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EXCLUSIVE: “रौनकें हैं मगर सुकून नहीं दिल तवायफ के कोठे जैसा है” वाली, कल पढ़ाई में फिसड्डी शायरा हिमांशी बाबरा अब BA-LLB करेंगी!

महज 22 साल की उम्र में उर्दू शायरी की दुनिया में अपनी अलग पहचान बना चुकी हिमांशी बाबरा की कहानी साधारण नहीं है. सातवीं कक्षा में पढ़ाई से मन उचटने वाली, तन्हाई से जूझती एक लड़की आज नामवर शायरा बन चुकी है और अब BA-LLB करने का फैसला भी कर चुकी है. हिंदू गुर्जर परिवार से आने वाली हिमांशी को उनकी उर्दू शायरी के कारण अक्सर गलत पहचाना गया, लेकिन उन्होंने बिना किसी शॉर्टकट के अपनी राह बनाई.

EXCLUSIVE: “रौनकें हैं मगर सुकून नहीं दिल तवायफ के कोठे जैसा है” वाली, कल पढ़ाई में फिसड्डी शायरा हिमांशी बाबरा अब BA-LLB करेंगी!
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संजीव चौहान
By: संजीव चौहान

Updated on: 7 Jan 2026 5:25 PM IST

वक्त इंसान को कहां से कब-कैसे कहां पहुंचा दे, दुनिया की किसी भी यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर, साइंटिस्ट, मौलवी या ज्योतिषी के पास इसका जवाब न था न है न आइंदा होगा. 22 साल की हिमांशी बाबरा के ऊपर यह तमाम अल्फाज एकदम सटीक बैठते हैं. दुनिया में रिश्तों, अपने-परायों को समझने की अकल आई तो मन पढ़ाई से उचट गया. सातवीं जमात में आते-आते तन्हाई ने चौतरफा घेर लिया. इसका नतीजा यह रहा कि कालांतर में पढ़ाई में फिसड्डी मगर हर वक्त पंजाबी गानों को सुनने-गुनगुनाते रहने वाली हिंदू लड़की हिमांशी बाबरा, आज महज 22-23 साल की उम्र में ही बन चुकी है उर्दू की नामवर शायरा.

छठी सातवीं कक्षा में पढ़ाई के दौरान ही दिल-ओ-जेहन में अहसासात का सैलाब उमड़ने लगा. उन अहसासों को मगर बयान करने वाली जुबान या हिम्मत बीते कल की छात्रा हिमांशी बाबरा में न हो सकी. नतीजा यह रहा कि जब क्लास में सब बच्चे जोर-शोर से ध्यान लगाकर पढ़ने में जुटे होते थे. तब सहपाठियों की भीड़ में भी मासूम मन तन्हा दिल हिमांशी बाबरा अपनी ही धुन में गुमसुम सी बैठी रहती. कक्षा में बिना किसी को सुने और खुद पर बीत रही अपनी बिना किसी को कुछ सुनाए.

अब और नहीं पढ़ सकती

गिरते-पड़ते दसवीं क्लास में पहुंचते-पहुंतचे एक दिन वह भी आ गया जब हिमांशी ने घर वालों के सामने सरेंडर कर दिया- “अब और नहीं पढ़ सकती. दिल नहीं लगता है पढ़ाई में.” हिमांशी के इन चंद अल्फाजों ने घर में कोहराम मचा दिया या कहूं इस ऐलान से परिवार में “सन्नाटा” छा गया. यहां दोनों ही बातें सटीक बैठती हैं. जो पिता गांव दयालपुर से सब कुछ बेचकर मेरठ महज इसलिए आ गए थे कि तीन बेटियों और इकलौते बेटे को शहर में बेहतर परवरिश देकर आला-अफसर और बेहतरीन इन्सान बनाएंगे. सोचिए उस पिता के दिल पर क्या-क्या गुजरी होगी तब जब पिता की सबसे लड़ैती बिटिया हिमांशी बाबरा द्वारा सातवीं-आठवीं जमात में ही पढ़ाई से साफ-साफ इनकारी सुनने को उन्हें मिली होगी.

