क्या CJP प्रोटेस्ट को पटरी से उतार रही हिंसा? कहानी चौरी चौरा कांड की, जिसके बाद गांधी ने वापस ले लिया था असहयोग आंदोलन
चौरी चौरा कांड में हिंसा के बाद महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन वापस ले लिया था. जानिए इस ऐतिहासिक फैसले की वजह और आज के आंदोलनों के संदर्भ में इसकी क्या अहमियत है.
क्या CJP (कॉकरोच जनता पार्टी) का प्रोटेस्ट को पटरी से उतार रही हिंसा? इसको लेकर लोगों में चर्चा है. इस सवाल का जवाब कॉकरोच जनता पार्टी के नेताओं आजादी की लड़ाई के दौरान घटी चौरी चौरा कांड से ढूंढने की जरूरत है. यह वही कांड है, जिसके बाद गांधी ने असहयोग आंदोनल वापस ले लिया था. अहम सवाल यह है कि क्या किसी आंदोलन में हिंसा उसकी सबसे बड़ी कमजोरी बन सकती है? समझें डिटेल में.
भारत के स्वतंत्रता आंदोलन का इतिहास बताता है कि इसका जवाब कई बार 'हां' रहा है. आज जब किसी भी बड़े विरोध-प्रदर्शन में हिंसा की घटनाओं पर बहस छिड़ती है, तब 1922 का चौरी चौरा कांड सबसे बड़ा ऐतिहासिक उदाहरण बनकर सामने आता है. हालांकि, हर आंदोलन की परिस्थितियां अलग होती हैं, इसलिए किसी वर्तमान विरोध की सीधी तुलना चौरी चौरा से करना उचित नहीं है.
फिर भी यह घटना बताती है कि हिंसा किस तरह किसी आंदोलन की दिशा और नेतृत्व की रणनीति बदल सकती है. इसका नतीजा यह होता है कि जिस लक्ष्य को लेकर आंदोलन शुरू होता है, वो बहुत पीछे छूट जाता है.
क्या था असहयोग आंदोलन और क्यों बना जनआंदोलन?
महात्मा गांधी ने 1920 में असहयोग आंदोलन की शुरुआत की थी. इसका उद्देश्य था कि भारतीय जनता अंग्रेजी शासन के साथ किसी भी तरह का सहयोग न करे. सरकारी स्कूलों, अदालतों, विदेशी वस्त्रों और सरकारी संस्थानों के बहिष्कार का आह्वान किया गया. यह आंदोलन पूरी तरह अहिंसा और सत्याग्रह के सिद्धांत पर आधारित था. देखते ही देखते लाखों लोग इससे जुड़ गए और ब्रिटिश शासन पर नैतिक दबाव बढ़ने लगा.
क्या हुआ था चौरी चौरा में?
4 फरवरी 1922 को संयुक्त प्रांत (अब उत्तर प्रदेश) के गोरखपुर जिले के चौरी चौरा कस्बे में प्रदर्शन कर रहे लोगों और पुलिस के बीच टकराव हो गया. पुलिस की गोलीबारी से प्रदर्शनकारी भड़क उठे. गुस्साई भीड़ ने पुलिस थाने में आग लगा दी, जिसमें 22 पुलिसकर्मियों की मौत हो गई.
यह घटना अचानक हुई, लेकिन इसका असर पूरे स्वतंत्रता आंदोलन पर पड़ा. अंग्रेजों ने इसे कानून-व्यवस्था के बड़े संकट के रूप में पेश किया और आंदोलन के खिलाफ कार्रवाई तेज कर दी.
गांधी ने आंदोलन वापस लेने का फैसला क्यों किया?
चौरी चौरा की घटना से महात्मा गांधी बहुत दुखी हुए. उन्होंने अपने समर्थकों से निराशा हाथ लगी. उनका मानना था कि यदि आंदोलन हिंसक हो गया तो उसका नैतिक आधार खत्म हो जाएगा. उन्होंने कहा कि देश अभी अहिंसक संघर्ष के लिए पूरी तरह तैयार नहीं है.
इसी सोच के चलते गांधी ने फरवरी 1922 में असहयोग आंदोलन वापस लेने का फैसला किया. उनके इस निर्णय की कई नेताओं ने आलोचना भी की. कुछ का मानना था कि आंदोलन अपने चरम पर था और इसे रोकना रणनीतिक भूल थी. वहीं गांधी का तर्क था कि स्वतंत्रता से पहले नैतिक अनुशासन और अहिंसा अधिक महत्वपूर्ण हैं.
