकता था.
पिता की मौत की खबर गांधी को कब और कैसे मिली?
अपनी आत्मकथा में इस हिस्से में गांधी जी आगे लिखते हैं कि वह भयानक रात आ गई. मेरे चाचा उस समय राजकोट में थे. मुझे धुंधली-सी याद है कि मेरे पिता की हालत बिगड़ने की खबर सुनकर वे राजकोट आए थे. दोनों भाइयों में बहुत गहरा लगाव था. मेरे चाचा दिन भर मेरे पिता के बिस्तर के पास बैठे रहते थे और हम सबको सुलाने के बाद उनके बिस्तर के पास ही सोने की जिद करते थे. किसी ने सोचा भी नहीं था कि यही वह मनहूस रात होगी. बेशक, खतरा तो था ही.
गांधी जी के मुताबिक, ‘रात के साढ़े दस या ग्यारह बज रहे थे. मैं मालिश कर रहा था. मेरे चाचा ने मेरी जगह लेने की पेशकश की. मैं खुश हो गया और सीधे बेडरूम में चला गया. मेरी पत्नी बेचारी गहरी नींद में सो रही थी. लेकिन जब मैं वहां था, तो वह कैसे सो सकती थी? मैंने उसे जगाया. हालांकि, पांच या छह मिनट बाद ही नौकर ने दरवाजा खटखटाया. मैं घबरा गया. उन्होंने कहा, ‘उठो, पिताजी बहुत बीमार हैं.’ मुझे पता था कि वे बहुत बीमार हैं, इसलिए उस पल ‘बहुत बीमार’ होने का क्या मतलब था, यह मैं समझ गया. मैं झटके से बिस्तर से उठा.
नौकर से पूछा- ‘क्या बात है? मुझे बताओ!’ उसने कहा, ‘पिताजी अब नहीं रहे.’ तो सब खत्म हो गया! मैं बस हाथ मलता रह गया. मुझे बहुत शर्म और दुख महसूस हुआ.
सत्य के प्रयोग के अनुसार- गांधी जी दौड़कर पिताजी के कमरे में गए. उन्होंने देखा कि अगर मेरी तीव्र वासना यानी सेक्स की इच्छा ने मुझे अंधा न किया होता, तो मैं पिताजी के आखिरी पलों में उनसे बिछड़ने के दुख से बच जाता. मैं उनकी मालिश कर रहा होता और वे मेरी बाहों में दम तोड़ते. लेकिन अब यह सौभाग्य मेरे चाचाजी को मिला था.
चाचा जी अपने बड़े भाई के प्रति इतने समर्पित थे कि उन्हें उनकी अंतिम सेवा करने का सम्मान मिला! पिताजी को आने वाली घटना का आभास हो गया था. उन्होंने पेन और कागज मंगवाया और लिखा: ‘अंतिम संस्कार की तैयारी करो.’ फिर उन्होंने अपनी बांह से ताबीज और गले से तुलसी की माला उतारकर फेंक दी. इसके कुछ ही पल बाद वे चल बसे.
गांधी ने अपनी 'सेक्स की इच्छा' को लेकर क्या लिखा?
जिस शर्म का जिक्र उन्होंने अपनी आत्मकथा में किया, वह मेरे पिता की मौत के नाजुक समय में भी मेरी काम-वासना यानी जैविक इच्छा की शर्म थी. उस समय उनकी सेवा के लिए जागते रहने की जरूरत थी. मुझ पर यह एक ऐसा दाग था, जिसे मैं कभी मिटा या भुला नहीं पाया और मैंने हमेशा यही सोचा कि भले ही अपने माता-पिता के प्रति मेरी भक्ति की कोई सीमा नहीं थी और मैं उसके लिए कुछ भी त्यागने को तैयार था, फिर भी उसे जब तौला गया तो वह माफी न देने लायक कमजोर साबित हुई, क्योंकि उसी पल मेरा मन काम-वासना के वश में था.
इसलिए मैंने हमेशा खुद को एक कामुक, भले ही वफादार, पति माना है. काम-वासना की बेड़ियों से आजाद होने में मुझे लंबा समय लगा और उस पर काबू पाने से पहले मुझे कई कठिन परीक्षाओं से गुजरना पड़ा.
क्या गांधी के बच्चे की मौत को इस घटना से जोड़ना सही है?
अफसोस की बात या गांधी की दोहरी शर्म की यह कहानी यहीं समाप्त नहीं हुई. उन्होंने आगे लिखा, ‘मैं यह बताना चाहूंगा कि मेरी पत्नी से पैदा हुआ वह नन्हा बच्चा मुश्किल से तीन या चार दिन ही जीवित रह पाया. उससे ज्यादा की उम्मीद भी नहीं की जा सकती थी. जो लोग विवाहित हैं, वे मेरे उदाहरण से सीख लें.’
यानी जिस समय गांधी अपनी पत्नी कस्तूरबा के पास गए, उस समय उनके पिता की हालत बेहद गंभीर थी. पिता के निधन के समय वे अपनी पत्नी के साथ थे और इसी दौरान एक नौकर ने आकर बताया कि उनके पिता का निधन हो गया है. इस घटना को गांधी ने अपने जीवन का बड़ा अपराधबोध माना और इसे खुद के लिए ‘दोहरा लज्जाबोध’ बताया. गांधी ने बाद में यह भी लिखा कि उनकी पत्नी से पैदा हुआ बच्चा तीन या चार दिन ही जीवित रहा. लेकिन बच्चे की मृत्यु का कारण उसी रात हुए शारीरिक संबंध को बताना सही नहीं कहा जा सकता. गांधी ने भी इसे खुद की बायोलॉजिकल निड्स, सेल्फ कंट्रोल की कमी और पिता की अंतिम सेवा से चूक रूप में लिया है.




