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एक आखिरी मैसेज… फिर खामोश हो गए फोन! नेपाल में 80 तीर्थयात्रियों की खबर सुन क्यों रो पड़े सद्गुरु?

नेपाल में 80 तीर्थयात्रियों के लापता होने की खबर से सद्गुरु भावुक हुए. आखिरी संदेश के बाद संपर्क टूटने से चिंता बढ़ी.

एक आखिरी मैसेज… फिर खामोश हो गए फोन! नेपाल में 80 तीर्थयात्रियों की खबर सुन क्यों रो पड़े सद्गुरु?
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क्या कोई कल्पना कर सकता है कि सुबह आया एक छोटा-सा मैसेज कुछ ही मिनट बाद जिंदगी और मौत के बीच सबसे बड़ा सवाल बन जाएगा? क्या कोई सोच सकता है कि जिस जगह एक सप्ताह पहले तक लोग सुरक्षित पहुंच रहे थे, वही जगह अचानक पानी और मलबे में तब्दील हो जाएगी? और क्या इसी दर्द ने सद्गुरु जग्गी वासुदेव को भी भावुक कर दिया और वो ईशा फॅाउंडेशन के 80 सदस्यों को याद कर रो पड़े?

दरअसल, नेपाल-तिब्बत सीमा के पास आई भयावह बाढ़ के बाद कैलाश यात्रा से लौट रहे ईशा फाउंडेशन के करीब 80 सदस्यों के लापता होने की खबर ने पूरे ईशा कैंप में मातम जैसा माहौल पैदा कर दिया. सद्गुरु ने भावुक होकर बताया कि समूह के बारे में अब तक कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं मिल पाई है.

आखिर क्यों टूट गए सद्गुरु?

आमतौर पर बेहद संयमित नजर आने वाले सद्गुरु इस बार खुद को संभालते नजर नहीं आए. उनकी आवाज में चिंता थी, आंखों में नमी थी और हाथों में कंपन दिखाई दे रहा था. आखिर ऐसा क्या हुआ था कि एक आध्यात्मिक गुरु को अपने अनुयायियों के सामने इस तरह भावुक होना पड़ा?

सद्गुरु के मुताबिक, समूह के लीडर ईशांगा प्रवीण ने सुबह करीब 9:05 बजे संदेश भेजकर बताया था कि वे इमिग्रेशन सेंटर पहुंच चुके हैं. लेकिन इसके महज कुछ मिनट बाद, करीब 9:14 बजे, इलाके में तबाही मच गई. क्या सिर्फ नौ मिनट के अंतर ने पूरी कहानी बदल दी?

क्या इमिग्रेशन सेंटर ही बना त्रासदी का केंद्र?

सद्गुरु ने बताया कि जिस इमिग्रेशन सेंटर में समूह मौजूद था, वहां की पूरी इमारत बाढ़ की चपेट में आ गई. क्या तेज बहाव के सामने किसी को संभलने का मौका ही नहीं मिला? सद्गुरु ने यह भी बताया कि वह खुद करीब एक सप्ताह पहले इसी इमिग्रेशन सेंटर पर गए थे. जिस इमारत को उन्होंने कुछ दिन पहले अपनी आंखों से देखा था, उसके बह जाने की खबर ने उन्हें अंदर तक झकझोर दिया.

क्या सद्गुरु के लिए अपने आंसू रोकना मुश्किल हो गया?

आखिरी मैसेज के बाद क्यों खामोश हो गया संपर्क? सबसे बड़ा सवाल अब यही है कि आखिर उन 80 लोगों के साथ क्या हुआ? सद्गुरु के अनुसार, आखिरी संपर्क के बाद समूह से कोई स्पष्ट जानकारी नहीं मिल पाई. समूह के लीडर का नेपाल वाला फोन नंबर भी सक्रिय नहीं हुआ. अगर समूह सुरक्षित तरीके से सीमा पार कर गया होता, तो क्या फोन दोबारा सक्रिय नहीं होना चाहिए था?

इसी सवाल ने चिंता और बढ़ा दी. हालांकि, सद्गुरु ने भी किसी नतीजे की घोषणा नहीं की. उन्होंने साफ कहा कि अभी तक कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं मिली है. लेकिन आपदा का पैमाना देखकर स्थिति बेहद चिंताजनक दिखाई दे रही है.

क्या सिर्फ 80 लोग ही प्रभावित हैं?

क्या इस आपदा का असर अनुमान से कहीं ज्यादा बड़ा हो सकता है?सद्गुरु ने आशंका जताई कि प्रभावित लोगों की संख्या काफी अधिक हो सकती है. इलाके में बाढ़ ने रास्तों, पुलों और संचार व्यवस्था को बुरी तरह प्रभावित किया है, जिससे राहत और बचाव अभियान भी मुश्किल हो गया है. ऐसे में सवाल सिर्फ ईशा फाउंडेशन के सदस्यों का नहीं, बल्कि उस पूरे इलाके में फंसे लोगों का है.

सद्गुरु खुद प्रभावित इलाके में क्यों जाना चाहते हैं?

जब अपने लोगों की कोई खबर न मिले तो क्या कोई व्यक्ति चुप बैठ सकता है? सद्गुरु ने प्रभावित इलाके में खुद जाने की कोशिश की. लेकिन आपदा के कारण रास्ते बंद होने से वहां पहुंचना संभव नहीं हो सका. अब वह भारतीय और चीनी अधिकारियों तथा दूतावासों के माध्यम से ग्यिरोंग इलाके में जाने की अनुमति लेने की कोशिश कर रहे हैं.

आखिर क्यों? ताकि अगर किसी तरह की मदद संभव हो, तो वह खुद और उनकी टीम राहत एवं बचाव कार्य में योगदान दे सके.

क्या अभी भी बची है उम्मीद?

सबसे बड़ा सवाल यही है- क्या 80 यात्रियों के बारे में कोई अच्छी खबर आ सकती है? फिलहाल किसी अंतिम निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगी. आधिकारिक पुष्टि का इंतजार है और बचाव प्रयासों से ही तस्वीर साफ हो सकती है. लेकिन सागा में मौजूद ईशा कैंप का माहौल उस वक्त बेहद भावुक हो गया, जब सद्गुरु ने अपने साथियों के लापता होने की बात बताई.

अहम सवाल?

  • क्या उन परिवारों को जल्द कोई खबर मिलेगी?
  • क्या लापता यात्रियों का पता चल पाएगा?
  • क्या बचाव दल उन तक पहुंच पाएंगे?
  • और क्या सुबह 9:05 बजे आया वह आखिरी मैसेज इस भयावह कहानी का अंत नहीं, बल्कि किसी नई उम्मीद की शुरुआत साबित होगा?

फिलहाल इन सवालों के जवाब का इंतजार है.

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