Fighter Jet बना लिया, ‘दिल’ नहीं! इंजन की कमजोरी भारत का सबसे बड़ा संकट, GD बख्शी बोले- ऐसे बदलेगा Superpowers का खेल - Exclusive
भारत Fighter Jet बना रहा है, लेकिन Engine में विदेशी निर्भरता बड़ी चुनौती है. G.D. Bakshi ने बताया, 140 kN का स्वदेशी Engine बना तो बदल सकता है Superpowers का खेल.
भारत फाइटर जेट बना सकता है, लेकिन लड़ाकू विमान के सबसे महत्वपूर्ण हिस्से यानी एयरो-इंजन में अभी पूरी तरह आत्मनिर्भर नहीं हुआ है. रिटायर्ड मेजर जनरल जीडी बख्शी ने स्टेट मिरर से बातचीत में इसी कमजोरी को भारत की सुरक्षा और रणनीतिक स्वतंत्रता के लिए बड़ी चुनौती बताया. उन्हीं के बयानों से समझें भारत एयर पॉवर के मामले में कैसे बदल सकता सुपर पॉवर्स का खेल?
जीडी बख्शी के अनुसार भारत लंबे समय से स्वदेशी कावेरी इंजन पर काम कर रहा है, लेकिन फाइटर जेट के लिए जरूरी हाई-थ्रस्ट इंजन को operational स्तर तक पहुंचाना अब भी बड़ी तकनीकी चुनौती है. दुनिया में अत्याधुनिक फाइटर इंजन विकसित करना बेहद जटिल क्षमता मानी जाती है.
फाइटर जेट बना सकता है भारत, फिर अपना इंजन क्यों नहीं?
लड़ाकू विमान की जरूरत के हिसाब से इंजन का thrust अलग होता है. Tejas Mk1/Mk1A में GE F404 परिवार का इंजन इस्तेमाल होता है, जबकि Tejas Mk2 के लिए GE F414 इंजन तय है. सरकार के मुताबिक F414 को भारत में 80% Transfer of Technology व्यवस्था के तहत बनाने की योजना है.
यानी भारत विमान का एयरफ्रेम, एवियोनिक्स, रडार और कई महत्वपूर्ण प्रणालियां स्वदेशी रूप से विकसित कर रहा है, लेकिन इंजन के मामले में विदेशी तकनीक पर निर्भरता अभी बनी हुई है.
भविष्य के AMCA जैसे ज्यादा भारी और उन्नत लड़ाकू विमान के लिए इससे ज्यादा शक्तिशाली इंजन की जरूरत होगी. इसी कारण भारत हाई-थ्रस्ट इंजन की स्वदेशी क्षमता विकसित करने पर जोर दे रहा है. फ्रांस की Safran और भारत के बीच भी भविष्य के सैन्य इंजन को लेकर सहयोग की संभावनाएं सामने आती रही हैं. Safran पहले ही भारत में इंजन निर्माण और एयरोस्पेस सप्लाई चेन का विस्तार कर रहा है.
क्या विदेशी इंजन पर निर्भरता भारत की सुरक्षा कमजोरी है?
इंजन पर निर्भरता का मतलब यह नहीं कि भारत अमेरिका, फ्रांस या रूस से हर मामले में दब जाता है. लेकिन युद्धक विमान के इंजन जैसी महत्वपूर्ण तकनीक में विदेशी सप्लायर पर निर्भरता रणनीतिक जोखिम जरूर पैदा करती है.
Tejas Mk1A इसका ताजा उदाहरण है. सितंबर 2025 में सरकार ने 97 Tejas Mk1A का अनुबंध किया और नवंबर 2025 में HAL ने GE के साथ इन विमानों के लिए 113 F404-GE-IN20 इंजन और सपोर्ट पैकेज की आपूर्ति का समझौता किया. इन इंजनों की डिलीवरी 2027 से 2032 के बीच होनी है. इसलिए F404 की उपलब्धता Tejas Mk1A के उत्पादन कार्यक्रम के लिए महत्वपूर्ण है.