FB/Himanshi Babra Katib

बेटी की खुशी के आगे कुछ नहीं

कहते हैं कि एक पिता बेटी से ही मजबूत और बेटी के ही सामने सबसे ज्यादा कमजोर होता है. फिर भला इस कड़वे सच से हिमांशी बाबरा के पिता भी कैसे अछूते रह सकते थे. बेटी द्वारा बेहद कम उम्र में ही पढ़ाई लिखाई से बचपन में ही मन उचटने के ऐलान ने माता-पिता को झकझोर तो डाला, मगर तोड़ा नहीं. पिता ने कमर कसी कि बेटी की खुशी के लिए पिता न जाने क्या से क्या कर सकता है. तो फिर यह तो बेटी के सिर्फ पढ़ाई न करने जैसी बात थी. दरअसल यह तमाम बेबाक बातें ऐसी अपनी ही दुनिया में खोई रहने वाली बेहद शालीन मिजाज, बेहद सौम्य हिमांशी बाबरा ने बेबाक बयान कीं, स्टेट मिरर हिंदी के एडिटर इनवेस्टीगेशन संजीव चौहान के साथ नई दिल्ली में एक लंबे एक्सक्लूसिव पॉडकास्ट में.

‘भीड़’ के बीच की लड़की नहीं हूं

यूं तो हिमांशी बाबरा शेर-ओ-शायरी की दुनिया में उम्दा शायरी-गजल और बेहद कम बोलने के लिए जानी-पहचानी जाती हैं. हमारे साथ मगर जब उन्होंने करीब पौने दो घंटे की लंबी बात की तो पता चला कि नहीं हिमांशी बाबरा महज भीड़ की एक “लड़की” भर नही हैं. हिमांशी बाबरा अपनी तरह की अलग ही सोच का एक ‘गर्भ-गृह’ है. जिसकी अपनी दुनिया है. वह दुनिया जिसमें वह किसी को भी झांकने की इजाजत देना कभी गवारा नहीं कर सकती. आखिर क्यों? सवाल के जवाब पर हिमांशी कहती है, “हर एक की अपनी-अपनी खुशी अपने-अपने दर्द और अलग-अलग अपने अपने अहसासात होते हैं. इन पर जितनी कम बात की जाए उतना ही बेहतर है.”

तन्हाई से हार ने शायरा बना डाला

स्टेट मिरर हिंदी के एक सवाल के जवाब में हिमांशी बाबरा बेझिझक मानती हैं, “दरअसल जिस उम्र में सातवीं कक्षा में ही मेरा मन पढ़ाई में लगना बंद हो गया था. उस उम्र में बच्चों को अपना अच्छा-बुरा सोचने की समझ तक तो होती ही नहीं है. मैं पढ़ाई से पीछे हटी तो पहले से ही मेरे इर्द-गिर्द मंडराती तन्हाई ने मुझे और ज्यादा मजबूती से अपने आगोश में समेटना शुरू कर लिया. तन्हाई की उस मजबूत कोशिश के सामने मैंने कमजोर होकर हार कुबूल कर ली. नतीजा सामने है आज मैं 22 साल की उम्र में जो शायरी करती हूं, मेरी उस शायरी को दुनिया तमाम बड़े अनुभवी मंझे हुए शायरों की शायरी समझने लगते हैं.”

निठारी में ननिहाल कौम गुर्जर गोत्र ‘बाबरा’

एक सवाल के जवाब में हिमांशी बाबरा कहती है, “दुनिया भले मुझे मुसलमान समझे मगर मैं हिंदू हूं. दिल्ली से सटे उत्तर प्रदेश के नोएडा शहर के निठारी गांव में मेरी ननिहाल है. दादा दादी का पुश्तैनी गांव मेरठ जिले में स्थित दयालपुर है. दरअसल जहां तक मुझे लगता है कि मेरी शायरी की जुबान उर्दू होने और मेरे नाम के आगे कातिब और बाबरा लगा होने से जमाने वाले मुझे मुस्लिम समझते होंगे. सच्चाई इसके परे है. बाबरा मेरे पिता का गोत्र है. मैं असल में गुर्जर परिवार से हूं. कातिब उप-नाम मेरा मुशायरों-शायरों की दुनिया-मंच का है.”

