क्या था 48 साल पुराना खौफनाक केस रंगा-बिल्ला कांड? OTT पर रिलीज 'Raakh' ने ताजा किए जख्म, बॉबी देओल का भी है कनेक्शन
अमेजन प्राइम वीडियो की नई सीरीज 'राख' ने 1978 के उस रंगा-बिल्ला कांड को फिर सुर्खियों में ला दिया है, जिसने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया था.
हाल ही में अमेज़न प्राइम वीडियो पर रिलीज हुई 'राख' (Raakh) एक ऐसी सच्ची घटना पर आधारित है. जिसने 48 साल पहले न सिर्फ दिल्ली को बल्कि पूरे देश को हिला दिया था. अली फज़ल, सोनाली बेंद्रे, राकेश बेदी स्टारर इस सीरीज को दर्शकों का पॉजिटिव रेस्पॉन्स मिला है. प्रोसित रॉय के निर्देशन में बनी यह सीरीज 8 एपिसोड की है जो 12 जून को ओटीटी पर प्रीमियर हुई. 'राख' मशहूर 'रंगा बिला' मामले का नाटकीय रूपांतरण है लेकिन रियलिटी से कहीं अधिक खौफनाक और भयानक दिखाया गया है.
26 अगस्त 1978 की वो शाम दिल्ली के इतिहास की सबसे खौफनाक रातों में से एक बनने वाली थी, इसका अंदाजा किसी को नहीं था. जब दो होनहार भाई-बहन16 साल की गीता चोपड़ा और 14 साल का संजय चोपड़ा धौला कुआं स्थित अपने घर से ऑल इंडिया रेडियो स्टेशन के लिए निकले थे. गीता को एक म्यूजिकल प्रोग्राम में हिस्सा लेना था और संजय अपनी बहन का साथ देने के लिए साथ गया था. बाहर मूसलाधार बारिश हो रही थी, सड़कें सूनी थी. समय पर पहुंचने की जल्दी में दोनों बच्चों ने सड़क पर एक फिएट कार को रुकवाया और लिफ्ट मांग ली.
खौफनाक वारदात से अनजान थे मासूम
उन्हें नहीं पता था कि जिस कार का दरवाजा उन्होंने खोला है, वह साक्षात मौत का वाहन है. कार में सवार थे दो शातिर अपराधी कुलजीत सिंह उर्फ रंगा और जसबीर सिंह उर्फ बिल्ला. यह एक ऐसी खौफनाक वारदात की शुरुआत थी, जिसने न सिर्फ तत्कालीन मोरारजी देसाई सरकार की कानून-व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े किए, बल्कि भारतीय समाज को भी भीतर तक झकझोर कर रख दिया. आज इतने दशकों बाद, ओटीटी प्लेटफॉर्म अमेज़न प्राइम वीडियो पर रिलीज हुई हालिया वेब सीरीज 'राख' के जरिए यह डरावना अतीत एक बार फिर चर्चा में आ गया है.
रेडियो पर आवाज सुनने का इंतजार करता रहा परिवार
नौसेना अधिकारी कैप्टन मदन मोहन चोपड़ा का परिवार उस शाम रेडियो के पास बैठकर गीता की आवाज सुनने का इंतजार कर रहा था. लेकिन जब तय वक्त पर गीता का कार्यक्रम प्रसारित नहीं हुआ, तो कैप्टन चोपड़ा को किसी अनहोनी का अंदेशा हुआ. वे तुरंत अपनी कार से रेडियो स्टेशन पहुंचे, जहां उन्हें पता चला कि बच्चे तो वहां पहुंचे ही नहीं थे. इसके बाद दिल्ली पुलिस हरकत में आई और देश के इतिहास का सबसे बड़ा तलाशी अभियान शुरू हुआ. पुलिस को शुरुआती सुराग धौला कुआं के पास मिले, जहां कुछ चश्मदीदों ने एक फिएट कार के भीतर बच्चों के चीखने-चिल्लाने और हाथापाई होने की बात कही थी.
