बंदूकें खामोश या तूफान से पहले की शांति? 2026 में आतंकवाद पर क्या कहते हैं आंकड़े, 3 तीन दशक में कितना बदला जम्मू-कश्मीर?
2026 के आतंकवाद संबंधी आंकड़े, अनुच्छेद 370 हटने के बाद बदले सुरक्षा हालात, तीन दशक का ट्रेंड, मौतों में गिरावट और जम्मू-कश्मीर की नई सुरक्षा चुनौतियों का डेटा आधारित विश्लेषण.
जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद की कहानी केवल बंदूक और बारूद की नहीं, बल्कि बदलती डिफेंस और सियासी रणनीतियों, सुरक्षा अभियानों और सीमा पार से पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद के उतार-चढ़ाव की भी कहानी है. 1989 में शुरू हुए उग्रवाद ने 1990 के दशक में सबसे भयावह रूप लिया, लेकिन 2026 तक आते-आते तस्वीर काफी बदल चुकी है. South Asia Terrorism Portal (SATP) और सरकारी आंकड़ों के अनुसार, आतंकवाद से होने वाली मौतों में ऐतिहासिक गिरावट दर्ज हुई है. अब आतंक के खौफ से बहुत हद तक लोग बाहर निकल आए हैं.
हालांकि, सुरक्षा विशेषज्ञ इसे आतंकवाद के अंत की घोषणा नहीं मानते, बल्कि बदलते खतरे और सुरक्षा रणनीति का नया चरण बताते हैं. समझें जम्मू कश्मीर में पिछले तीन दशक में क्या हुआ, जो बदले माहौल में प्रदेश के लोगों के लिए सुकून देने वाला माना जा रहा है.
1989-1999: आतंकवाद का सबसे खूनी दशक
जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद का सबसे हिंसक दौर 1989 से 1999 के बीच देखा गया. गृह मंत्रालय और South Asia Terrorism Portal (SATP) के आंकड़ों के अनुसार इस अवधि में लगभग 7,229 नागरिक, 1,980 सुरक्षाकर्मी और 12,813 आतंकी मारे गए.
इस दौर में सबसे अधिक हिंसा 1993 से 1996 के बीच दर्ज हुई, जब घाटी में आतंकी संगठनों का प्रभाव चरम पर था. उस दौर में लगभग हर दिन मुठभेड़, अपहरण, हत्याएं और बड़े आतंकी हमले आम बात बन गए थे.
2000-2009: सुरक्षा अभियान तेज, लेकिन हिंसा जारी
साल 2000 के बाद भारतीय सुरक्षा बलों ने आतंकवाद विरोधी अभियानों को और अधिक आक्रामक बनाया. सीमा पर घुसपैठ रोकने, आतंकियों के नेटवर्क को तोड़ने और स्थानीय खुफिया तंत्र को मजबूत करने के कारण हिंसा में धीरे-धीरे कमी आने लगी.
बावजूद इसके, 2000 से 2009 तक आतंकवाद का प्रभाव काफी अधिक रहा. इस पूरे दशक में लगभग 5,347 नागरिक, 3,610 सुरक्षाकर्मी और 13,148 आतंकी मारे गए. यह वह दौर था जब सुरक्षा बलों की कार्रवाई भी तेज हुई और आतंकी संगठनों को लगातार नुकसान पहुंचा.
2010-2019: आतंकवाद का बदला रूप
2010 के बाद आतंकवाद का स्वरूप बदलने लगा. बड़े हमलों और नागरिक हताहतों में कमी आई, लेकिन 2016 के बाद स्थानीय युवाओं की भर्ती, सोशल मीडिया प्रचार और मुठभेड़ों में वृद्धि के कारण आतंकी गतिविधियां फिर चर्चा में आईं.
इस दशक में लगभग 551 नागरिक, 544 सुरक्षाकर्मी और 1,960 आतंकी मारे गए. यानी 1990 और 2000 के दशक की तुलना में कुल हिंसा में गिरावट गिरावट आई, लेकिन आतंकवाद पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ.
2020-2025: हिंसा में बड़ी गिरावट, खतरा बरकरार
पिछले कुछ वर्षों में आतंकवाद से जुड़े कुल आंकड़ों में चौंकाने वाली गिरावट दर्ज हुई है. 2020 से 2025 के बीच लगभग 252 नागरिक, 189 सुरक्षाकर्मी और 1,114 आतंकी मारे गए.
विशेष रूप से 2025 में आतंकवाद से संबंधित मौतें पिछले दो दशकों के सबसे निचले स्तरों में रहीं. इससे संकेत मिला कि सुरक्षा बलों की लगातार कार्रवाई, बेहतर तकनीकी निगरानी और सीमा पर सख्ती का असर जमीन पर दिखाई देने लगा है.
2026 का ट्रेंड: खतरा पूरी तरह से टला नहीं
साल 2026 में सबसे बड़ा संकेत यह नहीं है कि आतंकवाद समाप्त हो गया, बल्कि यह है कि बड़े आतंकी हमलों और आतंकवाद से होने वाली मौतों में बड़े पैमाने पर कमी आई है.
