क्या भारत में शुरू हो चुका है Climate Migration, किन राज्यों और शहरों पर मंडरा रहा संकट? भविष्य का सवाल कैसे
भारत में क्लाइमेट माइग्रेशन कितना बड़ा खतरा बन रहा है? जानिए किन राज्यों और शहरों पर जलवायु परिवर्तन का सबसे ज्यादा असर है, क्या कहती हैं IPCC, DST और World Bank की रिपोर्टें.
क्या भारत में क्लाइमेट माइग्रेशन की शुरुआत हो चुकी है? जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ती बाढ़, हीटवेव, समुद्र के बढ़ते जलस्तर, सूखा और जल संकट देश के कई राज्यों और शहरों के लिए बड़ी चुनौती बन रहे हैं. असम, बिहार, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तराखंड जैसे राज्य सबसे अधिक प्रभावित माने जा रहे हैं, जबकि मुंबई, चेन्नई, दिल्ली और कोलकाता जैसे शहर भी गंभीर जलवायु जोखिम का सामना कर रहे हैं. जानिए विशेषज्ञों, IPCC, DST, World Bank और अन्य रिपोर्टों के आधार पर भारत में Climate Migration की वास्तविक तस्वीर और भविष्य की संभावित चुनौतियां.
एक समय था जब जलवायु परिवर्तन (Climate Change) को केवल पर्यावरण के वैज्ञानिकों की चिंता माना जाता था, लेकिन आज यह करोड़ों लोगों की आजीविका, स्वास्थ्य और रहने की जगह से जुड़ा सबसे बड़ा संकट बनता जा रहा है. हीटवेव, अनियमित मानसून, समुद्र का बढ़ता जलस्तर, बार-बार आने वाली बाढ़, सूखा और जल संकट, अब केवल प्राकृतिक घटनाएं नहीं रह गईं, बल्कि ये लोगों को अपना घर छोड़ने तक के लिए मजबूर कर रही हैं. दुनिया के कई देशों में क्लाइमेट माइग्रेशन की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है.
भारत में भी इसके साफ संकेत दिखाई देने लगे हैं. हालांकि,एक्सपर्ट यह नहीं मानते कि निकट भविष्य में पूरे शहर खाली हो जाएंगे, लेकिन यदि जलवायु परिवर्तन की रफ्तार और शहरी कुप्रबंधन इसी तरह जारी रहा तो आने वाले दशकों में लाखों लोगों को सुरक्षित और बेहतर जीवन की तलाश में अपना घर या शहर बदलना पड़ सकता है.
Climate Migration क्या है?
Climate Migration या जलवायु-जनित पलायन उस स्थिति को कहा जाता है, जब लोग बाढ़, सूखा, समुद्री जलस्तर में वृद्धि, चक्रवात, भीषण गर्मी, जल संकट या अन्य जलवायु आपदाओं के कारण अपना घर छोड़कर किसी दूसरे स्थान पर रहने के लिए मजबूर हो जाते हैं. यह पलायन अस्थायी भी हो सकता है और स्थायी भी.
अंतरराष्ट्रीय प्रवासन संगठन (IOM) के अनुसार क्लाइमेट माइग्रेशन अब दुनिया में इंटरनल विस्थापन के प्रमुख कारणों में शामिल हो चुका है. जलवायु परिवर्तन पर अंतर-सरकारी पैनल (IPCC) भी चेतावनी दे चुका है कि दक्षिण एशिया आने वाले वर्षों में सबसे अधिक जलवायु जोखिम वाले क्षेत्रों में रहेगा.
भारत में फिलहाल इसका सबसे बड़ा असर ग्रामीण इलाकों से शहरों की ओर होने वाले आंतरिक पलायन के रूप में दिखाई दे रहा है, जहां लोग खेती और पारंपरिक रोजगार प्रभावित होने के बाद नए अवसरों की तलाश में बड़े शहरों का रुख कर रहे हैं.
क्या भारत भी इस खतरे की जद में है?
