फांसी की सजा से 2 महीने पहले भगत सिंह का जेल से वो खत...दोस्त जयदेव को थमाई थी किताबों की लंबी फेहरिस्त, आखिर चिट्ठी में क्या लिखा था?
फांसी की सजा होने से पहले भगत सिंह ने अपने दोस्त जयदेव को खत लिखा था, इस खत में उन्होंने कई किताबें मंगाने की बात कही थी और साथ ही बटुकेश्वर दत्त की बहन से मिलने के लिए भी कहा था.
भगत सिंह को अक्सर देश की आजादी के लिए अपने बलिदान और क्रांतिकारी विचारों के लिए याद किया जाता है. लेकिन उनके व्यक्तित्व का एक अहम पहलू उनकी किताबों के प्रति गहरी रुचि भी थी. जेल में रहने के दौरान भी उनका पढ़ने का सिलसिला जारी रहा. वह खुद के लिए ही नहीं, बल्कि अपने साथियों के लिए भी किताबें मंगवाने की कोशिश करते थे. लाहौर जेल से अपने बचपन के साथी जयदेव को लिखी उनकी एक चिट्ठी इसी बात की झलक देती है.
इस पत्र में भगत सिंह ने द्वारकानाथ पुस्तकालय से अपने नाम पर कई किताबें जारी करवाकर शनिवार को कुलबीर के हाथ जेल भेजने की गुजारिश की थी. इसके साथ ही भगत सिंह ने कहा था कि वह उन्हें इतनी परेशानी देने के लिए माफी मांगना चाहते हैं. यह खत 24 जुलाई 1930 को भगत सिंह ने लाहौर सेंट्रल जेल से लिखा गया था. इसके दो महीने बाद 7 अक्टूबर 1930 को उन्हें फांसी की सजा सुनाई गई और इसके कुछ महीनों बाद यानी 23 मार्च 1931 को भगत सिंह को फांसी दे दी गई थी.
भगत सिंह ने किन किताबों को मंगाया था?
उन्होंने जिन किताबों की लिस्ट दी, उनमें ‘Materialism’, ‘Why Men Fight’, ‘Soviet at Work’, ‘Collapse of the Second International’, ‘Left-Wing Communism’, ‘Feed, Factories and Workshops’, ‘Land Revolution in Russia’, ‘Mutual Aid’ और ‘Civil War in France’ शामिल थीं. इसके अलावा उन्होंने ‘Historical Materialism’ नाम की एक और किताब मंगवाने की बात कही थी, जिसके बारे में उन्होंने लिखा कि यह पंजाब पब्लिक लाइब्रेरी में मिल सकती है.
भगत सिंह अपने खत में लिखते हैं, “पंजाब पब्लिक लाइब्रेरी से मेरे लिए एक और किताब भेज देना. किताब का नाम ‘Historical Materialism’ है, जिसे बुख़ारिन ने लिखा है, साथ ही लाइब्रेरियन से यह भी पता कर लेना कि क्या कुछ किताबें बोर्स्टल जेल भेजी गई हैं. वहां किताबों की बहुत कमी है. मैंने सुखदेव के भाई जयदेव के हाथ किताबों की एक लिस्ट भेजी थी, लेकिन उन्हें अभी तक एक भी किताब नहीं मिली है. अगर उनके पास किताबों की कोई सूची नहीं है, तो लाला फिरोज चंद से अपनी पसंद की कुछ अच्छी और रोचक किताबें भेजने के लिए कहना. ये किताबें मेरे रविवार को वहां जाने से पहले उन तक पहुंच जानी चाहिए. इस काम को जरूर करना और इसे ध्यान में रखना.”
भगत सिंह ने यह भी कहा था कि जब वह रविवार को वहां जाएं तो तब तक किताबें पहुंच जानी चाहिए. इसके साथ उन्होंने किसान समस्या से जुड़ी किताबें भी भेजने को कहा. इनमें ‘Punjab Peasants in Prosperity and Debt’ और ऐसी ही दो अन्य किताबें डॉक्टर आलम के लिए भेजने का अनुरोध किया गया था.
चिट्ठी के आखिर में भगत सिंह ने क्या लिखा था?
भगत सिंह लिखते हैं, “उम्मीद है कि मुझे इस परेशानी के लिए तुम माफ करोगे. मैं वादा करता हूं कि भविष्य में तुम्हें ऐसी परेशानी नहीं दूंगा. मेरे सभी दोस्तों को मेरी याद कहना और लज्जावती जी को मेरी ओर से सम्मान कहना, मुझे यकीन है कि अगर दत्त की बहन आईं तो वह मुझसे मिलने जरूर आएंगी.”
यह चिट्ठी भगत सिंह के उस रूप को सामने लाती है, जिसमें वे क्रांतिकारी होने के साथ-साथ पढ़ने और नई चीजें सीखने में भी काफी रुचि रखते थे. 23 मार्च 1931 को लाहौर जेल में भगत सिंह और उनके साथियों ने देश के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए. बताया जाता है कि शहादत से पहले भी भगत सिंह किताब पढ़ रहे थे. उनके लिए किताबें सिर्फ पढ़ने की चीज नहीं थीं, बल्कि ज्ञान और विचारों को समझने का जरिया थीं.




