FAQ: भारत का Demographic Dividend कब शुरू करेगा उलटी गिनती? 2030 के बाद क्या बदलेगा और क्यों है यह दशक अहम
भारत का Demographic Dividend 2030 के बाद बदल सकता है. बढ़ती बुजुर्ग आबादी, घटती कार्यबल वृद्धि और रोजगार की चुनौती के बीच उत्पादकता भारत की नई ताकत बनेगी.
फिलहाल, भारत दुनिया की सबसे युवा आबादी वाले देशों में शामिल है. यही युवा आबादी आने वाले वर्षों में देश की आर्थिक तरक्की की सबसे बड़ी ताकत बन सकती है. लेकिन ये हालात हमेशा नहीं रहेगा. ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन की रिपोर्ट ‘India Could Age Before It Becomes Rich’ और नीति आयोग के अनुसार भारत के सामने इसी चुनौती को रेखांकित करती है. क्या भारत अपनी युवा आबादी को उत्पादक शक्ति (Productive फाॅर्स) में बदल पाएगा, इससे पहले कि देश तेजी से बुजुर्ग होने लगे?
ओआरएफ रिपोर्ट का संकेत साफ है कि भारत के लिए अगला दशक बेहद महत्वपूर्ण है. वर्ष 2030 के बाद कामकाजी उम्र की आबादी की बढ़त धीमी पड़ने और बुजुर्गों की संख्या बढ़ने की चुनौती तेज हो सकती है. ऐसे में रोजगार, कौशल, महिलाओं की भागीदारी, स्वास्थ्य और उत्पादकता पर आज लिए गए फैसले आने वाले दशकों की आर्थिक दिशा तय करेंगे.
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FAQ: भारत का Demographic Dividend कब शुरू करेगा उलटी गिनती?
2030 के बाद भारत का जनसांख्यिकीय लाभांश (Demographic Dividend) अचानक खत्म नहीं होगा. हालांकि, कामकाजी उम्र की आबादी की बढ़त धीमी पड़ सकती है और बुजुर्गों की संख्या बढ़ने लगेगी. इसका मतलब है कि युवा आबादी से आर्थिक लाभ उठाने का अवसर धीरे-धीरे सीमित होगा. इसलिए 2030 के आसपास का समय भारत के लिए महत्वपूर्ण मोड़ माना जा रहा है.
जब किसी देश में कामकाजी उम्र की आबादी का हिस्सा बच्चों और बुजुर्गों की तुलना में अधिक होता है, तो उसे जनसांख्यिकीय लाभांश का अवसर मिलता है. यदि इस आबादी को अच्छी शिक्षा, स्वास्थ्य, कौशल और रोजगार मिले, तो उत्पादन और आर्थिक विकास तेजी से बढ़ सकता है. केवल बड़ी युवा आबादी होना पर्याप्त नहीं है.
2030 के बाद भारत में आबादी के धीरे-धीरे बुजुर्ग होने की प्रक्रिया तेज हो सकती है. जन्मदर में गिरावट और जीवन प्रत्याशा बढ़ने से बुजुर्गों की संख्या बढ़ेगी. दूसरी ओर कामकाजी उम्र की आबादी की वृद्धि धीमी होगी. इससे रोजगार के साथ स्वास्थ्य, पेंशन और बुजुर्गों की देखभाल जैसी जरूरतें भी महत्वपूर्ण बनेंगी.
ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन की रिपोर्ट रोजगार सबसे बड़ी चुनौतियों में शामिल रहेगा. बड़ी संख्या में युवा यदि शिक्षा और कौशल हासिल करने के बाद भी पर्याप्त रोजगार नहीं पा सके, तो जनसांख्यिकीय लाभांश का पूरा फायदा नहीं मिलेगा. भारत को विनिर्माण, सेवाओं, बुनियादी ढांचे और नए क्षेत्रों में अधिक रोजगार पैदा करने के साथ, उनकी गुणवत्ता और उत्पादकता पर भी ध्यान देना होगा.
युवा आबादी तभी आर्थिक ताकत बनती है, जब उसे अच्छी शिक्षा, स्वास्थ्य, कौशल और रोजगार के अवसर मिलें. महिलाओं की आर्थिक भागीदारी बढ़ाना भी जरूरी है. यदि कामकाजी उम्र की बड़ी आबादी रोजगार से बाहर रहती है, तो देश अपनी जनसांख्यिकीय ताकत का पूरा उपयोग नहीं कर पाएगा. मानव संसाधन में निवेश इसलिए बेहद जरूरी है.
बुजुर्गों की संख्या बढ़ने से स्वास्थ्य सेवाओं, पेंशन, सामाजिक सुरक्षा और देखभाल की जरूरत बढ़ेगी. इसका असर सरकार के साथ परिवारों पर भी पड़ सकता है. भारत अभी अपेक्षाकृत युवा है, इसलिए उसके पास तैयारी का अवसर है. यदि स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था को समय रहते मजबूत किया गया, तो बढ़ती उम्र की आबादी की चुनौती को बेहतर ढंग से संभाला जा सकेगा.
नहीं, राज्यों में यह बदलाव अलग-अलग गति से होगा. कुछ दक्षिणी और कम जन्मदर वाले राज्य तेजी से बुजुर्ग आबादी की ओर बढ़ रहे हैं, जबकि उत्तर भारत के कई राज्यों में युवा आबादी लंबे समय तक अधिक रह सकती है. इसलिए भारत को पूरे देश के लिए एक जैसी नीति के बजाय राज्यों की अलग-अलग जनसांख्यिकीय जरूरतों के अनुसार रणनीति बनानी होगी.
महिलाओं की रोजगार और उद्यमिता में भागीदारी बढ़ने से देश की प्रभावी कामकाजी आबादी बढ़ सकती है. इसके लिए सुरक्षित कार्यस्थल, बच्चों की देखभाल की सुविधा, कौशल प्रशिक्षण और समान अवसर जरूरी हैं. महिलाओं की आर्थिक भागीदारी बढ़ने से परिवार की आय बढ़ने के साथ देश की उत्पादन क्षमता और आर्थिक विकास को भी मजबूती मिल सकती है.
भारत को केवल अधिक लोगों के काम करने पर निर्भर रहने के बजाय उत्पादकता बढ़ाने पर जोर देना होगा. बेहतर कौशल, तकनीक, आधुनिक विनिर्माण, अनुसंधान, बुनियादी ढांचे और उच्च मूल्य वाले क्षेत्रों में निवेश जरूरी होगा. युवाओं को बदलती जरूरतों के अनुसार लगातार नए कौशल सिखाने होंगे. यही रास्ता घटती जनसांख्यिकीय बढ़त के बावजूद आर्थिक विकास की गति बनाए रख सकता है.
इसे खतरे से ज्यादा समयबद्ध अवसर के रूप में देखना बेहतर होगा. भारत के पास अभी बड़ी युवा आबादी है, लेकिन इस ताकत को रोजगार और उत्पादकता में बदलने के लिए समय सीमित है. यदि शिक्षा, स्वास्थ्य, कौशल, रोजगार और महिलाओं की भागीदारी पर सही निवेश हुआ, तो 2030 के बाद भी भारत अपनी जनसांख्यिकीय बढ़त को आर्थिक ताकत में बदल सकता है.