दो बच्चों की बेमिसाल बहादुरी और रंगा-बिल्ला की हैवानियत
पुलिस की तफ्तीश में जो बातें सामने आईं, वे किसी के भी रोंगटे खड़े करने के लिए काफी थी. रंगा और बिल्ला पिछले दो हफ्तों से पुलिस की नजरों से फरार चल रहे थे और उन्होंने वह फिएट कार भी चुराई हुई थी. जब उन्होंने गीता और संजय का अपहरण किया, तो दोनों बच्चों ने हार नहीं मानी. 14 साल का संजय चोपड़ा एक बॉक्सर था. उसने अपनी आखिरी सांस तक उन दोनों नरपिशाचों का मुकाबला किया. पुलिस रिपोर्ट के मुताबिक, संजय के शरीर पर चाकू के 25 से ज्यादा वार किए गए थे, जो यह साबित करते हैं कि उसने अंत तक हार नहीं मानी. वहीं गीता ने भी अपनी अस्मत और जान बचाने के लिए अपराधियों से जमकर लोहा लिया. इस भयंकर हाथापाई में रंगा और बिल्ला भी बुरी तरह घायल हो गए थे और उन्हें इलाज के लिए एक नजदीकी अस्पताल जाना पड़ा. यही अस्पताल का सुराग बाद में पुलिस के लिए सबसे अहम कड़ी साबित हुआ. जब पुलिस को दो-तीन दिनों बाद दोनों भाई-बहनों के शव मिले, तो वे इस हद तक सड़ चुके थे कि शुरुआती दौर में यह भी साफ नहीं हो पाया कि हत्या से पहले गीता के साथ किस हद तक दरिंदगी की गई थी.
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कालका मेल से गिरफ्तारी और तिहाड़ में 'ब्लैक वारंट'
इस खौफनाक हत्याकांड के बाद पूरे देश में रंगा और बिल्ला के खिलाफ आक्रोश की लहर दौड़ गई थी. संसद से लेकर सड़क तक सिर्फ एक ही मांग थी, दोनों का खात्मा. दिल्ली पुलिस की कई टीमें देश भर में छापेमारी कर रही थी. आखिरकार, लांस नायक गुरतेज सिंह और एवी शेट्टी नामक दो जांबाज कर्मियों की सूझबूझ से दोनों अपराधियों का पता चला. वे दोनों कालका मेल ट्रेन के जरिए दिल्ली वापस आने की फिराक में थे. पुलिस ने घेराबंदी करके उन्हें ट्रेन से ही दबोच लिया. उन्हें तिहाड़ जेल के हाई-सिक्योरिटी सेल में रखा गया, जहां मशहूर जेलर सुनील गुप्ता की निगरानी में उन्हें रखा गया था.
31 जनवरी 1982 इंसाफ की वो सुबह
अदालत में यह मामला 'रेयरेस्ट ऑफ रेयर' माना गया. अपहरण, बेरहमी से हत्या और डकैती के आरोपों के तहत अदालत ने दोनों को मौत की सजा सुनाई. करीब साढ़े तीन साल तक चले कानूनी ड्रामे के बाद, 31 जनवरी 1982 को दिल्ली की तिहाड़ जेल में रंगा और बिल्ला को एक साथ फांसी के फंदे पर लटका दिया गया. तिहाड़ जेल के इसी दौर और इस मामले ने बाद में नेटफ्लिक्स की प्रसिद्ध सीरीज और किताब 'ब्लैक वारंट' को भी इंस्पायर्ड किया. इस दुखद घटना ने भारतीय व्यवस्था को इतना प्रभावित किया कि देश के बच्चों में वीरता और साहस को सम्मान देने के लिए भारत सरकार के राष्ट्रीय वीरता पुरस्कारों के तहत 'गीता चोपड़ा पुरस्कार' और 'संजय चोपड़ा पुरस्कार' की स्थापना की गई, जो आज भी हर साल गणतंत्र दिवस पर बहादुर बच्चों को दिए जाते हैं.
