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'मैं भी छोटू था...' कभी ढाबे पर करता था मजदूरी, आज हजारों बच्चों के हाथों में थमा रहा है किताबें

जो कभी खुद बाल मजदूर था, लेकिन आज हजारों बच्चों के जीवन को संवारने के मिशन में जुटा हुआ है. यह कहानी है रिक्की राज की, जो ‘छोटू फाउंडेशन’ के संस्थापक हैं और अपने प्रयासों से देशभर के जरूरतमंद बच्चों तक शिक्षा पहुंचा रहे हैं.

मैं भी छोटू था... कभी ढाबे पर करता था मजदूरी, आज हजारों बच्चों के हाथों में थमा रहा है किताबें
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मोहम्मद रज़ा
By: मोहम्मद रज़ा4 Mins Read

Updated on: 12 Jun 2026 4:46 PM IST

बचपन में जिस उम्र में बच्चों के हाथों में किताबें होनी चाहिए थीं, उस उम्र में रिक्की राज ढाबे पर काम कर रहे थे. गरीबी और मजबूरियों ने उन्हें बाल मजदूरी करने पर मजबूर कर दिया, लेकिन उन्होंने अपने संघर्ष को ही अपनी ताकत बना लिया. आज वही रिक्की हजारों जरूरतमंद बच्चों को शिक्षा से जोड़ने का काम कर रहे हैं और उनके हाथों में मजदूरी नहीं, बल्कि किताबें थमा रहे हैं. उनकी कहानी इस बात का उदाहरण है कि कठिन हालात भी बड़े सपनों को रोक नहीं सकते.

यह कहानी है रिक्की राज की, जो ‘छोटू फाउंडेशन’ के संस्थापक हैं और अपने प्रयासों से देशभर के जरूरतमंद बच्चों तक शिक्षा पहुंचा रहे हैं. उत्तर प्रदेश के फिरोजाबाद के रहने वाले रिक्की राज का बचपन बेहद संघर्षों में बीता. परिवार आर्थिक तंगी से जूझ रहा था. पिता मजदूरी करते थे और परिवार झुग्गी-झोपड़ी में रहता था. घर की खराब आर्थिक स्थिति के कारण रिक्की को भी कम उम्र में काम करना पड़ा. उन्होंने ढाबे पर काम किया और बचपन में ही मजदूरी की कठिनाइयों को करीब से महसूस किया. रिक्की बताते हैं कि काम करते समय उनके मन में अक्सर यह सवाल उठता था कि आखिर एक बच्चा होकर उन्हें काम क्यों करना पड़ रहा है.

संघर्षों के बीच उन्होंने सरकारी स्कूल से अपनी पढ़ाई पूरी की. बचपन के अनुभवों ने उनके मन में एक संकल्प पैदा किया कि बड़े होकर वे उन बच्चों के लिए काम करेंगे, जो मजबूरी में बाल मजदूरी करने को विवश हैं. इसी सोच के साथ वर्ष 2018 में उन्होंने ‘छोटू फाउंडेशन’ की शुरुआत की.

आज छोटू फाउंडेशन के माध्यम से हजारों बच्चों को ‘छोटू की पाठशाला’ के जरिए शिक्षा दी जा रही है. संस्था केवल पढ़ाई तक सीमित नहीं है, बल्कि गरीब और जरूरतमंद बच्चों को उनकी जरूरत का सामान भी उपलब्ध कराती है. रिक्की का मानना है कि किसी भी बच्चे को सिर्फ गरीबी की वजह से खुद को दूसरों से कमतर महसूस नहीं करना चाहिए.

रिक्की बताते हैं कि उनका सपना पहले पत्रकार बनने का था, लेकिन परिस्थितियां अलग रहीं. हालांकि आज उन्हें इस बात की खुशी है कि वे बच्चों के जीवन में बदलाव लाने का काम कर रहे हैं. उनका कहना है कि उनका उद्देश्य बच्चों को इतना शिक्षित बनाना है कि वे अपने पैरों पर खड़े हो सकें. भले ही सभी बच्चे बड़े अधिकारी न बनें, लेकिन इतना जरूर पढ़ें कि अपने जीवन के फैसले खुद ले सकें और सम्मानजनक जीवन जी सकें.

वे बताते हैं कि छोटू फाउंडेशन से पढ़कर निकले कई बच्चे आज आत्मनिर्भर बन चुके हैं और विभिन्न क्षेत्रों में अच्छा काम कर रहे हैं. उनका लक्ष्य है कि ये बच्चे पढ़-लिखकर देश के जिम्मेदार और अच्छे नागरिक बनें.

रिक्की राज ने बताया कि छोटू की पाठशाला की शुरुआत फिरोजाबाद से हुई थी, लेकिन आज यह पहल देश के कई राज्यों तक पहुंच चुकी है. उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा कि कई बार बच्चों को पाठशाला तक लाने के लिए उन्हें खाने की चीजें या छोटे-छोटे उपहार देने पड़ते हैं. उनका मानना है कि अगर इसी बहाने बच्चे शिक्षा से जुड़ते हैं तो यह प्रयास सार्थक है.

सोशल मीडिया भी छोटू फाउंडेशन की सफलता का एक बड़ा आधार बना है. छोटू फाउंडेशन के सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर लाखों लोग जुड़े हुए हैं. अकेले फेसबुक पर ही संस्था को 15 लाख से अधिक लोग फॉलो करते हैं. रिक्की का कहना है कि सोशल मीडिया के माध्यम से उन्हें सबसे ज्यादा सहयोग मिलता है, जिसकी मदद से वे अधिक से अधिक बच्चों तक पहुंच पाते हैं.

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