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Budget 2026: क्या ऑटो इंडस्ट्री के लिए ‘नेक्स्ट गियर’ साबित होगा निर्मला सीतारमण का बजट?

भारत की ऑटो इंडस्ट्री में सुधार के संकेत हैं, लेकिन रिकवरी अभी असमान बनी हुई है. Budget 2026 से उम्मीद है कि वह अफोर्डेबिलिटी, EV ट्रांजिशन और मास-मार्केट डिमांड को नई रफ्तार देगा.

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( Image Source:  Sora AI )
प्रवीण सिंह
Edited By: प्रवीण सिंह

Published on: 21 Jan 2026 11:33 PM

Budget 2026: भारत का ऑटोमोबाइल सेक्टर पिछले कुछ वर्षों से जिस अस्थिरता से गुजर रहा था, उसमें सितंबर 2025 के बाद से कुछ हद तक स्थिरता लौटती दिखी. लंबे समय से लंबित GST रीसेट ने टैक्स से जुड़ी कई विसंगतियों को दूर किया, त्योहारी सीजन की मांग ने ग्राहकों को फिर से शोरूम तक खींचा और साल के अंत तक बिक्री में सुधार ने कंपनियों को राहत की सांस दी.

करीब भारत के GDP में 7% योगदान देने वाला और मैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम की रीढ़ माने जाने वाले इस सेक्टर के लिए यह राहत अहम थी. लेकिन बड़ा सवाल अब भी कायम है - क्या यह रिकवरी पर्याप्त है?

जैसे-जैसे कैलेंडर ईयर 2026 की शुरुआत और वित्त वर्ष के अंतिम तिमाही की ओर बढ़ रहे हैं, वैसे-वैसे निगाहें Union Budget 2026-27 पर टिक गई हैं, जिसे वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण 1 फरवरी को पेश करेंगी. अब चर्चा केवल स्ट्रक्चरल रिफॉर्म्स तक सीमित नहीं रह गई है. ऑटो इंडस्ट्री के विशेषज्ञ मानते हैं कि बजट 2026 का असली टेस्ट यह होगा कि क्या सरकार मांग को स्थिर कर पाएगी, बढ़ती लागत के दबाव को कम करेगी और उन सेगमेंट्स में भरोसा लौटाएगी जो अब भी पूरी तरह उबर नहीं पाए हैं.

रिकवरी है, लेकिन असमान

SIAM और FADA के आंकड़े बताते हैं कि FY25 और FY26 की शुरुआत में कुल वॉल्यूम्स में सुधार जरूर हुआ है, लेकिन यह रिकवरी समान नहीं है. प्रीमियम पैसेंजर व्हीकल्स की मांग मजबूत बनी हुई है लेकिन एंट्री-लेवल कार्स और टू-व्हीलर सेगमेंट अभी भी संघर्ष कर रहे हैं. हालांकि FADA डेटा यह भी दिखाता है कि ग्रामीण इलाकों में पैसेंजर व्हीकल ग्रोथ मजबूत रही है, जिससे यह संकेत मिलता है कि मांग का विस्तार अब अंडर-पेनेट्रेटेड मार्केट्स तक पहुंच रहा है.

दूसरी ओर, OEMs ने सेफ्टी फीचर्स, टेक्नोलॉजी और रेगुलेटरी कंप्लायंस को बेस वेरिएंट्स तक में शामिल किया है. यह बदलाव जरूरी तो है, लेकिन इसका सीधा असर वाहनों की कीमतों पर पड़ा है, जिससे आम उपभोक्ता की जेब पर दबाव बढ़ा है.

अफोर्डेबिलिटी सबसे बड़ी चुनौती

भारत में वाहन स्वामित्व अब भी बेहद कम है. Kotak Securities की रिपोर्ट के अनुसार भारत में हर 1,000 लोगों पर सिर्फ 26 कारें हैं जबकि चीन में यह संख्या 183 और अमेरिका में लगभग 600 है. विशेषज्ञ मानते हैं कि यही गैप भारत के लिए सबसे बड़ा लॉन्ग-टर्म अवसर है - लेकिन शर्त यह है कि मास-मार्केट डिमांड को दोबारा मजबूत किया जाए. बजट से जुड़ी ऐसी नीतियां जो शुरुआती लागत कम करें, फाइनेंसिंग आसान बनाएं और रनिंग कॉस्ट घटाएं - एंट्री-लेवल सेगमेंट में संतुलन वापस ला सकती हैं.

EY इंडिया के टैक्स पार्टनर सौरभ अग्रवाल कहते हैं कि टू-व्हीलर और थ्री-व्हीलर सेगमेंट में मांग को टिकाऊ बनाए रखने के लिए PM E-DRIVE जैसी योजनाओं को मार्च 2026 के बाद भी बढ़ाया जाना चाहिए. साथ ही ग्रामीण क्षेत्रों को ध्यान में रखते हुए इंटरेस्ट सबवेंशन स्कीम्स लाई जा सकती हैं.

