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Ground Zero: चीनी@75! कीमत आसमान छूने को बेताब, कब तक सस्ती रहेगी आपकी चाय?

चीनी के दाम 62-65 रुपये किलो तक पहुंच गए हैं और कारोबारियों ने 75 रुपये तक जाने का अनुमान जताया है. जानिए Sugar Price Hike, Ethanol और Festival Demand का असर.

Ground Zero: चीनी@75! कीमत आसमान छूने को बेताब, कब तक सस्ती रहेगी आपकी चाय?
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जरा सोचिए, सुबह की चाय का वही एक चम्मच चीनी अब आपकी जेब पर भारी पड़ने लगे तो क्या होगा? चीनी के दाम जिस रफ्तार से बढ़ रहे हैं, उससे आने वाले दिनों में 75 रुपये किलो का आंकड़ा दूर नहीं दिख रहा. कुछ ही दिनों में चीनी की खुदरा कीमत 42 से 45 रुपये से बढ़कर कई बाजारों में 62 से 65 रुपये किलो तक कारोबारी चीनी बेचने की बात कही. यानी 10 दिनों के अंदर प्रति किलोग्राम चीनी 20 रुपये तक की बढ़ोतरी हुई है. ऊपर से त्योहारी सीजन में मिठाई और खाद्य पदार्थों की मांग बढ़ने वाली है. ऐसे में सवाल सिर्फ चाय की मिठास का नहीं, बल्कि आम आदमी के पूरे घरेलू बजट पर पड़ने वाले नए महंगाई के झटके का है.

दरअसल, त्योहारी सीजन शुरू होने से पहले ही चीनी की कीमतों ने आम आदमी की चिंता बढ़ा दी है. बाजार में जहां कुछ दिन पहले तक खुदरा चीनी करीब 42 से 45 रुपये प्रति किलोग्राम के आसपास मिलने की बात कारोबारियों ने बताई थी, वहीं गुरुवार को चीनी 62 से 65 रुपये प्रति किलोग्राम तक बिकने लगी है. अब दुकानदारों और थोक विक्रेताओं का अनुमान है कि अगर सप्लाई का दबाव और त्योहारी मांग इसी तरह बनी रही तो कीमत 75 रुपये प्रति किलो तक जा सकती है. हालांकि, यह आंकड़ा फिलहाल कारोबारियों का अनुमान है, कोई तय सरकारी कीमत नहीं. लेकिन सवाल बड़ा है- आखिर चीनी के दाम इतनी तेजी से क्यों बढ़े और क्या आने वाले दिनों में आम आदमी को राहत मिलेगी?

चीनी की कीमत अचानक इतनी तेजी से क्यों बढ़ी?

चीनी की मौजूदा तेजी के पीछे एक नहीं, बल्कि सप्लाई, मौसम, स्टॉक, त्योहारी मांग और इथेनॉल जैसे कई कारण एक साथ काम कर रहे हैं. ICRA के मुताबिक 2026 शुगर सीजन में सकल उत्पादन का अनुमान 31.10 मिलियन टन था, लेकिन इथेनॉल के लिए करीब 3.1 मिलियन टन चीनी के बराबर मात्रा डायवर्ट होने के बाद शुद्ध उत्पादन करीब 28 मिलियन टन रहने का अनुमान लगाया गया था. घरेलू खपत करीब 28.3 मिलियन टन और पहले से हो चुके निर्यात के बाद सितंबर तक क्लोजिंग स्टॉक करीब 4.3 मिलियन टन, यानी लगभग दो महीने की खपत के बराबर रहने का अनुमान था. इसका मतलब है कि बाजार में उपलब्धता पहले के मुकाबले ज्यादा आरामदायक नहीं है.

क्या इथेनॉल चीनी महंगी होने की असली वजह है?

इथेनॉल एक महत्वपूर्ण वजह है, लेकिन अकेली वजह नहीं. मौजूदा शुगर सीजन में करीब 30 से 31 लाख टन चीनी के बराबर उत्पादन इथेनॉल की तरफ जाने से घरेलू बाजार में उपलब्ध चीनी कम हुई है. मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक सरकार अगले सीजन में गन्ने को सीधे इथेनॉल बनाने में इस्तेमाल करने की मात्रा सीमित करने पर विचार कर रही है. ताकि ज्यादा गन्ना चीनी उत्पादन के लिए उपलब्ध रहे.

यहां पूरा गणित समझना जरूरी है. अगर एक ही गन्ने से चीनी और इथेनॉल दोनों में से किसी एक का उत्पादन बढ़ाना हो और गन्ने का एक हिस्सा इथेनॉल की ओर चला जाए, तो बाकी परिस्थितियां समान रहने पर चीनी की उपलब्धता घट सकती है. लेकिन मौजूदा कीमतों को सिर्फ इसी वजह से समझना गलत होगा. कमजोर सप्लाई, मौसम का असर, कम होता स्टॉक और त्योहारों की बढ़ती मांग भी चीनी की कीमत को बढ़ा रहे हैं.

Credit: State Mirror

महाराष्ट्र-कर्नाटक की बारिश ने कितना असर डाला?

चीनी उत्पादन में महाराष्ट्र और कर्नाटक की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है. न्यू कोंडली मेन बाजार स्थित चीनी के थोक के विक्रेता संजय बंसल के अनुसार प्रमुख गन्ना उत्पादक राज्यों में कम बारिश ने अगली फसल के उत्पादन को लेकर चिंता बढ़ाई है. यदि गन्ने की पैदावार कम होती है तो आने वाले शुगर सीजन में मिलों को पर्याप्त कच्चा माल मिलने पर दबाव आ सकता है. यही भविष्य की सप्लाई को लेकर बाजार में चिंता पैदा करता है.

