Begin typing your search...

ज्यादा फड़फड़ाए ‘इस्लामिक NATO’ वाले तो खड़ा होगा Shia NATO, तब भारत किसके साथ? मक्का अकॉर्ड के खेल पर बोले GD बख्शी - Exclussive

मक्का अकॉर्ड के बाद ‘इस्लामिक NATO’ की चर्चा तेज है. GD बख्शी ने Shia NATO की संभावना, ईरान की भूमिका और भारत के रणनीतिक विकल्पों पर बड़ा बयान दिया.

Islamic NATO Shia NATO Mecca Accord GD Bakshi India Strategy
X

कुछ दिनों पहले मक्का अकॉर्ड सामने आने के बाद से पश्चिम एशिया की सियासत में एक नए शक्ति-संतुलन की चर्चा तेज हो गई है. सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की के बीच हुए रक्षा समझौते को भले ही सीधे ‘इस्लामिक NATO’ कहना जल्दबाजी माना जाएगा, लेकिन इसके संभावित असर ने भारत के रणनीतिक हलकों में सवाल जरूर खड़े कर दिए हैं. क्या यह गठजोड़ आगे चलकर भारत और ईरान के लिए चुनौती बन सकता है? और अगर इसके जवाब में ईरान के आसपास कोई Shia Defence Bloc उभरता है, तो भारत किसके साथ खड़ा होगा? इसी सवाल पर रक्षा विशेषज्ञ जीडी बख्शी ने बड़ा दावा करते हुए पश्चिम एशिया के बदलते समीकरण और भारत के विकल्पों पर अपनी राय रखी है. उन्हीं के शब्दों में समझें पूरा समीकरण.

भारतीय सेना के रिटायर्ड मेजर जनरल जीडी बख्शी ने कहा कि मक्का अकॉर्ड को मूल सिद्धांत यह है कि किसी एक सदस्य पर हमला सभी पर हमला माना जाएगा. फिलहाल, तीनों देशों ने इसे रक्षात्मक समझौता बताया है और किसी खास देश के खिलाफ गठबंधन नहीं कहा है. ये बात भी सही है कि तुर्की के विदेश मंत्री हाकान फिदान ने इसकी तुलना NATO के Article 5 से की है, लेकिन अभी इसके सैन्य संचालन की पूरी संरचना साफ नहीं है.

क्या मक्का समझौता ‘इस्लामिक NATO’ बन चुका है?

जीडी बख्शी के अनुसार, फिलहाल सीधे ‘इस्लामिक NATO’ कहना जल्दबाजी होगी. पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की का समझौता सामूहिक रक्षा की दिशा में बड़ा कदम जरूर है, लेकिन NATO जैसी संयुक्त सैन्य कमान, विस्तृत तैनाती व्यवस्था और स्पष्ट operational commitments की तस्वीर अभी सामने नहीं आई है. समझौता दूसरे देशों के लिए भी खुला बताया गया है और भविष्य में इसका विस्तार संभव है. इसलिए इसका सबसे सटीक वर्णन फिलहाल एक mutual defence pact के रूप में किया जाना चाहिए.

US ने तुर्की और सऊदी को कितने घातक हथियार दिए हैं?

उन्होंने आगे कहा कि इस गठजोड़ की सैन्य क्षमता समझने के लिए दोनों देशों के अमेरिकी हथियारों को देखना जरूरी है. तुर्की लंबे समय से अमेरिकी F-16 लड़ाकू विमानों का इस्तेमाल करता है और उसके लिए F-16 modernization तथा हथियारों की आपूर्ति अमेरिकी रक्षा संबंधों का अहम हिस्सा रही है. मई 2025 में अमेरिका ने तुर्की के लिए AIM-120C-8 AMRAAM और AIM-9X Sidewinder Block II मिसाइलों की संभावित बिक्री को मंजूरी दी थी. एफ 35 पर भी बातचीत आगे बढ़ी है.

सऊदी अरब के पास अमेरिकी F-15 लड़ाकू विमानों की बड़ी ताकत है. 2010 में अमेरिका ने सऊदी अरब के लिए 84 F-15SA विमानों की संभावित बिक्री को मंजूरी दी थी. इसके अलावा Patriot air-defence system और अन्य अमेरिकी हथियार उसके सैन्य ढांचे का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं. जनवरी 2026 में अमेरिका ने सऊदी अरब के लिए 730 PAC-3 MSE interceptor missiles की संभावित बिक्री को मंजूरी दी, जिसकी अनुमानित कीमत 9 अरब डॉलर थी.

रिटायर्ड मेजर जनरल के मुताबिक यहां पर गौर फरमाने की बात यह है कि अमेरिकी रिकॉर्ड में ऐसी घोषणाएं कई बार possible Foreign Military Sale होती हैं; मंजूरी को पूरी डिलीवरी मानना सही नहीं है.

PAK को तुर्की-सऊदी की ताकत भारत के लिए चुनौती कितनी बड़ी?

यहीं इस पूरे समीकरण का भारतीय कोण सामने आता है. पाकिस्तान के पास अपनी सैन्य क्षमता के साथ चीन से मिलने वाली तकनीक और सहयोग भी है. इसके ऊपर तुर्की की defence technology और सऊदी अरब की आर्थिक ताकत जुड़ती है तो पाकिस्तान की strategic position निश्चित रूप से मजबूत हो सकती है. लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि सऊदी या तुर्की के अमेरिकी हथियार अपने-आप पाकिस्तान के हाथ में आ जाएंगे. हालांकि, किसी देश को अत्याधुनिक हथियार हस्तांतरित करना अलग राजनीतिक और कानूनी फैसला होता है.

