'सांसों की माला पे सिमरूं मैं पी का नाम' का क्या है मतलब? मीराबाई से नुसरत फतेह अली खान तक, अब 'मिर्जापुर' में मचा रहा धूम
मीराबाई की कृष्ण भक्ति से जुड़े इस लोकप्रिय भजन के कई संस्करण लोगों ने सुने हैं. नुसरत फतेह अली खान की आवाज में इसे खास पहचान मिली, वहीं मिर्जापुर में इस्तेमाल के बाद गीत फिर चर्चा में है.
मिर्जापुर फिल्म में 'सांसों की माला पे सिमरूं मैं पी का नाम' की गूंज ने इन दिनों सोशल मीडिया पर जबरदस्त हलचल मचा रखी है. गाने का इस्तेमाल होते ही लोगों के बीच इसके असल गायक, मूल रचना और सबसे मशहूर वर्जन को लेकर तरह-तरह की बातें शुरू हो गई हैं. कोई इसे सीधे फिल्म का गाना बता रहा है, तो कोई इसे किसी एक सिंगर की मूल आवाज से जोड़ रहा है.
लेकिन इस गाने की कहानी फिल्म से कहीं पुरानी और दिलचस्प है. 'सांसों की माला पे सिमरूं मैं पी का नाम' मूल रूप से कृष्ण भक्ति से जुड़ा भजन है, जिसे मीराबाई की भक्ति परंपरा से 16वीं शताब्दी में गया था. बाद में इसे अलग-अलग गायकों ने अपनी-अपनी शैली में गाया और यही वजह है कि इसके कई लोकप्रिय संस्करण सुनने को मिलते हैं. इनमें उस्ताद नुसरत फतेह अली खान का संस्करण खास तौर पर बेहद लोकप्रिय हुआ, जबकि कविता कृष्णमूर्ति की आवाज में फिल्म कोयला (1997) वाला संस्करण भी लोगों के बीच खूब सुना गया.
अब मिर्जापुर में इसके इस्तेमाल ने इस पुराने भक्ति गीत को एक बार फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है. आखिर इस गीत की असली कहानी क्या है? मीराबाई से इसका क्या रिश्ता है, नुसरत फतेह अली खान का वर्जन इतना मशहूर कैसे हुआ और गीत की हर पंक्ति का असली भाव क्या है? आइए, इस पूरे गीत को आसान हिंदी में समझते हैं.
'सांसों की माला पे सिमरूं मैं, पी का नाम'
हर सांस को माला के एक मनके की तरह मानकर भक्त अपने प्रियतम का नाम जपता है. यानी जीवन की हर सांस में ईश्वर का स्मरण बना रहे.
'अपने मन की मैं जानूं, और पी के मन की राम'
मैं अपने मन की भावनाओं को जानता/जानती हूं, लेकिन मेरे प्रियतम के मन में मेरे लिए क्या है, यह केवल भगवान जानते हैं. इसमें प्रेम के साथ समर्पण और विनम्रता है.
'जीवन का श्रृंगार है प्रीतम, माँग का सिन्दूर'
जिस तरह सुहागिन के लिए सिंदूर उसके वैवाहिक जीवन और प्रेम का प्रतीक है, उसी तरह इस भक्त के लिए प्रियतम ही जीवन की सबसे बड़ी शोभा और पहचान हैं. यहां प्रेम को जीवन का सबसे महत्वपूर्ण आधार बताया गया है.
'प्रीतम की नज़रों से गिरकर, जीना है किस काम'
अगर मैं अपने प्रियतम की नजरों में ही गिर जाऊं और उनका प्रेम व स्वीकृति न मिले, तो फिर ऐसा जीवन मेरे लिए किस काम का? यह पंक्ति प्रियतम के प्रति पूर्ण भावनात्मक समर्पण दिखाती है.
'प्रेम के रंग में ऐसी डूबी, बन गया एक ही रूप'
प्रेम इतना गहरा हो गया कि भक्त और प्रियतम के बीच का अलगाव मिटने लगा. भक्त पूरी तरह उसी प्रेम में रंग गया और उसे अपने प्रियतम से अलग कुछ दिखाई नहीं देता.
'प्रेम की माला जपते जपते, आप बनी मैं श्याम'
प्रियतम के प्रेम का लगातार स्मरण करते-करते भक्त स्वयं उसी के रंग में रंग जाता है. यहां ‘श्याम’ भगवान कृष्ण के लिए है. भाव यह है कि कृष्ण का इतना ध्यान किया कि भक्त के भीतर भी कृष्ण का ही रंग बस गया.
'प्रीतम का कुछ दोष नहीं है, वो तो है निर्दोष'
भक्त अपने प्रियतम पर कोई आरोप नहीं लगाता. वह मानता है कि प्रियतम निर्दोष हैं और उसके दुख या बेचैनी के लिए उन्हें जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता.
'अपने आप से बातें कर के, हो गयी मैं बदनाम'
प्रेम की तड़प इतनी बढ़ गई कि भक्त हर समय अपने प्रियतम के बारे में सोचता और उनसे मन ही मन बातें करता रहता है. दुनिया को यह व्यवहार अजीब लगता है, इसलिए लोग उसे बदनाम करने लगते हैं. यहां भक्ति में डूबे व्यक्ति और दुनिया की सोच के बीच का अंतर दिखाया गया है.
'प्रेम पियाला जब से पिया है, जी का है ये हाल'
जब से प्रेम का अनुभव हुआ है, तब से जीवन पूरी तरह बदल गया है. प्रेम ने भक्त को इतना प्रभावित कर दिया है कि उसकी पूरी चेतना उसी प्रियतम में लगी रहती है.
'अंगारों पे नींद आ जाए, काँटों पे आराम'
सच्चे प्रेम में ऐसी शक्ति होती है कि कठिनाइयां भी कठिन नहीं लगतीं. अंगारों जैसी तकलीफ में भी नींद आ सकती है और कांटों जैसी परिस्थितियों में भी आराम महसूस होता है. यानी प्रियतम का प्रेम मिल जाए तो दुख भी सुख जैसा लगने लगता है.
पूरे गीत का सार
यह गीत मूल रूप से ऐसे प्रेम और भक्ति की बात करता है जिसमें भक्त अपने प्रियतम में पूरी तरह समर्पित हो जाता है. उसकी हर सांस में प्रियतम का नाम है, हर विचार में प्रियतम है और धीरे-धीरे उसे अपने और प्रियतम के बीच कोई अंतर महसूस नहीं होता. ‘पी’, ‘प्रीतम’ और ‘श्याम’ को कृष्ण/परमात्मा के रूप में पढ़ें तो यह गीत सांसारिक प्रेम से ऊपर उठकर भक्त और भगवान के बीच के गहरे प्रेम का भाव बन जाता है. इसमें संदेश है कि जब प्रेम सच्चा और पूर्ण हो जाता है, तो व्यक्ति सुख-दुख, मान-अपमान और दुनिया की परवाह से ऊपर उठकर अपने प्रियतम में लीन हो जाता है.




