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Fast Track Court History In India: कब हुई शुरुआत, कैसे करती है काम और किन चर्चित मामलों ने इसे सुर्खियों में ला दिया?

प्रधानमंत्री मोदी की फास्ट ट्रैक कोर्ट घोषणा के बाद जानिए फास्ट ट्रैक कोर्ट क्या है, इसके अधिकार, काम करने का तरीका, इतिहास, जनरल कोर्ट से अंतर और चर्चित मामले.

Fast Track Court History In India: कब हुई शुरुआत, कैसे करती है काम और किन चर्चित मामलों ने इसे सुर्खियों में ला दिया?
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पूरे देश में नीट पेपर लीक से लेकर महिलाओं और बच्चों के खिलाफ अपराधों तक, जब भी किसी संवेदनशील मामले में जल्द न्याय की मांग उठती है, तब सबसे पहले फास्ट ट्रैक कोर्ट का नाम सामने आता है. फिलहाल, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी नीट पेपर लीक 2026 मामलों की सुनवाई के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाने की घोषणा की एक दिन पहले की है, जिससे फास्ट ट्रैक कोर्ट सिस्टम एक बार फिर चर्चा में है. लेकिन क्या फास्ट ट्रैक कोर्ट कोई अलग अदालत है? ऐसे में लोग यह जानना चाहते है कि, इसके अधिकार क्या होते हैं, यह सामान्य कोर्ट से कैसे अलग काम करती है और भारत में इसकी शुरुआत कब हुई? आसान भाषा में समझें फास्ट ट्रैक कोर्ट की पूरी कहानी.

फास्ट ट्रैक कोर्ट क्या?

फास्ट ट्रैक कोर्ट (Fast Track Court-FTC) ऐसी विशेष अदालत होती है, जिसे सामान्य अदालतों में लंबित मामलों का बोझ कम करने और संवेदनशील मामलों का जल्दी निपटारा करने के लिए स्थापित किया जाता है. यह कोई अलग न्यायपालिका या अलग कोर्ट सिस्टम नहीं है, बल्कि भारतीय न्यायपालिका का ही हिस्सा है. इन अदालतों में उन मामलों को प्राथमिकता दी जाती है, जिनमें तेजी से न्याय की आवश्यकता होती है, जैसे दुष्कर्म, महिलाओं और बच्चों के खिलाफ अपराध, POCSO, हत्या, संगठित अपराध या सरकार द्वारा अधिसूचित अन्य विशेष मामले. अब इसमें नीट पेपर लीक मामला भी शामिल हो गया है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पेपर लीक से जुड़े मामलों की सुनवाई के लिए भी फास्ट ट्रैक कोर्ट गठित करने की घोषणा की है, ताकि परीक्षा माफिया के खिलाफ तेजी से कार्रवाई हो सके.

फास्ट ट्रैक कोर्ट के अधिकार क्या होते हैं?

फास्ट ट्रैक कोर्ट के अधिकार सामान्य सत्र न्यायालय (Sessions Court) के समान होते हैं. यह अदालत गवाहों के बयान दर्ज कर सकती है, साक्ष्यों की जांच कर सकती है, आरोप तय कर सकती है, अभियोजन और बचाव पक्ष की दलीलें सुन सकती है तथा दोषी पाए जाने पर कानून के अनुसार सजा भी सुना सकती है.

इसका अधिकार क्षेत्र उस कानून या अधिसूचना से निर्धारित होता है, जिसके तहत उसे स्थापित किया गया हो. यानी फास्ट ट्रैक कोर्ट में प्रक्रिया तेज होती है, लेकिन न्यायिक अधिकार सामान्य अदालतों से अलग नहीं होते.

फास्ट ट्रैक कोर्ट कैसे काम करती है?

फास्ट ट्रैक कोर्ट का मकसद केवल मामलों की सुनवाई की गति बढ़ाना होता है. इनमें मामलों की नियमित और लगातार सुनवाई होती है तथा अनावश्यक स्थगन (Adjournment) से बचने की कोशिश की जाती है. अदालत में केस दर्ज होने के बाद आरोप तय किए जाते हैं, गवाहों के बयान जल्द रिकॉर्ड किए जाते हैं, सबूतों की जांच प्राथमिकता के आधार पर होती है और सुनवाई पूरी होने पर फैसला सुनाया जाता है. कई राज्यों में हाई कोर्ट या राज्य सरकार विशेष श्रेणी के मामलों को सीधे फास्ट ट्रैक कोर्ट में भेजती है. ताकि उनका शीघ्र निपटारा हो सके.

फास्ट ट्रैक कोर्ट और सामान्य अदालत में अंतर क्या?

