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परछाईं रहे विनोद बोले- 90 की उम्र में मौत सामने देखकर भी ‘हंसते’ रहने की कुव्वत BBC वाले Mark Tully की ही थी साहब

BBC के दिग्गज पत्रकार सर विलियम मार्क टली का 25 जनवरी को नई दिल्ली में 90 वर्ष की उम्र में निधन हो गया. भारत में बीबीसी के सबसे प्रभावशाली चेहरों में रहे मार्क टली ने बाबरी मस्जिद विध्वंस, इंदिरा गांधी और राजीव गांधी की हत्या, ऑपरेशन ब्लू स्टार जैसे ऐतिहासिक घटनाक्रमों की ब्रेकिंग रिपोर्टिंग कर अंतरराष्ट्रीय पत्रकारिता में अलग पहचान बनाई. 1964 में बीबीसी से जुड़े मार्क टली करीब 30 वर्षों तक संस्थान में रहे, जिनमें से 20 साल भारत में बीबीसी ब्यूरो प्रमुख रहे। 1994 में बीबीसी से इस्तीफा देने के बाद उन्होंने भारत में रहते हुए स्वतंत्र पत्रकारिता जारी रखी.

photo of mark tully and vinod kumar
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पादरी बनने निकले थे, पत्रकार बनकर इतिहास लिख गए – मार्क टली की कहानी

( Image Source:  Facebook/Vinod Kumar )
संजीव चौहान
By: संजीव चौहान

Updated on: 25 Jan 2026 11:23 PM IST

BBC Journalist Mark Tully story: भारत में बीबीसी के मूर्धन्य पत्रकार रहे सर विलिमय मार्क टली (भारत में कमोबेश इनका नाम टुली भी लिखा बोला जाता रहा है) (Sir William Mark Tully) का, भारत की राजधानी नई दिल्ली में 25 जनवरी 2026 को दोपहर बाद निधन हो गया. 90 साल के वरिष्ठ पत्रकार और दुनिया भर में भारत की 'ब्रेकिंग-न्यूज' के धुरंधर पत्रकार रहे बीबीसी वाले ‘विलियम मार्क टली सर’ लंबे समय से कई बीमारियों से परेशान थे. उन्होंने भारत के 77वें गणतंत्र दिवस समारोह से एक दिन पहले यानी 25 जनवरी 2026 को दोपहर बाद दिल्ली के एक निजी अस्पताल में अंतिम सांस ली.

अयोध्या में बाबरी मस्जिद ढहाए जाने, प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या या फिर पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की तमिलनाडु में हत्या की खबर या फिर, जून 1984 में भारतीय फौज द्वारा अपनों के ही खिलाफ लड़ा गया युद्ध यानी ऑपेरशन ब्लू स्टार में सेना का अमृतसर स्थित स्वर्ण मंदिर के भीतर मय टैंक-तोप गोला के प्रवेश की खबर ब्रेक करने वाले, सर विलियम 'मार्क' टली ने जुलाई 1994 में बीबीसी से इस्तीफा दे दिया था. उसके बाद से वह भारत में ही रहकर स्वतंत्र पत्रकारिता कर रहे थे.

मार्क टुली और विनोद कुमार

मार्क टली का परिवार और दिल्ली

मार्क टली सपरिवार दिल्ली के निजामुद्दीन इलाके में रह रहे थे. 30 साल तक बीबीसी के सेवा के दौरान वह 20 साल तक तो सिर्फ भारत में (नई दिल्ली) ही बीबीसी ब्यूरो प्रमुख रहे. साल 1964 में बीबीसी में सेवा शुरू करने वाले मार्क टली का जन्म 1936 में कोलकता (तब के कलकत्ता) में अंग्रेज अकाउंटेंट पिता के यहां हुआ था. चूंकि उनका परिवार विदेशी मूल का था तो शुरूआत के 10-12 साल तक उन्हें घर वालों ने भारतीय समाज से एकदम दूरी बरतने की सख्त हिदायत दे रखी थी.

कौन हैं विनोद?

एक तरफ मार्क टली के साथ या तो उनकी पत्नी व खून के रिश्ते अंतिम समय तक छाया की मानिंद साथ रहीं. तो वहीं दूसरी ओर एक ऐसी शख्शियत है जिससे मार्क टली और उनके परिवार का खून का रिश्ता तो कोई नहीं था. मगर विनोद अपने कुनवा-खानदान की उस तीसरी पीढ़ी के सदस्य हैं, जो छाया की मानिंद 24 घंटे अच्छे-बुरे वक्त में टली परिवार के साथ, विशेषकर मार्क टली के साथ बने रहे. मूल रूप से उत्तर प्रदेश के बरेली शहर के निवासी विनोद जी वह शख्सियत हैं जिनके नाना नानी, मां-पिता ने तो मार्क टुली की सेवा में अपना जीवन तो दिया ही, नाना-नानी और माता-पिता के बाद विनोद खुद भी अपनी तमाम खुशियों को न्योछावर करके किशोरावस्था में ही मार्क टुली के साथ जुड़ गए.

