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Lalita Pawar की 3 तीन दिन तक फ्लैट में सड़ती रही लाश, पति ने चलाया साली से चक्कर; कैसे एक ग्लैमर गर्ल से बनी वैंप क्वीन

70 साल से ज्यादा करियर और 700 से अधिक फिल्मों का रिकॉर्ड बनाने वाली ललिता पवार की जिंदगी संघर्ष, धोखे और दर्द से भरी रही. 'रामायण' की मंथरा से कुख्यात हुईं यह एक्ट्रेस अंत में अकेली दुनिया छोड़ गईं.

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( Image Source:  IMDB )
रूपाली राय
Edited By: रूपाली राय6 Mins Read

Updated on: 24 Feb 2026 6:00 AM IST

भारतीय सिनेमा की एक ऐसी एक्ट्रेस थीं जिन्होंने 70 साल से ज्यादा का करियर बनाया और 700 से अधिक फिल्मों में काम किया. शुरुआत में ग्लैमरस हीरोइन के रूप में फेमस हुईं, लेकिन एक हादसे ने उनकी जिंदगी बदल दी. फिल्म सेट पर एक थप्पड़ से चेहरा बिगड़ गया. जिससे वे नेगेटिव रोल्स की क्वीन बन गईं. 'रामायण' की मंथरा के किरदार से घर-घर में कुख्यात हुईं, लेकिन उनकी पर्सनल लाइफ दर्द और धोखे से भरी थी पति का बहन से अफेयर, कैंसर और अकेली मौत. यह अनकही कहानी है ललिता पवार (Lalita Pawar) की.

ललिता पवार का जन्म महाराष्ट्र के नासिक जिले के येवला कस्बे में हुआ था. उनका असली नाम अंबा लक्ष्मण राव शगुन था. उनका परिवार काफी संपन्न था पिता लक्ष्मण राव एक रेशम और कपास के व्यापारी थे जो उस दौर में धनी माने जाते थे. रोचक बात यह है कि उनकी मां जब गर्भवती थीं, तो वे अंबा मंदिर दर्शन करने गईं. वहीं प्रसव पीड़ा शुरू हुई और मंदिर के बाहर ही ललिता का जन्म हुआ. शायद इसी वजह से उनका नाम अंबा रखा गया, जो बाद में ललिता पवार के रूप में मशहूर हुआ.

कैसे शुरू हुई जर्नी?

बचपन से ही ललिता की जिंदगी सिनेमा से जुड़ गई. उस दौर में बाल कलाकारों की डिमांड थी, और महज 9 साल की उम्र में उन्होंने साइलेंट फिल्म 'राजा हरिश्चंद्र' (1928) से डेब्यू किया. यह फिल्म भले ही छोटी भूमिका वाली थी, लेकिन इसने उनके करियर की नींव रखी. 1930 के दशक में वे तेजी से उभरीं. साइलेंट एरा से टॉकीज तक का सफर तय करते हुए उन्होंने लीड रोल्स निभाए. फिल्म 'चतुर सुंदरी' (1930) में उन्होंने एक साथ 17 किरदार निभाए, जो उस समय की एक बड़ी उपलब्धि थी. 'दैवी खजाना' (1933) में उनकी खूबसूरती की खूब तारीफ हुई वे बोल्ड फोटोशूट कराती थीं और ग्लैमरस इमेज के लिए जानी जाती थीं. उस दौर में महिलाओं का फिल्म इंडस्ट्री में आना आसान नहीं था, लेकिन ललिता के परिवार ने उनका साथ दिया. वे न सिर्फ एक्टिंग करती थीं, बल्कि प्रोडक्शन में भी हाथ आजमाती थीं. उनकी शुरुआती फिल्में माराठी और हिंदी दोनों में थीं, और वे जल्दी ही स्टार बन गईं.

