'पैलेट गन लिमिटेड डैमेज से लेकर पठानों से कहना', क्यों विवादों में अजय देवगन की Chauhaan, कश्मीर में नाराजगी तो क्षत्रिय भी खफा
जय देवगन की फिल्म 'Chauhaan' का टाइटल अनाउंसमेंट रिलीज होते ही विवादों में घिर गया है. पैलेट गन को लेकर बोले गए डायलॉग और "पठानों से कहना, चौहान आ रहा है" जैसी लाइन पर कश्मीर के कई संगठनों के साथ-साथ क्षत्रिय समाज के कुछ लोगों ने भी आपत्ति जताई है.
क्यों विवादों में अजय देवगन की फिल्म Chauhaan
अजय देवगन की आने वाली फिल्म ‘Chauhaan’ का टाइटल अनाउंसमेंट रिलीज होते ही सोशल मीडिया से लेकर कश्मीर तक बहस छिड़ गई है. वीडियो में एक पैलेट गन से घायल युवक का सीन दिखाया गया है और बैकग्राउंड में ऐसा डायलॉग सुनाई देता है, जिसमें पैलेट गन को “लिमिटेड डैमेज” यानी सीमित नुकसान करने वाला बताया गया है. इस एक लाइन ने कई लोगों को नाराज कर दिया है, खासकर उन लोगों को जिन्होंने कश्मीर में पैलेट गन की घटनाओं का दर्द करीब से देखा है.
यह विवाद यहीं नहीं रुका. टीजर में “पठानों से कहना, चौहान आ रहा है” जैसे डायलॉग पर भी सवाल उठने लगे हैं. कश्मीर के कई सामाजिक संगठनों और नेताओं ने इसे संवेदनशील मुद्दों को गलत तरीके से दिखाने वाला बताया है, वहीं क्षत्रिय समाज के कुछ लोगों का कहना है कि “चौहान” नाम और पहचान का इस्तेमाल जिस तरह किया गया है, उससे गलत मैसेज जा सकता है. ऐसे में फिल्म रिलीज से पहले ही चर्चा और विवाद दोनों बढ़ गए हैं.
'लिमिटेड डैमेज' वाले डायलॉग पर क्यों मचा बवाल?
टाइटल अनाउंसमेंट में अजय देवगन की आवाज सुनाई देती है, जिसमें वह कहते हैं "पैलेट गन लिमिटेड डैमेज करती है." और इसके साथ तुरंत ही शॉट में एक ऐसा लड़का दिखाया गया है, जिसकी आंखें पैलेट से घायल हुई हैं. इसी डायलॉग पर कश्मीर में सबसे ज्यादा नाराजगी देखने को मिल रही है. स्थानीय लोगों और सामाजिक संगठनों का कहना है कि जिन लोगों ने पैलेट गन का दर्द झेला है, उनके लिए यह किसी भी तरह "सीमित नुकसान" नहीं था. कई लोगों की आंखों की रोशनी चली गई और हजारों परिवार आज भी उस दर्द से उबर नहीं पाए हैं.
कश्मीर के नेताओं और सामाजिक संगठनों की आपत्ति
नेशनल कॉन्फ्रेंस के प्रवक्ता इमरान नबी डार ने टीजर को "प्रचार का माध्यम" बताते हुए इसे हटाने की मांग की है. उनका कहना है कि यह टीजर पुराने जख्मों को फिर से हरा करता है और हिंसा को बढ़ावा देने वाला मैसेज देता है. वहीं 'सेव यूथ सेव फ्यूचर' संगठन के प्रमुख वजाहत फारूक भट ने भी फिल्म निर्माताओं से अपील की कि कश्मीर को सिर्फ हिंसा और बंदूक की कहानियों तक सीमित न रखें. उनके मुताबिक, घाटी की असली कहानी संघर्ष से आगे बढ़कर लोगों की उम्मीदों, पुनर्निर्माण और सामान्य जीवन की भी है.
'पठानों से कहना' डायलॉग पर क्षत्रिय क्यों खफा?
विवाद केवल कश्मीर तक सीमित नहीं रहा. क्षत्रिय परिषद के को-फाउंडर अभिषेक आनंद ने भी फिल्म के डायलॉग पर सवाल उठाए हैं. उनका कहना है कि' जो फ़िल्म बनी है, वह पत्थरबाज़ी की एक घटना पर आधारित है, लेकिन इसमें इस्तेमाल किए गए डायलॉग चौहान पहचान को अपनाते हुए और दो समुदायों को एक-दूसरे के ख़िलाफ़ खड़ा करने के लिए इस्तेमाल किए जा रहे हैं. अगर आप इस तरह से पठानों से जुड़ा कोई टकराव दिखाना चाहते थे, तो सबसे पहली बात यह है कि पठान मुख्य रूप से अफ़ग़ानिस्तान के हैं, न कि कश्मीर के. और अगर किसी ऐतिहासिक संदर्भ की ज़रूरत थी, तो राजा मान सिंह का इस्तेमाल किया जाना चाहिए था, क्योंकि उनका झंडा बहुरंगी था, और उस प्रतीक को सही ढंग से दिखाया जा सकता था.'
सोशल मीडिया पर भी बंटी राय
टाइटल अनाउंसमेंट रिलीज होने के बाद सोशल मीडिया पर भी लोगों की राय बंटी हुई है. कुछ दर्शक इसे फिल्म की कहानी का हिस्सा मान रहे हैं, जबकि कई यूजर्स इसे कश्मीर के संवेदनशील मुद्दों को हल्के अंदाज में पेश करने और हिंसा को महिमामंडित करने वाला बता रहे हैं. फिल्म अभी रिलीज भी नहीं हुई है, लेकिन उसके टीजर ने राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक बहस छेड़ दी है.