दिली अहसास “शायरी” बनते हैं

महज 22 साल की उम्र में अपने जीवन का पहला मुशायरा दुबई में पढ़ने वाली हिमांशी बाबरा में झांकने की कोशिश किसी के लिए भी सिवाए “बेईमानी” से ज्यादा कुछ साबित नहीं होगी. जमाने भर को अपनी उम्दा शेर-ओ-शायरी में खोने का माद्दा रखने वाली हिमांशी बाबरा खुद में खोई रहने वाली शख्शियत हैं. आखिर ऐसा क्यों? महज 22 साल की छोटी सी उम्र में ही कोई ग़म, टूटन, विछोह, अधूरी तड़फ, मोहब्बत में दगा तो मिलना तो इसकी तह में या वजह नहीं है? पूछने पर कहती हैं, “मैं जिस तरह की शायरी लिख-पढ़ रही हूं. वह सब मुझे इन्हीं सवालों की हद-दायरे में लाकर खड़ा कर देता है. जो सवाल आप मुझसे कर रहे हैं. मैं मानती हूं कि शायरी दिमाग से नहीं दिल से पैदा होती है. जो कुछ अपने आसपास गुजरता महसूस करती हूं, उसी अहसास को किसी से बिना साझा किए बस कागज पर जब तरतीब से उतारती हूं तो वही शायरी बन जाती है.”

FB/Himanshi Babra Katib

बिना “शॉर्टकट” की शायरा हूं

गुर्जर समाज में सिवाय “रागिनी” के और किसी भी तरह के मनोरंजन को अपराध माना जाता है. ऐसे में इस तरह की रुढ़िवादी कौम में जन्म लेने वाली हिमांशी बाबरा को “शायर” बनने का क्या कुछ कभी खामियाजा भुगतना पड़ा? सवाल के जवाब में हिमांशी बोलीं- “अच्छी बुरी, सकारात्मक नकारात्मक सोच के लोग समाज में हर जगह मिल जाएंगे. निर्भर हम पर करता है कि हम कैसे अपनी जिंदगी बसर करना चाहते हैं. पिता को लगा कि मैं शायर तो बनने की राह पर बढ़ चुकी हूं मगर किसी उस रास्ते पर या किसी ऐसे शॉर्टकट से नहीं जो मेरे परिवार घर-खानदान कौम की इज्जत सर-ए-बाजार नीलाम हो रही हो. तो फिर इसमें किसी को आपत्ति क्या और क्यों? फिर भी अगर कुछ दकियानूसी ख्यालातों वालों को कुछ खलता है, तो मुझे अपने परिवार-खानदान का सपोर्ट चाहिए वह मेरे साथ है.”

कुछ लोगों ने आएं-बांए-दाएं की तो...

हां, कुछ लोगों को जब पता चला कि मैं मंचों पर जाकर शायरी पढ़ती हूं. तो उन्होंने मुंह बनाने शुरू किए थे. तमाम ने मेरी मां और पिता से भी मेरे इस शगल को लेकर रोना-धोना दकियानूसी तमाशा करने की कोशिश की थी. ताकि मैं उनकी बेतुकी दुहाइयों के जाल में फंसकर अपनी जिंदगी जंजाल बना लूं, तो उसमें मेरे पिता ने उन्हीं लोगों को कुछ ऐसे जवाब दिए कि वे दुबारा हमारी देहरी पर तो कम से कम पलटकर दुबारा आने की हिमाकत नहीं कर सके. अब पीठ पीछे कौन क्या कहता है? मैं और मेरा परिवार अगर इसी चिंता में डूबे रहेंगे तो फिर इसमें कम-अक्ली और नुकसान हमारा है. किसी का क्या बिगड़ेगा. बातें बनाने वाले बातें बनाकर अपने अपना रास्ता नाप कर निकल जाते हैं. सोचना मुझे और मेरे परिवार को है कि मेरा नफा किसमें है और किस काम में नुकसान. जमाने को अपनी ठेकेदारी दे दो तब जमाने वाले तो यही कहेंगे कि, बस दुनिया खाए हम भूखे मर जाएं. ऐसी वाहियाती बातों में किसी को भी अपना वक्त जाया नहीं करना चाहिए.

FB/Himanshi Babra Katib

शायरा न बनती तो...

