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के.वी.के. सुंदरम: भारत के ऐतिहासिक जनमत-संग्रह के समय CEC थे, जनता से पूछा गया था- तुम्हारा भविष्य क्या हो?

के. वी. के. सुंदरम के कार्यकाल में 1967 में गोवा का ऐतिहासिक जनमत-संग्रह हुआ। जानिए महाराष्ट्र में विलय पर जनता ने क्या फैसला दिया और फोटो पहचान-पत्र से उनका क्या नाता था.

के.वी.के. सुंदरम: भारत के ऐतिहासिक जनमत-संग्रह के समय CEC थे, जनता से पूछा गया था- तुम्हारा भविष्य क्या हो?
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16 जनवरी 1967 को गोवा के लोगों के सामने सवाल था कि उनका भविष्य महाराष्ट्र में विलय के साथ जुड़ेगा या वे अपनी अलग पहचान बनाए रखेंगे. यह केवल उसकी पहचान को लेकर प्रशासनिक या कानूनी सवाल नहीं था, बल्कि भाषा, संस्कृति और क्षेत्रीय पहचान से भी जुड़ा था. भारत निर्वाचन आयोग की आधिकारिक सूची, आयोग की ऐतिहासिक पुस्तक ‘लीप ऑफ फेथ’ और गोवा सरकार के सूचना एवं जनसंपर्क विभाग की रिपोर्टों के मुताबिक उस समय देश के दूसरे मुख्य निर्वाचन आयुक्त के. वी. के. सुंदरम थे. उनके कार्यकाल में हुए इस ऐतिहासिक जनमत-संग्रह में गोवा के मतदाताओं ने महाराष्ट्र में विलय के प्रस्ताव को खारिज कर दिया था. इसी दौर में मतदाता फोटो पहचान-पत्र का शुरुआती प्रयोग भी हुआ था.

के. वी. के. सुंदरम की कहानी क्या?

के. वी. के. सुंदरम का पूरा नाम कल्याण वैद्यनाथन कुट्टूर सुंदरम था. वे भारत के दूसरे मुख्य निर्वाचन आयुक्त थे. उन्होंने 20 दिसंबर 1958 को पद संभाला और 30 सितंबर 1967 तक इस जिम्मेदारी में रहे. उनसे पहले सुकुमार सेन देश के पहले मुख्य निर्वाचन आयुक्त थे. सुंदरम भारतीय सिविल सेवा के अधिकारी थे. उन्होंने न्यायिक और प्रशासनिक पदों पर काम किया तथा 1948 से 1957 तक स्वतंत्र भारत के कानून सचिव रहे.

Credit: Election Commission India

उनके कार्यकाल में 1962 और 1967 के लोकसभा चुनाव हुए. लेकिन उनके कार्यकाल की सबसे खास घटनाओं में गोवा का 1967 का जनमत-संग्रह शामिल है. बाद में 1968 से 1971 तक उन्होंने भारत के पांचवें विधि आयोग के अध्यक्ष के रूप में भी काम किया.

गोवा के सामने सवाल क्या था?

1961 में पुर्तगाली शासन से मुक्ति के बाद गोवा भारत का हिस्सा बना और केंद्रशासित प्रदेश के रूप में स्थापित हुआ. इसके बाद सवाल उठा कि गोवा को महाराष्ट्र में मिला दिया जाए या उसकी अलग पहचान बरकरार रखी जाए. महाराष्ट्रवादी गोमांतक पार्टी के नेता विलय के पक्ष में थे, जबकि यूनाइटेड गोअन्स पार्टी के नेता डॉ. जैक सिकेरा गोवा का अलग अस्तित्व बनाए रखने की मांग कर रहे थे.

इस बहस में भाषा, संस्कृति, क्षेत्रीय पहचान और प्रशासनिक भविष्य जैसे मुद्दे शामिल थे. दिसंबर 1966 में संसद ने गोवा, दमन और दीव जनमत-संग्रह अधिनियम पारित किया. इसके बाद गोवा के लोगों की राय जानने के लिए मतदान का रास्ता साफ हुआ और 16 जनवरी 1967 की तारीख तय की गई.

जनमत-संग्रह में क्या पूछा गया?

16 जनवरी 1967 को गोवा के मतदाताओं के सामने दो विकल्प थे. पहला विकल्प महाराष्ट्र में विलय का था, जबकि दूसरा गोवा को अलग केंद्रशासित प्रदेश बनाए रखने का. मतदान में प्रतीकों के जरिए इन विकल्पों को पहचाना गया. करीब 3.88 लाख मतदाताओं के लिए 442 मतदान केंद्र बनाए गए थे. मतदान लगभग 81.77 प्रतिशत रहा.

Credit: Election Commission India

गोवा के मतदाताओं के लिए यह सामान्य विधानसभा या लोकसभा चुनाव नहीं था, जिसमें मतदाता किसी उम्मीदवार को चुनते हैं. यहां लोगों को अपने क्षेत्र के भविष्य से जुड़े सीधे सवाल पर राय देनी थी. इस चुनाव में जनता से अलग से पूछा गया था- तुम्हारा भविष्य क्या हो? उस समय मुख्य निर्वाचन आयुक्त के. वी. के. सुंदरम थे और निर्वाचन आयोग की चुनावी व्यवस्था इस ऐतिहासिक प्रक्रिया का हिस्सा थी. हालांकि, इस जनमत-संग्रह को केवल सुंदरम की उपलब्धि कहना उचित नहीं होगा. इसके पीछे संसद की कानूनी व्यवस्था, गोवा के राजनीतिक नेताओं के अभियान और चुनाव अधिकारियों की भूमिका भी थी.