एक हादसे ने बनाया वैंप क्वीन

लेकिन किस्मत का खेल देखिए 1942 में एक हादसा उनकी जिंदगी का टर्निंग पॉइंट बन गया. वे फिल्म 'जंग-ए-आजादी' की शूटिंग कर रही थीं. को-एक्टर मास्टर भगवान उर्फ भगवान दादा को एक सीन में उन्हें थप्पड़ मारना था. भगवान दादा नए एक्टर थे और उन्होंने गलती से बहुत जोर से थप्पड़ जड़ दिया. ललिता बेहोश हो गईं, उनके कान से खून बहने लगा. डॉक्टरों ने जांच की तो पता चला कि आंख के पास की नस फट गई थी, जिससे फेशियल पैरालिसिस हो गया. बाईं आंख हमेशा के लिए खराब हो गई एक स्क्विंट (तिरछी नजर) पड़ गई, और चेहरा टेढ़ा हो गया. इलाज के दौरान गलत दवाओं से स्थिति और बिगड़ी, और उनका दायां हिस्सा पैरालाइज्ड हो गया. वे तीन साल तक बिस्तर पर रहीं, डॉक्टरों के चक्कर काटती रहीं. इस हादसे ने उनकी लीड रोल्स वाली करियर खत्म कर दी. इंडस्ट्री ने उन्हें रिजेक्ट कर दिया कोई हीरोइन का रोल नहीं मिला. ललिता ने बाद में एक इंटरव्यू में कहा था, 'मेरा लीडिंग लेडी का करियर अचानक खत्म हो गया.'

रामायण की मंथरा ने बन जीता दिल

इस सदमे से उबरना आसान नहीं था, लेकिन ललिता पवार की हिम्मत कमाल की थी. उन्होंने हार नहीं मानी और नेगेटिव रोल्स में ट्रांजिशन किया. 1952 में वी. शांताराम की फिल्म 'दहेज' से उन्होंने कमबैक किया. जहां उन्होंने सास का नेगेटिव रोल निभाया. यह रोल इतना पॉपुलर हुआ कि वे इसी तरह के किरदारों की पहली पसंद बन गईं. वह 'श्री 420' (1955) में राज कपूर की मां का रोल, 'आनंद' (1971) में मकान मालकिन, 'सौ दिन सास के' में सास जैसी फिल्मों से 1950-60 के दशक में वह बॉलीवुड की 'वैंप' क्वीन बन गईं. उन्होंने सैकड़ों फिल्मों में यादगार परफॉर्मेंस दीं. उनकी आंखों की तिरछी नजर ने उनके नेगेटिव किरदारों को और डरावना बना दिया. रामानंद सागर के 'रामायण' (1987) में मंथरा का किरदार निभाकर वे घर-घर में मशहूर हो गईं बच्चे उन्हें देखकर डरते थे, लेकिन असल में वे बहुत सॉफ्ट स्पोकन थीं. कुल मिलाकर उन्होंने 700 से ज्यादा फिल्मों में काम किया, जो गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड में सबसे लंबा एक्टिंग करियर है. 1961 में वह पद्मश्री से सम्मानित रही.

दर्दनाक अंत समय

पर्सनल लाइफ की बात करें तो यहां भी दर्द की कमी नहीं थी. उनकी पहली शादी प्रोड्यूसर गणपतराव पवार से हुई. लेकिन यह रिश्ता ज्यादा नहीं चला. सबसे दर्दनाक बात यह थी कि उनके पति का अफेयर उनकी छोटी बहन से चल रहा था. बाद में पति ने बहन से ही शादी कर ली, यानी ललिता की बहन उनकी सौतन बन गई. यह घरेलू धोखा उनके लिए बहुत बड़ा झटका था. तलाक के बाद उन्होंने दूसरी शादी फिल्ममेकर राजकुमार गुप्ता से की। इस शादी से उनका एक बेटा हुआ जय पवार, जो खुद प्रोड्यूसर बने. लेकिन आखिरी सालों में ललिता को माउथ कैंसर हो गया. वे मजाक में कहती थीं, 'मैंने इतने नेगेटिव रोल किए कि लोग मुझे शाप देते होंगे, इसलिए कैंसर हुआ.' 24 फरवरी 1998 को पुणे में उनका निधन हो गया. सबसे ट्रेजिक बात यह है कि वह अपने अंत समय में घर में अकेली थी. उनके पति राजप्रकश गुप्ता अपने गले की सर्जरी के लिए शहर से बाहर थे और बेटा भी बाहर था. जय ने मां ललिता को कई फोन किए 2 दिन तक कोई जवाब न मिलने पर उन्होंने पड़ोसियों को फोन लगाया और घर का हालचाल लेने को कहा तो जोरदार दुर्गंध आने की खबर पुलिस को दी गई. उनकी लाश तीन दिन तक घर में पड़ी रही.

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