बेबाक-बेखौफ लंबी एक्सक्लूसिव बातचीत के दौरान हिमांशी बाबरा अपने दिल में नासूर की मानिंद फैल चुके उस दर्द को तो उजागर नहीं करना चाहती हैं जिसने उन्हें पढ़ाई लिखाई की ही उम्र में “शायरा” बना डाला. हां यह जरूर कहती हैं कि पढ़ाई लिखाई पूरी न करने का थोड़ा बहुत मलाल तो दिल के एक कोने में आज भी बेचैनी के आलम में करवटें बदलता रहता है. हांलांकि आज बाकी उन दोनों बहनों और भाई से बातें होती हैं जो पढ़ाई लिखाई में बेहतर निकल रहे हैं, तो वे कहते हैं कि हम ही पढ़ लिख कर कौन सा तीर मारे बैठे हैं. तुमने (हिमांशी) शायरी की दुनिया में कोई मुकाम पहचान तो अपनी बना ली है. इसके बाद भी मगर मैं अब सोचती हूं कि मुझे आगे की पढ़ाई पूरी करनी चाहिए. क्योंकि शिक्षा-साक्षरता की रौनक जमाने की भीड़ में भी सुहागन के ललाट (माथे) पर बिंदी सी अलग चमकती है. सोचती हूं कि कालांतर में इंटर के बाद छूट चुकी पढ़ाई को आगे बढ़ाकर अब कानून में स्नातक (बीए एलएलबी) कर लूं.

पिता सा दोस्त और विश्वासपात्र दूसरा नहीं

कुछ वक्त पहले “जिंदगी” से भी कीमती पिता को खो चुकी हिमांशी बाबरा उनके साथ जुड़ी यादों पर सवाल किए जाने पर बोझिल हो जाती हैं. कहती हैं, “पापा से अच्छा मेरा दोस्त, शुभचिंतक, हमसफर न कोई था न है और न आइंदा कोई होगा. जब वह हमारे परिवार से दूर हो चुके हैं तब अहसास होता है कि नहीं पिता की जगह कोई नहीं ले सकता है. जो बातें वह जीते जी हमसे करते, हमें बताते समझाते थे. तब उनकी अहमियत हमारी समझ में नहीं आती थी. अब जब वह नहीं है तो हमें उनकी कही हर बात की कीमत बेशकीमती लगने लगी है. मगर अब उनकी बातों को लेकर हमारे दिल में उठते अहसासों को सुनने के लिए पिता साथ नहीं है. यह एक ऐसा मलाल है जो मेरे साथ ही दुनिया से जाएगा.”

इस कदर की संजीदा शायर निकलीं कि...

कोशिश अगर ऐसी मशहूर और बेहद कम उम्र शायरा हिमांशी बाबरा के दिल-ओ-जेहन में झांकने की करी जाए तो, देश के मशहूर शायर अमीर इमाम ने भी कुछ वक्त पहले इनसे लंबी बातचीत में इन्हें खुलवाने की काफी कोशिश की. मगर हिमांशी बाबरा इस कदर की गहरी कहिए या संजीदा निकलीं जो वे अमीर इमाम के सामने भी वह सब कुबूल करने से खुद को साफ बचा ले गईं जिसे हर कोई जानने को बेताब रहता है. अमीर इमाम के साथ बातचीत में हिमांशी बाबरा ने अपनी पसंद-न-पसंदगी का जिक्र किया. बताया कि वे पंजाबी गानों को हर वक्त सुन और गुनगुना सकती हैं. वे पढ़ तो नहीं सकती हैं लगातार कुछ भी. मगर अपने अहसासों को कागज पर करीने से सजाकर उसे गजल-शेर की शकल में जरूर कागज पर उतार सकती हैं.

शायर हमेशा तन्हा ही रहता है

अमीर इमाम के साथ बातचीत में ही हिमांशी ने बताया कि, “अगर मैं शायर न बनती तो कोई बिजनेस कर लेती. या फिर कहीं कोई नौकरी कर रही होती.” आज की तारीख में बेहद कम उम्र में ही शेर-ओ-शायरी की दुनिया का अहम हिस्सा बनाए बैठीं हिमांशी बाबरा कहती हैं- “यह दुनिया भी बेहद उलझी हुई दुनिया है. शायरों-मुशायरों की दुनिया भीड़ भरी है. यहां सबके अपने अपने सुख दुख हैं. यहां आपकी शायरी सुनकर जो लोग आपको दाद देते हैं. वे आपके दुख के साझीदार नहीं होते हैं. एक शायर के दिमाग में उसके ऊपर बीती की क्या कुछ गुजरती या चलती रहती है घंटों और दिनों तक. इससे किसी भी दाद देने वाले का कोई वास्ता दूर दूर तक नहीं होता. शायर सच पूछो तो जमाने के दिल की बात शेर में कहने के बाद भी खुद तन्हा ही रह जाता है. यह कहूं तो गलत नहीं होगा. अपनी जिंदगी में मची उथल-पुथल से शायर खुद तो कभी संतुष्ट हो ही नहीं पाता है.