भारत दुनिया के उन देशों में शामिल है जहां जलवायु परिवर्तन का प्रभाव सबसे तेजी से बढ़ रहा है. विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST), पर्यावरण मंत्रालय (MoEFCC), नीति आयोग (NITI Aayog), काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वॉटर (CEEW), IPCC, विश्व बैंक, FAO, UNDP और Climate Action Network South Asia जैसी संस्थाओं की रिपोर्टें बताती हैं कि देश के सभी 28 राज्य और 8 केंद्र शासित प्रदेश किसी न किसी रूप में क्लाइमेट चेंज की चिंता सताने लगी हैं.
भारत की लगभग 7,500 किलोमीटर लंबी तटीय रेखा, मानसून पर निर्भर कृषि व्यवस्था, बड़ी ग्रामीण आबादी और तेजी से बढ़ते शहर इस जोखिम को और गंभीर बनाते हैं.
अलग-अलग शोध रिपोर्ट के मुताबिक अगर तापमान बढ़ोतरी की गति नहीं रुकी और इससे बचने के उपायों में तेजी नहीं आई, तो 2050 तक भारत में करोड़ों लोगों को इस संकट के कारण अपना निवास स्थान बदलना पड़ सकता है. विशेषज्ञों का कहना है कि यह बदलाव अचानक नहीं होगा, बल्कि आने वाले वर्षों में धीरे-धीरे आंतरिक पलायन के रूप में सामने आएगा.
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किन राज्यों में सबसे ज्याद खतरा?
- क्लाइमेट चेंज का असर पूरे देश में दिखाई दे रहा है, लेकिन हर क्षेत्र की चुनौती अलग है. पूर्वी और उत्तर-पूर्वी राज्यों में असम, बिहार, पश्चिम बंगाल, झारखंड और मिजोरम जैसे राज्यों को बाढ़, नदी कटाव और भूस्खलन का सबसे अधिक खतरा है.
- असम में ब्रह्मपुत्र और बिहार में कोसी तथा गंगा की बाढ़ हर वर्ष हजारों परिवारों को विस्थापित करती है, जबकि सुंदरबन में समुद्र का बढ़ता जलस्तर और खारे पानी का प्रवेश खेती और पेयजल दोनों के लिए संकट बन रहा है.
- तटीय राज्यों जैसे ओडिशा, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, केरल, महाराष्ट्र, गोवा और गुजरात में समुद्र का बढ़ता जलस्तर, चक्रवात और तटीय कटाव लोगों की आजीविका पर असर डाल रहे हैं.
- उत्तर भारत के मैदानी राज्यों में बढ़ती हीटवेव, अनियमित मानसून और घटती कृषि उत्पादकता किसानों की चिंता बढ़ा रही है.
- राजस्थान और गुजरात जैसे पश्चिमी राज्यों में मरुस्थलीकरण और जल संकट गंभीर चुनौती बन रहे हैं, जबकि मध्य प्रदेश और बुंदेलखंड क्षेत्र में लगातार सूखा और गिरता भूजल स्तर ग्रामीण पलायन को बढ़ावा दे रहा है.
- हिमालयी राज्यों (उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश) में ग्लेशियरों का तेजी से पिघलना, ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF), बादल फटना और फ्लैश फ्लड जैसी घटनाएं स्थानीय आबादी के लिए नए जोखिम पैदा कर रही हैं.
- यही कारण है कि विशेषज्ञ इन क्षेत्रों को भविष्य के संभावित Climate Migration हॉटस्पॉट के रूप में देखते हैं.
कौन-कौन से शहर चुकाएंगे सबसे बड़ी कीमत?
- जलवायु परिवर्तन का असर केवल गांवों या कृषि क्षेत्रों तक सीमित नहीं है, बल्कि भारत के बड़े शहर भी इसकी चपेट में आते जा रहे हैं. मुंबई के सामने समुद्र का बढ़ता जलस्तर, हाई टाइड और हर साल आने वाली शहरी बाढ़ सबसे बड़ी चुनौती बन चुके हैं.
- चेन्नई एक ओर भीषण जल संकट तो दूसरी ओर अचानक होने वाली भारी बारिश और बाढ़ का सामना कर चुका है. हाल के अध्ययनों में शहर के कुछ हिस्सों में जमीन धंसने (Land Subsidence) की भी चेतावनी दी गई है, जिससे भविष्य में बाढ़ का खतरा और बढ़ सकता है.