क्या है एक्टर बॉबी देओल से इसका कनेक्शन कनेक्शन
रंगा-बिल्ला मामले की भयावहता सिर्फ अखबारों के पन्नों तक सीमित नहीं थी, बल्कि इसका डर उस दौर के हर परिवार के दिल में बैठ गया था. साल 2025 में, बॉलीवुड के मशहूर एक्टर बॉबी देओल ने एक पॉडकास्ट में इस केस से जुड़ा एक ऐसा चौंकाने वाला खुलासा किया. बॉबी देओल ने बताया कि जब वे छठी कक्षा में पढ़ते थे, तब उनके एक बेहद करीबी स्कूली दोस्त का अपहरण इसी कुख्यात जोड़ी (रंगा और बिल्ला) ने कर लिया था. बॉबी ने उस दौर को याद करते हुए कहा, 'मेरा वह दोस्त शायद दुनिया का सबसे खुशकिस्मत इंसान था. हुआ यह कि अपहरण के बाद रंगा और बिल्ला के बीच पैसों या किसी बात को लेकर गलतफहमी हो गई. मेरा दोस्त उस वक्त रंगा के साथ था और पुलिस लगातार उनका पीछा कर रही थी. घबराहट में रंगा मेरे दोस्त को दिल्ली की एक पान की दुकान पर छोड़कर खुद भाग निकला. पान वाले ने बच्चे से उसका पता पूछा और उसे सुरक्षित घर पहुंचा दिया.'
धर्मेंद्र ने लगा दिया था 'कड़ा कर्फ्यू'
इस घटना के बाद जो हुआ, उसने देओल परिवार की रातों की नींद उड़ा दी थी. पूछताछ के दौरान अपराधियों ने बॉबी के दोस्त को डरा-धमकाकर उसके स्कूल के अन्य अमीर बच्चों के नाम उगलवाए थे, और उस बच्चे ने डर के मारे अनजाने में बॉबी देओल का नाम भी ले लिया था. जैसे ही यह बात बॉबी के पिता और बॉलीवुड के ही-मैन धर्मेंद्र को पता चली, उन्होंने तुरंत अपने बेटे की सुरक्षा को लेकर कड़े कदम उठाए. बॉबी ने बताया, 'उस दिन के बाद से मेरे पिता ने मेरा घर से बाहर निकलना पूरी तरह बंद कर दिया. मैं सिर्फ स्कूल जाता और सीधे घर आता. यहां तक कि मैंने साइकिल चलाना भी घर के लॉन के अंदर ही सीखा. जब मैं कॉलेज में था और मेरे दोस्त देर रात पार्टियां करते थे, तब भी मेरे लिए रात 9 बजे का सख्त कर्फ्यू लागू रहता था.'
ओटीटी पर 'राख' के जरिए दोबारा जिंदा हुआ अतीत
प्रोसीत रॉय द्वारा निर्देशित और हाल ही में 12 जून को ओटीटी पर स्ट्रीम हुई आठ एपिसोड की वेब सीरीज 'राख' इसी ऐतिहासिक और रोंगटे खड़े कर देने वाले मामले का एक सिनेमाई रूपांतरण है. हालांकि, कानूनी और संवेदनात्मक कारणों से सीरीज में पीड़ितों के नाम बदलकर सुमन और साहिल अरोड़ा किए गए हैं. इस सीरीज में कलाकारों की परफॉर्मेंस को क्रिटिक्स द्वारा काफी पसंद किया जा रहा है. अली फज़ल एक बेहद संजीदा और सख्त पुलिस अधिकारी की भूमिका में हैं, जो इस उलझे हुए केस की गुत्थी सुलझाता है. सोनाली बेंद्रे दोनों अभागे किशोरों की मां के किरदार में हैं, जिनका दर्द और न्याय के लिए संघर्ष स्क्रीन पर दर्शकों की आंखें नम कर देता है. आकाश मखीजा और रमनदीप यादव इन्होंने सीरीज में बिल्ला और रंगा के खौफनाक किरदारों को पर्दे पर बखूभी निभाया है. इसके अलावा दिव्या शर्मा, विवान शर्मा, अंशुल चौहान, राकेश बेदी और दिब्येंदु भट्टाचार्य जैसे मंझे हुए कलाकारों ने इस सीरीज के सस्पेंस और ड्रामा को एक अलग ऊंचाई दी है.