सुकून के सिवाए जिंदगी में सब कुछ है

बेशक मुझे मुशायरों और शेर-ओ-शायरी की दुनिया में बेइंतहा इज्जत से क्यों न नवाजा गया हो. इसके लिए मैं सबकी शुक्रगुजार भी हूं. इसके बाद भी सोचती हूं कि शायर की जिंदगी बेहद उलझन भरी तो है ही. अगर आज मैं शायरा न होती तो शायद आम आदमी की तरह मैं भी बेफिक्री के आलम वाली दुनिया ब-फरक्कती से जीने की हकदार होती. सबकुछ है आज जिंदगी में सिवाए सुकून के. एक शायर पर तमाम उम्र भीड़ में रहकर भी क्या कुछ गुजरती है, यह शायर से बेहतर उसके अपने खून के रिश्ते भी नहीं जान-समझ सकते हैं. हमेशा लोग मुझसे पूछते हैं कि जब दिल टूटता है. प्यार-मोहब्बत में धोखा मिलता है तभी कोई शायर बनता है. मैं यह सवाल करने वालों से पूछती हूं कि मैं तो 7वीं जमात से ही शेर-ओ-शायरी की दुनिया की ओर मुड़ गई.

सौ टके का सवाल है...

सोचिए किसी सातवीं क्लास में पढ़ने वाली लड़की का कोई दिल तोड़ सकता है. क्या ऐसा इतनी कम उम्र में संभव है. हां, जिस उम्र में मैंने पढ़ाई से मुहं मोड़कर कविता शायरी की ओर खुद को मोड़ा, तो ऐसा इतनी कम उम्र में किसी के साथ गुजरा कोई हादसा ही किसी को शायर बना सकता है. वह हादसा जिसे आप किसी से बयान करना तो चाहते हों मगर आपके इर्द-गिर्द कोई न हो जो आपके अहसासात को खुद का हिस्सा बनाकर आपके दर्द को अपना बना कर समझ सके. दरअसल बचपन में हासिल घुटन मासूम मन को किसी न किसी आर्ट की ओर लेकर चल देती है. वही मेरे साथ भी हुआ. मैंने अपने अहसासों को बयान करने के लिए कलम-कागज थाम लिया. और कब सातवीं क्लास की फिसड्डी स्टूडेंट से बेहद छोटी उम्र में ही मैं शायर बनने की पगडंडी पर चल पड़ी, पता ही नहीं चला.”

पसंदीदा शेर-ओ-शायरी के बारे में पूछने पर हिमांशी बाबरा बताती हैं कि... किसी की लिखी...

“वह मेहंदी के हाथ दिखाकर रोई मैं

किसी और की हो गई बताकर रोई मैं”

हिमांशी बाबरा को यह लाइनें नींद से बोझिल होने पर भी जगा देती हैं. जबकि मुझे अपनी ही लिखी लाइनें...

“मैं ठहरा उदास सा चल रहा निराश सा

न जीने की वजह थी खुशी से न वास्ता था”

और...मुझे मेरे अपने ही लिखे अल्फाज अपनी जिंदगी से लगते हैं..

“रौनकें हैं मगर सुकून नहीं, दिल तवायफ के कोठे जैसा है”

“मेरी दुनिया उजड़ गई तुम इसे हादसा समझते हो”

“एक उम्र तेरे साथ गुजारी है जानेजां, आते तो होंगे याद तुझे हम कभी कभी”

“ग़म तो ये है कि वो जिस वक्त मुझे छोड़ गया, तब मेरा हाल भी हालात भी दोनो थे खराब”

"खींच कर दर्द की दहलीज पर लाए हुए लोग, जिंदगी क्या खाक जिएं तेरे सताए हुए लोग"

"क्या गजब शख्स था हर बात पकड़ लेता था एक मुलाकात से औकात पकड़ लेता था, अब मेरा नाम लेने से भी वह करता है गुरेज सर-ए-महफिल जो मेरा हाथ पकड़ लेता था"

और अंत में चलते चलते....

एक वह अज़ीम फातेह जो एक रात में चंद घंटों के मुशायरे में लाखों अजनबी-दिलों को बा-आसानी फतेह करने की कुव्वत खुद में रखती हैं.

'सांवली रंगत दिलकश हंसी निराला अंदाज़'

कुछ ऐसी ही लगीं दो घंटे के लंबे खास इंटरव्यू में मुझे नई उम्र की मंझी हुई संजीदा शायरा हिमांशी बाबरा “कातिब”.

स्टेट मिरर स्पेशल
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