सामान्य अदालतें सभी प्रकार के दीवानी और आपराधिक मामलों की सुनवाई करती हैं, जिसके कारण उन पर मामलों का भारी बोझ रहता है और कई मामलों में फैसला आने में वर्षों लग जाते हैं. इसके विपरीत, फास्ट ट्रैक कोर्ट केवल चुनिंदा और प्राथमिकता वाले मामलों की सुनवाई करती हैं. इन अदालतों में लगातार सुनवाई का प्रयास किया जाता है, जिससे कम समय में फैसला देने का लक्ष्य पूरा हो सके.

हालांकि, दोनों अदालतों में न्यायिक प्रक्रिया, सबूतों के मानक और आरोपी के संवैधानिक अधिकार समान रहते हैं. यानी फास्ट ट्रैक कोर्ट में केवल प्रक्रिया तेज होती है, न्याय के सिद्धांत भी नहीं बदलते.

किन चर्चित मामलों से कोर्ट सुर्खियों में रही?

भारत में फास्ट ट्रैक कोर्ट कई हाई-प्रोफाइल मामलों की वजह से समय समय पर सुर्खियों में रही है. वर्ष 2012 के निर्भया गैंगरेप और हत्या मामले में फास्ट ट्रैक कोर्ट ने तेजी से सुनवाई कर दोषियों को सजा सुनाई, जिसके बाद यह अदालत पूरे देश में चर्चा का विषय बनी. मुंबई हमला 2008 में आतंकवादी अजमल कसाब के खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए विशेष फास्ट ट्रैक अदालत का उपयोग किया गया था. कठुआ गैंगरेप और हत्या मामला 2018 भी विशेष अदालत में तेजी से चला और कई आरोपियों को दोषी ठहराया गया.

उन्नाव रेप केस में भी विशेष अदालत के माध्यम से सुनवाई तेज की गई. इसके अलावा हैदराबाद की महिला पशु चिकित्सक के साथ दुष्कर्म और हत्या (2019) की घटना के बाद पूरे देश में फास्ट ट्रैक कोर्ट की मांग और तेज हो गई. देशभर में हजारों POCSO मामलों, महिलाओं के खिलाफ अपराधों तथा नाबालिगों से जुड़े मामलों की सुनवाई भी फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट में की जा रही है.

क्या यह कोर्ट हमेशा जल्दी फैसला देती है?

फास्ट ट्रैक कोर्ट का उद्देश्य निश्चित रूप से जल्दी न्याय देना होता है, लेकिन हर मामले में तय समय के भीतर फैसला आ जाए, ऐसा जरूरी नहीं है. कई बार जजों की कमी, अभियोजकों की अनुपलब्धता, गवाहों का समय पर पेश न होना, फोरेंसिक रिपोर्ट में देरी या पुलिस जांच लंबी चलने जैसी वजहों से सुनवाई प्रभावित हो जाती है. इसलिए फास्ट ट्रैक कोर्ट में भी न्यायिक प्रक्रिया का पालन किया जाता है और सभी पक्षों को पूरा अवसर दिया जाता है. इसका मतलब यह है कि फास्ट ट्रैक कोर्ट का उद्देश्य न्याय में तेजी लाना है, न कि न्यायिक प्रक्रिया से समझौता करना.

फास्ट ट्रैक कोर्ट का इतिहास क्या?

भारत में फास्ट ट्रैक कोर्ट की शुरुआत वर्ष 2000 में 11वें वित्त आयोग की सिफारिश पर हुई थी. उस समय देशभर में लाखों आपराधिक मामले लंबित थे, इसलिए केंद्र सरकार ने राज्यों में बड़ी संख्या में फास्ट ट्रैक कोर्ट स्थापित करने के लिए वित्तीय सहायता दी. इन अदालतों का मुख्य उद्देश्य लगभग 17 लाख लंबित मामलों का तेजी से निपटारा करना था.

वर्ष 2011 के बाद केंद्र सरकार की विशेष फंडिंग समाप्त हो गई, लेकिन कई राज्यों ने अपने संसाधनों से इन अदालतों का संचालन जारी रखा. वर्ष 2012 में दिल्ली के निर्भया गैंगरेप कांड के बाद महिलाओं के खिलाफ अपराधों के मामलों में तेजी से न्याय दिलाने की मांग उठी, जिसके बाद फास्ट ट्रैक कोर्ट की संख्या बढ़ाई गई.

वर्ष 2019 में केंद्र सरकार ने Fast Track Special Courts (FTSCs) योजना शुरू की, जिसके तहत बलात्कार और POCSO मामलों की सुनवाई के लिए विशेष अदालतें स्थापित की गईं. अब नीट पेपर लीक मामले की सुनवाई भी फास्ट ट्रैक कोर्ट की विशेष अदालत करेगी. वर्तमन में देशभर में सैकड़ों फास्ट ट्रैक और फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट कार्यरत हैं.

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