- पश्चिम बंगाल के सुंदरबन क्षेत्र में समुद्री कटाव और खारे पानी के बढ़ते प्रभाव के कारण लोगों का पलायन पहले से दर्ज किया जा रहा है, जिसका दबाव कोलकाता जैसे शहरों पर पड़ सकता है.
- दिल्ली में लगातार बढ़ती हीटवेव, जल संकट, वायु प्रदूषण और शहरी ताप द्वीप (Urban Heat Island) का प्रभाव जीवन को अधिक कठिन बना रहा है.
- अहमदाबाद, नागपुर, जयपुर और लखनऊ जैसे शहर भी लंबे समय तक चलने वाली हीटवेव के कारण जलवायु जोखिम वाले शहरी क्षेत्रों में गिने जाने लगे हैं.
- विशेषज्ञों का मानना है कि यदि शहरों की योजना जलवायु परिवर्तन को ध्यान में रखकर नहीं बनाई गई, तो आने वाले वर्षों में इन महानगरों पर आबादी और संसाधनों का दबाव कई गुना बढ़ सकता है.
आखिर लोग अपना घर छोड़ने पर क्यों मजबूर होंगे?
क्लाइमेट चेंज से संभावित माइग्रेशन किसी एक आपदा का परिणाम नहीं होता, बल्कि कई संकटों का संयुक्त प्रभाव होता है. जब किसी इलाके में हर साल बाढ़ आने लगे, खेती योग्य जमीन नदी में समाने लगे, समुद्री पानी खेतों और भूजल को खारा बना दे, लगातार कई वर्षों तक सूखा पड़े या भीषण गर्मी के कारण काम करना मुश्किल हो जाए, तब लोगों के सामने आजीविका बचाने का संकट खड़ा हो जाता है.
किसान खेती छोड़ने लगते हैं, मछुआरों की आय घट जाती है और दिहाड़ी मजदूरों के लिए काम के अवसर कम होने लगते हैं. ऐसी परिस्थितियों में लोग पहले नजदीकी शहरों और बाद में बड़े महानगरों की ओर पलायन करते हैं.
एक्सपर्ट की मानें तो भारत में Climate Migration अचानक होने वाली घटना नहीं होगी, बल्कि आने वाले वर्षों में धीरे-धीरे बढ़ने वाली सामाजिक और आर्थिक प्रक्रिया होगी.
विशेषज्ञ क्या चेतावनी दे रहे हैं?
क्लाइमेट चेंज पर काम कर रहे विशेषज्ञों का कहना है कि भारत में Climate Migration भविष्य की नहीं, बल्कि वर्तमान की चुनौती बन चुका है.
IPCC का आकलन है कि दक्षिण एशिया में अत्यधिक गर्मी, अनियमित वर्षा, समुद्र के बढ़ते जलस्तर और चरम मौसमी घटनाओं की आवृत्ति लगातार बढ़ेगी, जिसका सबसे अधिक असर गरीब, तटीय और कृषि पर निर्भर समुदायों पर पड़ेगा.
विश्व बैंक की Groundswell रिपोर्ट भी चेतावनी देती है कि यदि जलवायु अनुकूलन की गति नहीं बढ़ी, तो 2050 तक दुनिया में करोड़ों लोग अपने ही देशों के भीतर पलायन करने को मजबूर हो सकते हैं, जिनमें दक्षिण एशिया प्रमुख क्षेत्रों में होगा.
शहरीकरण और क्लाइमेट पॉलिसी पर काम करने वाले विशेषज्ञ जहीर अल्लम का मानना है कि भारत के शहर तेजी से विस्तार तो कर रहे हैं, लेकिन वे बढ़ते जलवायु जोखिमों और प्रवासी आबादी की जरूरतों के लिए पर्याप्त रूप से तैयार नहीं हैं.
