मां की तलाश में सात समंदर पार: बेल्जियम से भारत आई टेरेसा की आंखों में बस एक सवाल - ‘क्या आप मेरी मां हैं?’
बेल्जियम में पली-बढ़ी टेरेसा अपनी जड़ों की तलाश में सात समंदर पार भारत पहुंची हैं. आंखों में उम्मीद, दिल में सवाल और जुबां पर सिर्फ एक बात - क्या आप मेरी मां हैं? यह कहानी सिर्फ एक बेटी की खोज नहीं, बल्कि मां-ममता, बिछड़े रिश्तों और जन्मभूमि से जुड़े उस भाव की है, जिसे भारत में ‘मां’ कहकर पूजा जाता है. हर मोड़ पर भावनाओं का सैलाब और हर चेहरे में अपनी मां की झलक तलाशती टेरेसा की यह सच्ची यात्रा दिल को छू लेने वाली है.
कभी कभी जिंदगी सवालों से नहीं, खालीपन से शुरू होती है. टेरेसा के पास सब कुछ था. यूरोप की सुविधाएं, पढ़ाई, नौकरी, आजादी और सब कुछ, लेकिन, कुछ नहीं है, तो बस, एक चीज 'मां की गोद की याद'. इसी खालीपन ने उसे बेल्जियम से भारत तक खींच लाया. अब वो मंबई की गलियों में बचपन की एक तस्वीर और अधूरी कहानी के साथ अपनी मांग को ढूंढ रही है.
'मां को ढूंढने आई हूं'
टेरेसा के पास बचपन की दो धुंधली और ब्लैक एंड व्हाइट फोटो है. वह लोगों को वही दिखाती है. वह कहती हैं, 'अपनी मां को ढूंढने आई हूं. भारत अपने ही परिवार को ढूंढने आई हूं. मां का नाम यशोदा बताती है. ये कहती है कि बायकुला मैटरनिटिी संख्या 3 में 25 अक्टूबर 1970 को पैदा हुई थी.
नहीं कर पाईं परवरिश
टेरेसा यह भी बताती हैं, 'उनकी मां के पति गुजर गए थे. वह मेरी परवरिश करने की स्थिति में नहीं थी. उन्होंने मुझे अनाथ आश्रम में छोड़ दिया. उसके अभी जहां में रह रही हूं, उन्होंने मुझे गोद लिया. वे लोग बेल्जियम के रहने वाले हैं. उन्होंने सभी सुविधाओं के साथ प्यार से पाला है. वहां पर मेरे पर किसी चीज की नहीं है. बस कमी है तो मां के यादों की. उनकी लोरियों की.'
जब, दो साल की थी, तभी से अनाथश्रम में रहने लगी. सात साल की थी तभी मुझे गोद ले लिया गया. अब मुझे मां की याद आती है. मेरी मां कौन, है, क्या करती है, उनके परिवार वाले क्या करते हैं? क्या मेरा कोई भाई भी है. मेरी मां जिंदा है या नहीं. जिंदा है तो कहां है? इसी तलाश में मुंबई में भटक रही हूं.' मेरी ख्वाहिश है, किसी तरह 'मां या परिवार' मिल जाए.
कहां है मेरी मां?
मेरी मां कहां है, कैसी है, इसी सवाल का जवाब पाने के लिए यहां आई हूं. ये सवाल मेरे मन में सालों से सुलगती रही है. मेरे खून के रिश्ते भारत से हैं. जो मुझे देश से इमोशनली जोड़ती है. यही वजह है कि जब मैं, मां की तलाश में इंडिया आई तो यह देश उसके लिए अजनबी नहीं लगा. स्टेशन की चाय, मंदिर की घंटियां, गली में खेलते बच्चे, हर दृश्य में कुछ जाना-पहचाना सा महसूस होता है.
भारत में अजनबी भी अपने
वह कहती हैं, “मुझे नहीं पता क्यों, लेकिन यहां आते ही लगा… मैं घर के करीब हूं.” टेरेसा ने NGOs, पुराने अस्पतालों, अनाथालयों के चक्कर लगाए है. हर उम्रदराज महिला को देख वह एक पल ठहर जाती. यह सोचकर, “शायद यही मेरी मां हों…” कई बार निराशा मिली, कई बार आंखों में आंसू आए, लेकिन भारत की खास बात है कि यहां अजनबी भी अपने हो जाते हैं. किसी ने खाना खिलाया, किसी ने ठहरने की जगह दी, किसी ने सिर्फ गले लगा लिया.
टेरेसा की कहानी अभी अधूरी
वह कहती हैं, “अगर, मेरी मां जिंदा हैं, तो बस, एक बार सामने आ जाएं… मैं कोई जवाब नहीं चाहती, सिर्फ उनको देखना चाहती हूं.” टेरेसा को मां, नहीं मिली, पर तलाश जारी है. टेरेसा की कहानी अभी अधूरी है.