क्या सच में ‘Shia Defence Bloc’ बन सकता है?

इस सवाल के जवाब में जीडी बख्शी ने कहा कि यही सबसे बड़ा सवाल है. फिलहाल ‘Shia NATO’ नाम का कोई औपचारिक सैन्य गठबंधन मौजूद नहीं है. ईरान के साथ इराक, सीरिया, लेबनान और यमन के अलग-अलग राजनीतिक तथा सुरक्षा संबंध हैं, लेकिन इन्हें NATO जैसी एकीकृत शिया सैन्य संधि मानना सही नहीं होगा. इसके अलावा इन देशों के हित एक जैसे नहीं हैं.

फिर भी अगर पश्चिम एशिया में Sunni-led security grouping और Iran-केंद्रित counter-alignment के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ती है, तो एक informal security network बनने की संभावना को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता. लेकिन इसे धार्मिक आधार पर बने एक औपचारिक ‘शिया NATO’ में बदलना काफी कठिन होगा. क्षेत्रीय राजनीति में राष्ट्रीय हित, तेल, व्यापार, समुद्री रास्ते और अमेरिका-चीन-रूस के संबंध भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं.

अगर ऐसा गुट बनता है तो भारत किसके साथ जाएगा?

भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यही होगी कि वह किसी Sunni या Shia military camp का हिस्सा न बने. भारत की विदेश नीति लंबे समय से strategic autonomy पर जोर देती रही है. इसलिए भारत के लिए ईरान से संबंध बनाए रखना और साथ ही सऊदी अरब, UAE तथा अन्य Gulf देशों के साथ अपने रिश्ते मजबूत रखना ज्यादा व्यावहारिक विकल्प है.

ईरान भारत के लिए इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि Chabahar Port भारत को पाकिस्तान को bypass करते हुए Afghanistan और Central Asia तक connectivity का रास्ता देता है. भारत और ईरान ने Chabahar को क्षेत्रीय connectivity और व्यापार के महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में विकसित करने पर सहयोग किया है.

क्या ईरान भारत को बड़ा फायदा पहुंचा सकता है?

ईरान पहले से भी हमारे लिए लाभकारी रहा है. फिर भी इसे सैन्य गठबंधन के बजाय strategic और connectivity advantage के रूप में देखना ज्यादा सही होगा. ईरान की भौगोलिक स्थिति भारत के लिए Central Asia, Afghanistan और Eurasia तक पहुंच का वैकल्पिक मार्ग देती है. Chabahar इसी रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा है. भारत आधिकारिक तौर पर भी ईरान के साथ connectivity और International North-South Transport Corridor को आगे बढ़ाने पर जोर देता रहा है.

अगर West Asia दो बड़े सुरक्षा ध्रुवों में बंटता है, तो Chabahar का महत्व और बढ़ सकता है. लेकिन भारत को यह भी ध्यान रखना होगा कि ईरान के साथ अत्यधिक सैन्य नजदीकी उसके Gulf देशों, अमेरिका और अन्य साझेदारों के साथ रिश्तों को प्रभावित कर सकती है. इसलिए नई दिल्ली के लिए Iran के साथ strategic partnership, लेकिन किसी धार्मिक सैन्य धड़े से दूरी सबसे संतुलित रास्ता होगा.

कौन किधर रहेगा और किसका पलड़ा भारी रहेगा?

अगर मुकाबला सिर्फ Pakistan-Saudi-Türkiye बनाम Iran के रूप में देखा जाए तो तस्वीर सीधी नहीं है. पाकिस्तान के पास nuclear deterrence और बड़ा सैन्य अनुभव है, तुर्की के पास NATO-standard सैन्य क्षमता तथा अपना बढ़ता defence industry base है, जबकि सऊदी अरब के पास विशाल आर्थिक संसाधन और Gulf में प्रभाव है. दूसरी तरफ ईरान के पास बड़ा missile programme, रणनीतिक भौगोलिक स्थिति और क्षेत्र में लंबे समय से विकसित सुरक्षा नेटवर्क है.

इसलिए किसी एक पक्ष को पहले से ‘भारी’ घोषित करना सही नहीं होगा. असली ताकत इस बात पर निर्भर करेगी कि संघर्ष किस क्षेत्र में, किस अवधि तक और किन बाहरी शक्तियों की भागीदारी के साथ होता है.

भारत के लिए सबसे बड़ा रणनीतिक विकल्प क्या होगा?

भारत के सामने सबसे मजबूत विकल्प किसी एक खेमे में शामिल होना नहीं, बल्कि दोनों तरफ संवाद बनाए रखना है. सऊदी अरब और UAE के साथ आर्थिक एवं रणनीतिक संबंध, ईरान के साथ Chabahar और connectivity, इजरायल के साथ defence-technology cooperation और अमेरिका के साथ व्यापक रणनीतिक साझेदारी- इन सभी को समानांतर चलाना भारत की ताकत बन सकता है.

यही वजह है कि ‘Shia Defence Bloc’ बनने की संभावना पर चर्चा भले ही हो रही हो, लेकिन भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण सवाल कौन सा धार्मिक गुट किसके खिलाफ है नहीं, बल्कि यह है कि बदलते West Asia में भारत अपनी strategic autonomy कैसे बचाए. मौजूदा हालात में नई दिल्ली के लिए किसी camp का हिस्सा बनने के बजाय balancing power और connectivity power बने रहना ज्यादा फायदे का सौदा दिखाई देता है.

स्टेट मिरर स्पेशलस्वतंत्रता दिवस
अगला लेख