हालांकि, यह कहना सही नहीं होगा कि अमेरिका पैसा लेने के बावजूद F404 देने से इनकार कर रहा है. मौजूदा आधिकारिक जानकारी में सप्लाई का समझौता मौजूद है. असली सवाल यह है कि भारत कब ऐसी स्थिति में पहुंचेगा जहां किसी विदेशी इंजन की सप्लाई उसके लड़ाकू विमान उत्पादन की निर्णायक कड़ी न रहे?
अगर भारत 140 kN का स्वदेशी इंजन बना ले तो क्या बदलेगा?
अगर भारत विश्वसनीय 120–140 kN श्रेणी का स्वदेशी फाइटर इंजन विकसित कर लेता है, तो इसका असर सिर्फ एक विमान पर नहीं पड़ेगा. इससे भविष्य के AMCA और अगली पीढ़ी के भारी लड़ाकू विमानों के डिजाइन में भारत को ज्यादा स्वतंत्रता मिल सकती है.
ज्यादा थ्रस्ट से विमान की रफ्तार पकड़ने की क्षमता, तेजी से ऊंचाई हासिल करने की क्षमता और हथियार/ईंधन का भार उठाने की क्षमता बेहतर हो सकती है. लेकिन सिर्फ 140 kN थ्रस्ट हासिल कर लेना पर्याप्त नहीं है. असली चुनौती अत्यधिक तापमान सहने वाली धातु और सामग्री, टर्बाइन ब्लेड, इंजन को ठंडा रखने की तकनीक, कंप्रेसर की दक्षता, डिजिटल इंजन नियंत्रण प्रणाली (FADEC), ईंधन दक्षता और लंबे समय तक भरोसेमंद संचालन जैसी तकनीकों में महारत हासिल करना है. यही वजह है कि फाइटर इंजन को सिर्फ इंजन नहीं, बल्कि रणनीतिक तकनीक माना जाता है.
कावेरी से आगे भारत को क्या करना होगा?
कावेरी जैसे स्वदेशी कार्यक्रम को तेज करने के साथ भारत को एयरो-इंजन विकास में निजी क्षेत्र की भागीदारी भी बढ़ानी होगी. मिसाइल, ड्रोन, सैटेलाइट और रक्षा इलेक्ट्रॉनिक्स में जिस तरह निजी कंपनियों की भूमिका बढ़ी है, वैसा ही ecosystem इंजन तकनीक में भी बनाना होगा.
भारत के सामने तत्काल सैन्य जरूरत भी है. MiG-21 की विदाई के बाद भारतीय वायुसेना की लड़ाकू स्क्वाड्रन संख्या 29 रह गई, जबकि स्वीकृत संख्या 42 है. चीन और पाकिस्तान दोनों मोर्चों को देखते हुए इस अंतर को जल्द भरना रणनीतिक आवश्यकता है.
इसलिए भारत को एक तरफ विदेशी स्रोतों से तत्काल जरूरत पूरी करनी होगी, तो दूसरी तरफ अगले दशक की जरूरत के लिए स्वदेशी इंजन पर युद्धस्तर पर काम करना होगा.
क्या इंजन आत्मनिर्भरता से बदल सकता है सुपरपावर का खेल?
G.D. बख्शी के तर्क का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यही है कि भारत को केवल फाइटर जेट का निर्माता नहीं, बल्कि उसकी propulsion technology का मालिक बनना होगा.
अगर भारत विश्वसनीय हाई-थ्रस्ट स्वदेशी इंजन विकसित कर लेता है, तो विदेशी सप्लाई पर निर्भरता घटेगी, भविष्य के लड़ाकू विमानों के डिजाइन पर भारत का नियंत्रण बढ़ेगा और युद्धकाल में सप्लाई बाधित होने का जोखिम कम होगा.
जेट का शरीर भारत बना रहा है; अब उसकी ताकत यानी इंजन पर भी पूरा नियंत्रण हासिल करना अगली बड़ी छलांग हो सकती है. ऐसा हुआ तो न तो अमेरिका न ही दुनिया की अन्य ताकत उसे दबाने की सोच भी सकती है. ऐसा इसलिए कि भारत स्पेस टेक्नॉलॉजी, सैटेलाइट लॉन्चिंग, रॉकेट, मिसाइल, ड्रोन और एआई में काफी बेहतर स्थिति में हैं. इन क्षेत्रों में अब सुपरपॉवर्स भारत में दबाव नहीं डाल सकते.