क्या चौरी चौरा कांड ने स्वतंत्रता आंदोलन की दिशा बदल दी?
इतिहासकार मानते हैं कि चौरी चौरा कांड स्वतंत्रता आंदोलन का निर्णायक मोड़ था. असहयोग आंदोलन रुक गया, लेकिन इससे अहिंसा की नीति और मजबूत हुई. बाद में सविनय अवज्ञा आंदोलन और भारत छोड़ो आंदोलन जैसे बड़े अभियानों में भी गांधी ने अहिंसा को प्रमुख सिद्धांत बनाए रखा.
हालांकि, दूसरी ओर कुछ क्रांतिकारी संगठनों ने यह मानना शुरू किया कि केवल अहिंसा से आजादी हासिल करना कठिन होगा. इस तरह चौरी चौरा के बाद स्वतंत्रता आंदोलन के भीतर अलग-अलग विचारधाराएं और स्पष्ट होकर सामने आईं.
क्या आज के आंदोलनों के लिए चौरी चौरा कोई सबक देता है?
चौरी चौरा की सबसे बड़ी सीख यह है कि किसी भी आंदोलन में हिंसा होने पर उसका राजनीतिक और नैतिक असर बदल सकता है. इससे आंदोलन का मूल मुद्दा पीछे छूट सकता है और चर्चा हिंसा पर केंद्रित हो सकती है. साथ ही, प्रशासन को सख्त कार्रवाई का आधार भी मिल सकता है. कुछ इतिहासकारों का कहना है कि इस कांड की वजह से देश को आजादी 1922 के बदले 1947 में मिली.
हालांकि, हर वर्तमान आंदोलन की परिस्थितियां, उद्देश्य, नेतृत्व और कानूनी संदर्भ अलग होते हैं. इसलिए किसी भी समकालीन विरोध या प्रदर्शन का मूल्यांकन उसके अपने तथ्यों और घटनाओं के आधार पर ही किया जाना चाहिए, न कि केवल ऐतिहासिक समानताओं के आधार पर.
चौरी चौरा कांड भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का ऐसा मोड़ था जिसने यह दिखाया कि आंदोलन केवल जनसमर्थन से नहीं, बल्कि उसके तरीके से भी पहचाना जाता है. महात्मा गांधी ने हिंसा को आंदोलन की आत्मा के खिलाफ माना और असहयोग आंदोलन वापस ले लिया. आज भी यह घटना लोकतांत्रिक आंदोलनों, जनप्रदर्शनों और राजनीतिक संघर्षों पर चर्चा में एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक संदर्भ बनी हुई है.
इससे CJP आंदोलन का क्या कनेक्शन?
1922 के चौरी चौरा कांड में प्रदर्शन के दौरान हिंसा भड़कने और पुलिस थाने में आग लगाए जाने से 22 पुलिसकर्मियों की मौत हो गई थी. इस घटना के बाद महात्मा गांधी ने यह कहते हुए असहयोग आंदोलन वापस ले लिया कि अहिंसा आंदोलन की मूल शर्त है और हिंसा से उसका नैतिक आधार कमजोर हो जाता है.
यही वजह है कि जब भी किसी समकालीन आंदोलन में हिंसा की घटनाओं पर चर्चा होती है, तब चौरी चौरा का उदाहरण अक्सर दिया जाता है. यदि CJP (जिसे कुछ लोग 'कॉकरोच आंदोलन' कह रहे हैं) से जुड़े विरोध-प्रदर्शनों में हिंसा के आरोप या घटनाएं सामने आती हैं, तो बहस इस बात पर होती है कि क्या ऐसी घटनाएं आंदोलन के मूल मुद्दों से ध्यान भटका सकती हैं.
हालांकि, दोनों आंदोलनों का ऐतिहासिक, राजनीतिक और कानूनी संदर्भ अलग है, इसलिए उनकी सीधी तुलना करना उचित नहीं माना जाता. कॉकरोच आंदोलन अहिंसक आंदोलन है. लेकिन 20, 21 और 22 जुलाई को हिंस घटनाएं हुई हैं. ये बात अलग है कि इसमें अभी तक किसी की मौत नहीं हुई हैं.