हाइब्रिड और EV: नीति की जरूरत

KPMG इंडिया के पार्टनर वामन पारखी के मुताबिक, मजबूत हाइब्रिड वाहनों को स्पष्ट पॉलिसी सपोर्ट की जरूरत है. GST में रियायत, बैटरी, सेमीकंडक्टर, ट्रांसमिशन किट्स और CKD किट्स पर ड्यूटी रेशनलाइजेशन- अगर लोकलाइजेशन से जोड़ा जाए - तो OEMs की लागत कम हो सकती है.

EVs से उम्मीद थी कि वे स्लोडाउन को बैलेंस करेंगे, लेकिन FADA डेटा बताता है कि खासकर इलेक्ट्रिक टू-व्हीलर सेगमेंट में ग्रोथ अब धीमी हो रही है.

Motovolt Mobility के CEO तुषार चौधरी मानते हैं कि बजट 2026 EV सेक्टर के लिए निर्णायक हो सकता है. वे कहते हैं कि फर्स्ट-टाइम EV खरीदारों के लिए आसान फाइनेंस, गिग वर्कर्स और ग्रामीण उपभोक्ताओं के लिए सब्सिडाइज्ड क्रेडिट और घरेलू स्टार्टअप्स के लिए टार्गेटेड ग्रांट EV अपनाने की रफ्तार बढ़ा सकते हैं.

चार्जिंग और बैटरी लागत पर फोकस जरूरी

Deloitte इंडिया की ऑटो सेक्टर पार्टनर शीना सरीन के मुताबिक, बैटरियों पर इंपोर्ट ड्यूटी कम करना, चार्जिंग सर्विसेज पर 18% GST घटाना और EV ओनरशिप को ज्यादा आकर्षक बना सकता है. वह यह भी कहती हैं कि मास-मार्केट पैसेंजर व्हीकल्स और टू-व्हीलर सेगमेंट के लिए तेज अप्रूवल प्रोसेस और समयबद्ध PLI इंसेंटिव डिस्बर्सल बेहद जरूरी है.

स्क्रैपेज स्कीम: अभी अधूरी कहानी

व्हीकल स्क्रैपेज स्कीम अब तक उम्मीदों पर खरी नहीं उतरी है. सरीन का सुझाव है कि 4-6% के मौजूदा इंसेंटिव को बढ़ाया जाए और रोड टैक्स पर ज्यादा छूट दी जाए, ताकि उपभोक्ता को वास्तविक फायदा दिखे. पारखी का मानना है कि स्क्रैपेज सर्टिफिकेट को GST क्रेडिट या रिबेट से जोड़ना चाहिए, ताकि इसका असर ठोस और मापने योग्य हो.

PLI, कैपेक्स और सप्लाई चेन की चुनौती

FY25 में भारत ने 3.1 करोड़ से ज्यादा वाहन बनाए और निर्यात 19% बढ़कर 5.3 मिलियन यूनिट्स से ऊपर पहुंचा. फिर भी कई EV, हाइब्रिड और बैटरी प्रोजेक्ट्स फिलहाल रुके हुए हैं. सरीन कहती हैं कि ACC बैटरी PLI स्कीम में सख्त शर्तों की वजह से कम कंपनियां शामिल हो पाईं. नए वर्जन में छोटे और मिड-साइज प्लेयर्स के लिए एंट्री बैरियर कम किया जाना चाहिए.

CAFE नॉर्म्स और आगे की राह

आने वाले CAFE Phase III norms इंडस्ट्री के लिए बड़ी चुनौती हैं. EY के अग्रवाल कहते हैं कि EV वेट, बैटरी और फ्यूल एफिशिएंसी को लेकर इंडस्ट्री से गहन सलाह जरूरी है. Deloitte की सरीन का सुझाव है कि CAFE कंप्लायंस को दंडात्मक नहीं, बल्कि फिस्कली सपोर्टिव बनाया जाए - जैसे GST क्रेडिट, रिफंड या तेज डिप्रिसिएशन.

बजट 2026 क्यों अहम है

ऑटो इंडस्ट्री मानती है कि अब सिर्फ टैक्स सुधार काफी नहीं हैं. Budget 2026 वह मोड़ हो सकता है, जहां से भारत का ऑटो सेक्टर सचमुच ‘नेक्स्ट गियर’ में शिफ्ट करे. अगर यह बजट अफोर्डेबिलिटी, EV ट्रांजिशन, सप्लाई चेन और मास-मार्केट डिमांड पर सही फोकस करता है, तो भारत की ऑटो इंडस्ट्री सिर्फ रिकवर ही नहीं करेगी, बल्कि अगले दशक की ग्रोथ स्टोरी की अगुआ भी बन सकती है.

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