मार्क टुली और विनोद कुमार

एक मार्क टली के साथ तीन पीढ़ियां

ऐसे बिरले पत्रकार मार्क टुली के असमय निधन के तुरंत बाद 25 जनवरी 2026 को दोपहर बाद विनोद से नई दिल्ली में मौजूद स्टेट मिरर हिंदी के एडिटर क्राइम इनवेस्टीगेशन संजीव चौहान ने उनकी यादों से जुड़ी तमाम बातें कीं. विनोद ने बताया, “मेरे नाना नानी और उसके बाद मेरी मां ने भी अपनी तमाम उम्र मार्क टली साहब के साथ ही उनकी सेवा में गुजार दिया. मां और नाना-नानी के बाद फिर मैं भी बचपन में ही टली परिवार के पास आ गया. इस वक्त मेरी उम्र 40-45 साल है. मैं करीब 30 साल से मार्क सर के साथ 24 घंटे रह रहा था.”

मौत सामने देखकर मार्क ही हंस सके

विनोद के मुताबिक, बीते मंगलवार को मार्क टली साहब की तबियत तो खराब थी. इसके बाद भी वह मेरे साथ खूब हंस-बोल रहे थे. वे कितनी भी बीमारी में हों, मगर हंसते रहते थे. उनके साथ मुझे यह कभी महसूस नहीं हुआ कि वह गंभीर बीमारी से जूझ रहे हों. मैंने सर से यही सीखा कि परेशानी कितनी भी क्यों न हो मगर उस परेशानी को खुद के ऊपर हावी मत होने दो.

बातचीत के दौरान विनोद बताते हैं कि दो तीन दिन से मार्क टली साहब की तबियत ज्यादा खराब होने लगी. उन्हें दिल्ली के साकेत स्थित एक निजी अस्पताल में दाखिल कराया गया, जहां 25 जनवरी को दोपहर बाद उन्होंने अंतिम सांस ली. टली साहब का अंतिम संस्कार 26 जनवरी को शाम चार बजे दिल्ली के लोधी रोड स्थित शमशान घाट पर होना तय हुआ है.

बचपन में घर की पाबंदियां

मार्क टली के बारे में जग-जाहिर है कि वह जन्म के बाद 10-12 साल तक कोलकता में ही रहे. उसके बाद उच्च शिक्षा के लिए उन्हें इंग्लैंड भेज दिया गया, जहां उन्होंने ट्राईफोर्ड स्कूल, मार्लबोरो कॉलेज और ट्रिनिटी हॉल, कैम्ब्रिज आदि से धर्मशास्त्र की पढ़ाई पूरी की. सोचा तो उन्होंने किसी चर्च में पादरी बनने की थी, मगर विधि के विधान में तो उनका पत्रकार बनकर दुनिया में अपनी ब्रेकिंग खबरों को लेकर छा जाना लिखा था. सो बीबीसी में पत्रकार बन गए.

चर्च पादरी की जगह पत्रकार बनने का किस्सा

एक बार मार्क टली से किसी ने पूछा था कि धर्मशास्त्र का स्टूडेंट जो इंग्लैंड के किसी चर्च में पादरी बनने का इच्छुक था, उसने बीबीसी पत्रकार बनने की ओर दिशा कैसे मोड़ दी? तब मार्क बोले, “एक ईसाई पादरी के रूप में व्यवहार करने के लिए मैं अपनी कामुक मानसिकता पर नियंत्रण रख पाने में खुद को असमर्थ मान चुका था. इसलिए पादरी बनने का रास्ता छोड़ दिया. उसके बाद साल 1964 में जब बीबीसी लंदन ज्वाइन किया तो उसके अगले ही साल यानी साल 1965 मे बीबीसी में ही मैं दोबारा भारत आ पहुंचा और फिर यहीं का होकर रह गया.”

हर कोई मार्क टली नहीं बन सकता

करीब 30 साल बीबीसी में रहने के बाद वहां से उनके इस्तीफे का भी मजेदार किस्सा है. साल 1994 के अंतिम महीनों में एक दिन मार्क की बहस बीबीसी के तत्कालीन महानिदेशक जॉन बिर्ट से हो गई. उसी दिन उन्होंने बीबीसी को बिना आगे पीछे की कुछ सोचे-विचारे इस्तीफा दे दिया. यहां जिक्र उन्हीं मार्क टली का उनकी अनुपस्थिति में कर रहा हूं जिन मार्क टली को साल 1985 में 'ऑफिसर ऑफ द ऑर्डर दी ब्रिटिश एम्पायर' और उसके बाद साल 1992 में भारत में पद्मश्री से सम्मानित किया गया था.

मार्क टली के साथ अंतिम समय तक परछाई की तरह रहने वाले विनोद बताते हैं, “मैं मुसीबत में भी हार न मानकर जूझते रहने और हंसते रहने का सलीका मार्क टली साहब से ही सीखा है. मैं चाहता था कि मैं भी मार्क टली की ही तरह कुछ बन सकूं, लेकिन यह सिर्फ मेरा बहम मेरा मन और मेरी हसरत हो सकती है. इस इंसानी दुनिया में हर कोई मार्क टली नहीं बन सकता है. मार्क टली सर बनने की कल्पना करना जितना आसान है, उनके जैसा बन पाना उतना ही दूभर या दूर की कौड़ी है.” भारत सरकार ने साल 2005 में ऐसे बिरले पत्रकार मार्क टली को पद्म भूषण से भी सम्मानित किया था.

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