मतगणना में नतीजा कैसे पलटा?

जनमत-संग्रह के बाद सबकी निगाहें मतगणना पर थीं. मतों की गिनती में तीन दिन लगे. शुरुआती रुझानों में महाराष्ट्र में विलय का समर्थन करने वाला पक्ष आगे बताया गया. लेकिन बाद के दौर में तस्वीर बदलने लगी. खासकर दक्षिण गोवा के सालसेते क्षेत्र की मतपेटियों की गिनती के बाद अलग पहचान बनाए रखने के पक्ष को बढ़त मिलने लगी. अंतिम परिणाम में विलय के विरोध में 1,72,191 मत पड़े, जबकि विलय के पक्ष में 1,38,170 मत मिले.

दोनों पक्षों के बीच 34,021 मतों का अंतर रहा. अलग रहने के पक्ष को कुल मतों का लगभग 54.20 प्रतिशत और विलय के पक्ष को लगभग 43.50 प्रतिशत मत मिले. शेष मत अमान्य थे. इस तरह अंतिम परिणाम ने गोवा के अलग अस्तित्व के पक्ष में फैसला सुनाया.

Credit: Election Commission India

फैसले ने गोवा को कैसे बदला?

जनमत-संग्रह में गोवा के मतदाताओं ने महाराष्ट्र में विलय के प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया. इसके बाद गोवा केंद्रशासित प्रदेश बना रहा. इस फैसले ने क्षेत्र की अलग राजनीतिक और सांस्कृतिक पहचान की बहस को ऐतिहासिक आधार दिया. करीब दो दशक बाद, 30 मई 1987 को गोवा को पूर्ण राज्य का दर्जा मिला. आज 16 जनवरी को गोवा में जनमत-संग्रह दिवस के रूप में याद किया जाता है. इस मतदान की खासियत यह थी कि लोगों से सीधे पूछा गया कि वे अपने क्षेत्र का भविष्य किस तरह देखना चाहते हैं. यह स्वतंत्र भारत में आयोजित एकमात्र जनमत-संग्रह था, जिसमें किसी क्षेत्र के संवैधानिक भविष्य पर मतदाताओं की राय ली गई और परिणाम सरकार के लिए बाध्यकारी था.

फोटो पहचान-पत्र से उनका क्या नाता?

के. वी. के. सुंदरम के कार्यकाल का एक दूसरा महत्वपूर्ण पहलू मतदाता फोटो पहचान-पत्र का शुरुआती प्रयोग है. भारत निर्वाचन आयोग की ऐतिहासिक पुस्तक ‘लीप ऑफ फेथ’ के मुताबिक, मई 1960 में कलकत्ता दक्षिण-पश्चिम लोकसभा क्षेत्र के उपचुनाव के दौरान फोटो पहचान-पत्र बनाने की प्रायोगिक कोशिश की गई. इस क्षेत्र के लगभग 3.42 लाख मतदाताओं में से करीब 2.13 लाख लोगों की तस्वीरें ली जा सकीं और लगभग 2.10 लाख फोटो पहचान-पत्र जारी किए गए.

हालांकि, यह प्रयोग आगे चलकर देशव्यापी व्यवस्था नहीं बन पाया और योजना लंबे समय तक ठंडी पड़ी रही. 1979 में सिक्किम के विधानसभा चुनाव में फोटो पहचान-पत्र जारी किए गए. इसके बाद 1994 में देशव्यापी स्तर पर मतदाता फोटो पहचान-पत्र कार्यक्रम शुरू हुआ. इसलिए सुंदरम के कार्यकाल को इस व्यवस्था के शुरुआती प्रयोगों से जोड़कर देखा जाता है.

सुंदरम का कार्यकाल कब खत्म हुआ?

30 सितंबर 1967 को के. वी. के. सुंदरम का मुख्य निर्वाचन आयुक्त के रूप में कार्यकाल समाप्त हुआ. अगले दिन एस. पी. सेन वर्मा ने यह जिम्मेदारी संभाली. सुंदरम के कार्यकाल में देश में दो आम लोकसभा चुनाव हुए, मतदाता फोटो पहचान-पत्र का शुरुआती प्रयोग हुआ और गोवा के भविष्य पर ऐतिहासिक जनमत-संग्रह आयोजित किया गया.

इन घटनाओं ने भारतीय चुनावी व्यवस्था के विकास के अलग-अलग पहलुओं को सामने रखा. गोवा का जनमत-संग्रह विशेष रूप से इसलिए याद किया जाता है, क्योंकि इसके जरिए मतदाताओं ने अपने क्षेत्र की अलग पहचान बनाए रखने के पक्ष में फैसला दिया. उस समय सुंदरम देश के मुख्य निर्वाचन आयुक्त थे. उनकी कहानी इस बात की याद दिलाती है कि लोकतंत्र में चुनाव केवल प्रतिनिधि चुनने तक सीमित नहीं होते, बल्कि कभी-कभी जनता को अपने क्षेत्र के भविष्य पर सीधे फैसला देने का अवसर भी मिलता है.

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