जनवरी 2026 में आतंकवाद से जुड़ी केवल 3 मौतें दर्ज हुईं. इनमें 1 सुरक्षाकर्मी, 1 आतंकी और 1 पाकिस्तानी घुसपैठिया शामिल था. सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि एक भी नागरिक की मौत नहीं हुई. यह हाल के वर्षों के सबसे कम जनवरी आंकड़ों में शामिल है.
जनवरी से मई 2026: तीन दशक में पहली बार ऐसा दौर
मई 2026 सुरक्षा के लिहाज से एक महत्वपूर्ण महीना माना गया. उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार पूरे महीने आतंकवाद या घुसपैठ से जुड़ी एक भी मौत दर्ज नहीं हुई.
करीब तीन दशक से अधिक समय में यह पहली बार था, जब पूरा महीना बिना किसी आतंकवाद संबंधी मौत के बीता. इसे सुरक्षा एजेंसियों के लगातार अभियानों, बेहतर खुफिया समन्वय और सीमा पर सख्त निगरानी का परिणाम माना गया.
अनुच्छेद 370 हटने के बाद क्या बदला?
5 अगस्त 2019 को जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 और 35A हटाए जाने के बाद सुरक्षा व्यवस्था में व्यापक बदलाव किए गए. केंद्र सरकार ने आतंकवाद के खिलाफ बहुस्तरीय रणनीति अपनाई. सीमा पार घुसपैठ रोकने के लिए निगरानी मजबूत की गई, आतंकी वित्तपोषण पर कार्रवाई तेज हुई, ओवरग्राउंड वर्कर्स (OGWs) के नेटवर्क पर लगातार छापेमारी हुई और आतंकी मॉड्यूल को ध्वस्त करने के लिए खुफिया आधारित ऑपरेशन बढ़ाए गए.
इसका नतीजा यह हुआ कि कई क्षेत्रों में आतंकी घटनाओं और बंद के आह्वान का प्रभाव पहले की तुलना में कम हुआ. पर्यटन, निवेश और सामान्य जनजीवन में भी सुधार देखने को मिला. घाटी में स्कूल, कॉलेज, बाजार और पर्यटन गतिविधियां पहले की तुलना में अधिक नियमित हुईं.
क्या आतंकवाद खत्म हो गया?
ऐसा कहना अभी जल्दबाजी माना जाएगा. ऐसा इसलिए कि 2023 से 2025 के बीच जम्मू संभाग के राजौरी, पुंछ, रियासी और कठुआ जैसे जिलों में कई बड़े आतंकी हमले हुए. इससे यह स्पष्ट हुआ कि आतंकवादी संगठन अपनी रणनीति बदलकर घाटी के बजाय जम्मू क्षेत्र में सक्रियता बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं.
यानी घाटी में हिंसा कम होने के बावजूद खतरा पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है, बल्कि उसका भौगोलिक और सामरिक स्वरूप बदल रहा है.
अब भी सुरक्षा एजेंसियां क्यों हाई अलर्ट पर?
2026 में भी लगातार आतंकी मॉड्यूल का भंडाफोड़, हथियारों की बरामदगी और आतंकियों की गिरफ्तारियां जारी रहीं. सुरक्षा एजेंसियां विशेष रूप से अमरनाथ यात्रा के दौरान हाई अलर्ट पर रहीं और अभूतपूर्व सुरक्षा व्यवस्था लागू की गई.
साफ है कि सुरक्षा एजेंसियां अभी भी सक्रिय आतंकी नेटवर्क, सीमा पार घुसपैठ और स्लीपर सेल के खतरे को गंभीरता से ले रही हैं. आतंकवाद का स्वरूप बदल रहा है, इसलिए सुरक्षा रणनीति भी लगातार विकसित की जा रही है.
क्या कहते हैं आंकड़े?
यदि 1990 के दशक की तुलना 2026 से की जाए तो तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है. नागरिकों और सुरक्षाबलों की हताहतों में भारी गिरावट आई है, बड़े आतंकी हमले कम हुए हैं और आतंकवाद विरोधी अभियानों की सफलता स्पष्ट दिखाई देती है. साथ ही यह भी सच है कि सीमापार आतंकवादी ढांचा पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है और समय-समय पर घुसपैठ तथा छोटे मॉड्यूल सक्रिय करने की कोशिशें जारी हैं.
2026 की कहानी "आतंकवाद खत्म हो गया" नहीं, बल्कि "हिंसा में ऐतिहासिक गिरावट, बदलती आतंकी रणनीति और लगातार जारी सुरक्षा अभियान" की है. डिफेंस एक्सपर्ट 2026 के माहौल को "बंदूकें खामोश हैं, लेकिन चौकसी अभी भी जरूरी है" के रूप में देखते हैं.




