हॉलीवुड की वो स्टार जिसने मरते दम तक छुपाई अपने भारतीय होने की पहचान, Merle Oberon जो मुंबई-कोलकाता में थी पली बढ़ी
1930-40 के दशक की ग्लैमरस स्टार मर्ले ओबेरॉन असल में भारत में जन्मी थीं, लेकिन नस्लवाद के डर से उन्होंने खुद को तस्मानिया में जन्मी बताया. उनकी जिंदगी सफलता और छिपी पहचान की मार्मिक दास्तान है.
1930 और 1940 के दशक की हॉलीवुड की सबसे चमकदार और ग्लैमरस सितारों में से एक थीं मर्ले ओबेरॉन. उनकी खूबसूरती ऐसी थी कि लोग उन्हें देखते ही मंत्रमुग्ध हो जाते थे. बड़ी-बड़ी आंखें, सुंदर चेहरा, और वो राजसी अंदाज़ जो स्क्रीन पर जादू बिखेरता था. लेकिन उनकी जिंदगी की असली कहानी उतनी ही रहस्यमयी और दर्द भरी थी, जितनी उनकी फिल्में रोमांचक.
ये कहानी शुरू होती है 19 फरवरी 1911 से, जब बॉम्बे (अब मुंबई) के एक साधारण घर में एक बच्ची का जन्म हुआ उसका नाम रखा गया एस्टेल मर्ल ओ'ब्रायन थॉम्पसन. प्यार से सब उसे क्वीनी कहते थे. उनके पिता आर्थर थॉम्पसन ब्रिटिश मूल के एक रेलवे इंजीनियर थे, जो भारतीय रेलवे में काम करते थे. लेकिन मां की कहानी और भी जटिल थी.
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उनकी मां कॉन्स्टेंस सेल्बी मात्र 14 साल की थीं जब क्वीनी पैदा हुईं. कॉन्स्टेंस श्रीलंका (तब सीलोन) की बर्गर कम्युनिटी से थीं, जिनमें सिंहली (श्रीलंकाई) और कुछ माओरी (न्यूजीलैंड मूल) ब्लड कनेक्शन रखती थी. परिवार की परिस्थितियां इतनी कठिन थीं कि क्वीनी को उनकी दादी शार्लोट सेल्बी ने अपनी बेटी की तरह पाला. असल में, कॉन्स्टेंस उनकी बहन बताई जाती थीं ये झूठ परिवार का एक राज था, ताकि समाज की नजरों से बच्ची की असलियत छिपी रहे बचपन गरीबी में बीता.
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पहले बॉम्बे, फिर परिवार कलकत्ता (अब कोलकाता) चला गया. वहां क्वीनी ने एक अच्छे स्कूल में स्कॉलरशिप जीती, लेकिन उनके मिश्रित रंग-रूप की वजह से क्लासमेट और समाज ने उन्हें ताने मारे, अपमानित किया. एंग्लो-इंडियन होने की वजह से ब्रिटिश और भारतीय दोनों समाजों में उन्हें जगह नहीं मिली. वो हमेशा अलग-थलग महसूस करतीं. स्कूल से निकाल दिया गया, क्योंकि उनके 'खुले नस्लवाद' वाले साथी उन्हें बर्दाश्त नहीं कर पाए.
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क्वीनी के मन में एक सपना था शोहरत का, चमक-दमक का, और सबसे बढ़कर उस भारत से दूर जाने का, जहां उनकी पहचान उन्हें दर्द देती थी. 1920 के अंत में, महज 17-18 साल की उम्र में, वो अपनी दादी को साथ लेकर इंग्लैंड पहुंच गईं. दादी को नौकरानी बनाकर रखा गया, और दोनों घर में सिर्फ हिंदी में बात करती थीं ये उनका आखिरी कनेक्शन था अपनी जड़ों से.
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इंग्लैंड में उन्होंने नाम बदला मर्ले ओबेरॉन. फिल्मों में छोटे-छोटे रोल मिलने लगे. फिर मिले प्रोड्यूसर अलेक्जेंडर कोरदा से, जिनसे बाद में शादी भी की.1933 में आई फिल्म 'द प्राइवेट लाइफ ऑफ हेनरी VIII' में ऐनी बोलेन का रोल निभाया ये उनकी पहली बड़ी सफलता थी. दुनिया भर में लोग उनकी खूबसूरती और टैलेंट की तारीफ करने लगे. लेकिन साथ ही सवाल उठने लगे ये खूबसूरत औरत कहां से आई है? उसका जन्मस्थान क्या है?
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मर्ले ने एक कहानी गढ़ ली. उन्होंने कहा कि वो तस्मानिया (ऑस्ट्रेलिया) में पैदा हुईं, ब्रिटिश माता-पिता की बेटी हैं, और उनके जन्म के रिकॉर्ड आग में जल गए. तस्मानिया इसलिए चुना गया क्योंकि वो अमेरिका और यूरोप से बहुत दूर था कोई आसानी से सच नहीं पता कर पाता. ये कहानी इतनी मजबूत थी कि लोग मान गए. क्योंकि उस जमाने में हॉलीवुड में रंगभेद चरम पर था.
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हेज़ कोड (मोशन पिक्चर प्रोडक्शन कोड) ने मिश्रित नस्ल के रिश्तों को दिखाने पर भी रोक लगा रखी थी. अमेरिका के कई राज्यों में अंतरजातीय शादी गैरकानूनी थी. अगर पता चलता कि मर्ले दक्षिण एशियाई मूल की हैं, तो उनकी करियर खत्म हो जाती. मिश्रित नस्ल के एक्टर्स को रोल नहीं मिलते थे इसलिए उन्होंने मेकअप, लाइटिंग, और इस झूठी कहानी से खुद को 'श्वेत' बनाए रखा.
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फिर आई वो फिल्म जो उन्हें अमर बना गई 'वुथरिंग हाइट्स' (1939) लॉरेंस ओलिवियर के साथ कैथी का रोल निभाया. इस फिल्म के लिए उन्हें ऑस्कर के लिए नॉमिनेशन मिला. वे साउथ एशियाई मूल की पहली एक्ट्रेस थीं जिन्हें ऐसा सम्मान मिला. लेकिन दुनिया को नहीं पता था कि ये 'श्वेत' दिखने वाली खूबसूरत औरत असल में मुंबई की बेटी है.
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मर्ले ने कभी अपनी जड़ों को स्वीकार नहीं किया. अफवाहें आईं, लेकिन उन्होंने हमेशा इंकार किया. उनकी मौत 23 नवंबर 1979 को हुई. उसके बाद ही सच सामने आया 1983 में उनकी जीवनी प्रिंसेस मर्ले में तस्वीरें और दस्तावेज़ सामने आए. 2002 की डॉक्यूमेंट्री 'द ट्रबल विद मर्ले' ने उनके राज को और खोला.
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हाल के सालों में किताबें जैसे लव, क्वीनी ने उनकी पूरी कहानी बयान की. मर्ले ओबेरॉन की जिंदगी एक ट्रेजेडी भी है और एक जीत भी. उन्होंने रंगभेदी दुनिया में सफलता हासिल की, लेकिन अपनी असली पहचान छिपाकर. आज वो भारत में लगभग भुला दी गई हैं, लेकिन उनकी कहानी हमें याद दिलाती है कि कितने लोग अपनी जड़ों को छिपाकर सपने पूरे करते हैं क्योंकि समाज उन्हें वैसा ही स्वीकार नहीं करता जैसा वो हैं.





