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Civic Poll Shock: अजित-शरद पवार की जोड़ी फेल, BJP ने पुणे में भी मार ली बाज़ी; अब दोनों के सामने कौन-सा सियासी रास्ता?

महाराष्ट्र के नगर निगम चुनावों ने राज्य की राजनीति में बड़ा बदलाव दिखाया है. पुणे और पिंपरी-चिंचवड़ नगर निगम में बीजेपी ने शानदार जीत दर्ज करते हुए लगातार दूसरी बार अपना दबदबा कायम रखा है. इसके उलट, अजित पवार और शरद पवार की दोनों एनसीपी को करारी हार का सामना करना पड़ा है. 2023 में पार्टी टूट के बाद पहली बार दोनों पवार गुट एक साथ चुनाव मैदान में उतरे थे, लेकिन यह रणनीति भी बीजेपी को चुनौती नहीं दे सकी.

Civic Poll Shock: अजित-शरद पवार की जोड़ी फेल, BJP ने पुणे में भी मार ली बाज़ी; अब दोनों के सामने कौन-सा सियासी रास्ता?
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नवनीत कुमार
Edited By: नवनीत कुमार

Updated on: 17 Jan 2026 8:53 AM IST

महाराष्ट्र के नगर निकाय चुनावों ने राज्य की राजनीति की दिशा को एक बार फिर साफ कर दिया है. पुणे और पिंपरी-चिंचवड़ जैसे अहम शहरी इलाकों में बीजेपी ने लगातार दूसरी बार अपनी मजबूत पकड़ बनाए रखी है. इसके उलट, अजित पवार और शरद पवार दोनों की एनसीपी को करारी हार का सामना करना पड़ा है. यह नतीजे सिर्फ स्थानीय राजनीति तक सीमित नहीं हैं, बल्कि पवार परिवार के भविष्य पर भी बड़े सवाल खड़े कर रहे हैं.

पुणे नगर निगम (PMC) और पिंपरी-चिंचवड़ (PCMC) में दबदबा दिखा. यह जीत इसलिए भी अहम है क्योंकि इस बार बीजेपी ने बिना किसी बड़े गठबंधन के दम पर सत्ता हासिल की है. शहरी मतदाताओं ने विकास, इंफ्रास्ट्रक्चर और स्थिर नेतृत्व को प्राथमिकता दी, जिसका सीधा फायदा बीजेपी को मिला.

एकजुट होकर भी पवारों को नुकसान

यह पहला मौका था जब 2023 में टूट के बाद अजित पवार की एनसीपी और शरद पवार की एनसीपी (एसपी) ने एक साथ चुनाव लड़ा. मकसद था- बीजेपी को उसके मजबूत गढ़ में चुनौती देना. लेकिन नतीजे उलटे निकले. एनसीपी (एसपी) कई नगर निकायों में खाता तक नहीं खोल पाई, वहीं अजित पवार गुट भी पूरी तरह हाशिये पर चला गया. यह एकता मजबूरी साबित हुई, ताकत नहीं.

अजित पवार की रणनीति पर सवाल

डिप्टी सीएम अजित पवार ने इन चुनावों में पहली बार बीजेपी के खिलाफ आक्रामक रुख अपनाया. पिंपरी-चिंचवड़ में कथित भ्रष्टाचार के मुद्दे उठाए गए, जिससे बीजेपी नेतृत्व नाराज हुआ. राज्य बीजेपी अध्यक्ष रविंद्र चव्हाण तक ने सार्वजनिक रूप से कहा कि पार्टी को अजित पवार को साथ लेने का “अफसोस” है. मतदाताओं ने भी इस दोहरी राजनीति को नकार दिया, जिससे अजित पवार की स्थिति और कमजोर हो गई.

अब क्या करेंगे अजित पवार?

इस हार के बाद अजित पवार के सामने दो ही रास्ते दिखते हैं. या तो वे महायुति सरकार में चुपचाप बीजेपी के साथ तालमेल बिठाकर चलें, या फिर अपने चाचा शरद पवार के साथ स्थायी सुलह की दिशा में कदम बढ़ाएं. जिला परिषद चुनाव नजदीक हैं, ऐसे में यह फैसला और भी अहम हो जाता है. कमजोर स्थिति में बीजेपी उनके दबाव को अपने फायदे के लिए इस्तेमाल कर सकती है.

बीजेपी की वापसी लोकसभा के बाद विधानसभा तक

हालांकि 2024 के लोकसभा चुनावों में महायुति को झटका लगा था, लेकिन बीजेपी ने पुणे संसदीय सीट पर लगातार तीसरी जीत दर्ज की. इसके बाद विधानसभा चुनावों में पार्टी ने जबरदस्त वापसी की और पुणे व पिंपरी-चिंचवड़ की लगभग सभी सीटें जीत लीं. नगर निगम चुनावों के नतीजे उसी सिलसिले की अगली कड़ी माने जा रहे हैं, जिसने बीजेपी की स्थिति और मजबूत कर दी है.

रणनीति बदली, उम्मीदवार भी बदले

बीजेपी ने इस चुनाव में नई रणनीति अपनाई. पार्टी ने पुराने चेहरों के बजाय नए और जमीनी कार्यकर्ताओं को मौका दिया. 2017 में जीते 97 पार्षदों में से 30 को टिकट नहीं दिया गया. इसके साथ ही, विपक्षी दलों से मजबूत उम्मीदवारों को पार्टी में शामिल किया गया. “विननेबिलिटी” यानी जीत की संभावना को ही टिकट का आधार बनाया गया, जिसका असर नतीजों में साफ दिखा.

पवारों के लिए चेतावनी, बीजेपी के लिए बढ़त

इन चुनावों ने यह साफ कर दिया है कि शहरी महाराष्ट्र में बीजेपी अब सिर्फ विकल्प नहीं, बल्कि पहली पसंद बनती जा रही है. वहीं, पवार परिवार की राजनीति को नए सिरे से आत्ममंथन की जरूरत है. बिखरा विपक्ष, वोटों का बंटवारा और रणनीतिक भ्रम- इन सबका खामियाजा उन्हें भुगतना पड़ा. आने वाले महीनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या पवार अपनी खोई जमीन वापस पा पाते हैं या बीजेपी का विस्तार और तेज होता है.

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