WRI India का कहना है कि जलवायु संकट का सबसे अधिक असर झुग्गी बस्तियों, निम्न आय वर्ग और तटीय क्षेत्रों में रहने वाले लोगों पर पड़ता है, इसलिए केवल बुनियादी ढांचा मजबूत करना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि सामाजिक रूप से भी जलवायु-लचीले शहर विकसित करने होंगे.
सरकार इस चुनौती से निपटने के लिए क्या कर रही है?
जलवायु परिवर्तन के बढ़ते खतरे को देखते हुए केंद्र और राज्य सरकारें कई स्तरों पर अनुकूलन और आपदा प्रबंधन की रणनीतियों पर काम कर रही हैं.
राष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन कार्य योजना (NAPCC) के तहत जल, कृषि, ऊर्जा, वन और पारिस्थितिकी से जुड़े कई मिशन चलाए जा रहे हैं.
अधिकांश राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने State Action Plan on Climate Change (SAPCC) तैयार किए हैं, जिनमें स्थानीय भौगोलिक परिस्थितियों के अनुसार जल संरक्षण, जलवायु-अनुकूल कृषि, वन संरक्षण, शहरी विकास और आपदा प्रबंधन की योजनाएं बनाई गई हैं.
तटीय क्षेत्रों के लिए National Coastal Mission, मरुस्थलीकरण रोकने के लिए Aravalli Green Wall Project, शहरों के लिए Heat Action Plan और जल संरक्षण से जुड़ी विभिन्न योजनाओं पर भी काम किया जा रहा है.
इसके अलावा, भारत सरकार संयुक्त राष्ट्र की विभिन्न एजेंसियों के साथ मिलकर जलवायु जोखिम वाले समुदायों की आजीविका मजबूत करने और सुरक्षित आंतरिक प्रवास के लिए भी प्रयास कर रही है.
सबसे बड़ी चुनौती अभी क्या है?
भारत ने नवीकरणीय ऊर्जा, आपदा प्रबंधन और शुरुआती चेतावनी प्रणाली के क्षेत्र में तेजी से प्रगति की है, लेकिन जलवायु परिवर्तन से प्रभावित लोगों के पुनर्वास के लिए अभी भी कोई व्यापक और अलग कानूनी व्यवस्था नहीं है. कई राज्यों के पास जलवायु अनुकूलन परियोजनाओं के लिए पर्याप्त वित्तीय संसाधन नहीं हैं. जबकि तेजी से बढ़ते शहरीकरण के कारण शहरों पर दबाव लगातार बढ़ रहा है.
जल सुरक्षा, जलवायु-अनुकूल शहरी विकास, रोजगार के स्थानीय अवसर और सामाजिक सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में अभी भी बड़े निवेश की जरूरत है. यदि इन चुनौतियों का समय रहते समाधान नहीं किया गया, तो जलवायु परिवर्तन का आर्थिक और सामाजिक प्रभाव भविष्य में कहीं अधिक गंभीर हो सकता है.
क्या भारत इस संकट को टाल सकता है?
विशेषज्ञों का मानना है कि Climate Migration को पूरी तरह रोकना संभव नहीं है, लेकिन इसकी गति और प्रभाव को काफी हद तक कम किया जा सकता है. इसके लिए जलवायु-अनुकूल शहरी नियोजन, जल संरक्षण, तटीय सुरक्षा, हरित क्षेत्रों का विस्तार, जलवायु-अनुकूल कृषि, मजबूत हीट एक्शन प्लान और प्रभावित लोगों के पुनर्वास की स्पष्ट नीति पर तेजी से काम करना होगा.
सबसे अहम बात यह है कि जलवायु परिवर्तन को केवल पर्यावरणीय चुनौती नहीं, बल्कि आर्थिक, सामाजिक और विकास से जुड़े मुद्दे के रूप में देखा जाए. भारत के पास अभी भी अवसर है कि वह Climate Resilience को विकास की मुख्यधारा में शामिल कर भविष्य के जलवायु संकट को कम करे.
यदि ऐसा नहीं हुआ, तो आने वाले दशकों में जलवायु-जनित आंतरिक पलायन देश के सामने सबसे बड़ी सामाजिक और आर्थिक चुनौतियों में से एक बन सकता है.