यानी आज की कीमत केवल आज की चीनी की उपलब्धता से तय नहीं हो रही. कारोबारी आने वाले महीनों की सप्लाई को भी कीमत में शामिल कर रहे हैं. अगर उन्हें लगता है कि अगली फसल कमजोर हो सकती है, तो वे कम स्टॉक रखने के बजाय ऊंची कीमत पर खरीदारी कर सकते हैं और इससे बाजार में तेजी और बढ़ सकती है.

त्योहारों से चीनी की मांग कितनी बढ़ सकती है?

अगस्त से नवंबर तक भारत में त्योहारों का लंबा दौर चलता है. गणेश चतुर्थी, नवरात्रि, दशहरा और दिवाली जैसे त्योहारों में मिठाई, बेकरी और दूसरे खाद्य उत्पादों की मांग बढ़ती है. इन सभी में चीनी की खपत होती है. सरकार ने भी स्टॉक सीमा को सख्त करने का फैसला अगस्त-नवंबर के त्योहारी सीजन में बढ़ने वाली मांग को ध्यान में रखते हुए किया है.

यही वजह है कि बाजार में इस समय सामान्य दिनों की तुलना में मांग का दबाव ज्यादा है. अगर उसी समय सप्लाई सीमित हो, तो कीमत पर तेजी का असर स्वाभाविक रूप से ज्यादा दिखाई देता है.

दुकानदार 75 रुपये किलो का अनुमान क्यों लगा रहे हैं?

दुकानदारों और थोक विक्रेताओं का 75 रुपये का अनुमान मुख्य रूप से बढ़ती लागत और आगे की सप्लाई को लेकर चिंता पर आधारित है. उनका तर्क है कि अगर चीनी मिलें ऊंची कीमत पर डिस्ट्रीब्यूटर्स को चीनी देंगी, तो डिस्ट्रीब्यूटर भी थोक कारोबारी को कम कीमत पर माल नहीं दे सकता. इसके बाद थोक व्यापारी अपनी लागत, परिवहन और मार्जिन जोड़कर स्थानीय दुकानदार को माल देगा और अंत में उपभोक्ता तक कीमत और बढ़ सकती है.

यानी अगर सप्लाई चेन के शुरुआती स्तर पर ही कीमत 5-10 रुपये किलो बढ़ती है तो उसका पूरा बोझ नीचे आते-आते खुदरा कीमत में दिखाई दे सकता है. 75 रुपये का अनुमान इसी बढ़ती हुई सप्लाई-चेन लागत और त्योहारी मांग के संभावित दबाव का कारोबारी आकलन है, न कि सरकार द्वारा घोषित कीमत.

क्या जमाखोरी भी कीमत बढ़ने की वजह है?

यह भी एक संभावित कारक है. जब बाजार में कीमत बढ़ने की उम्मीद होती है तो बड़े कारोबारी ज्यादा स्टॉक रखने की कोशिश कर सकते हैं. इससे तत्काल बाजार में उपलब्ध माल कम दिखाई दे सकता है और कीमत पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है. सरकार ने इसी चिंता को देखते हुए स्टॉक रखने की सीमा कड़ी की है.

चीनी के कारोबारी राजकुमार के मुताबिक 1 सितंबर से 30 नवंबर 2026 तक 10 मीट्रिक टन से ज्यादा चीनी महीने में इस्तेमाल करने वाले थोक उपभोक्ताओं को अधिकतम 15 दिन की जरूरत के बराबर स्टॉक रखने की अनुमति होगी. इससे पहले डीलरों के लिए 30 दिन की स्टॉक सीमा लागू की गई थी.

सरकार चीनी के दाम रोकने के लिए क्या कर रही है?

कीमतों में तेजी को देखते हुए सरकार ने स्टॉक नियंत्रण के अलावा सीमित शुल्क-मुक्त चीनी आयात जैसे विकल्प पर भी विचार किया है. सरकार घरेलू सप्लाई बढ़ाने और रिकॉर्ड कीमतों को नियंत्रित करने के लिए सीमित मात्रा में ड्यूटी-फ्री आयात की संभावना देख रही है.

अगर विदेश से चीनी आती है तो घरेलू बाजार में उपलब्धता बढ़ सकती है. इसका सीधा असर सप्लाई की कमी पर पड़ेगा और कीमतों में तेजी को रोकने में मदद मिल सकती है. लेकिन आयात का फैसला अंतरराष्ट्रीय कीमत, घरेलू उत्पादन और किसानों-मिलों के हितों को ध्यान में रखकर करना होगा.

इथेनॉल नीति में बदलाव से चीनी सस्ती होगी?

अगर सरकार अगले सीजन में गन्ने को इथेनॉल के लिए डायवर्ट करने की मात्रा कम करती है तो अतिरिक्त गन्ना चीनी बनाने में इस्तेमाल हो सकता है. Reuters के मुताबिक सरकार ऐसा विकल्प देख रही है और इथेनॉल उत्पादन में कॉर्न और चावल जैसे दूसरे फीडस्टॉक का इस्तेमाल बढ़ाने की संभावना पर भी विचार कर सकती है.

लेकिन इसका फायदा तुरंत खुदरा बाजार में दिखाई देगा, ऐसा जरूरी नहीं है. चीनी मिलों में नया उत्पादन शुरू होने, चीनी बाजार में आने और सप्लाई चेन से होते हुए खुदरा दुकानों तक पहुंचने में समय लगता है.

Credit: State Mirror

आखिर चीनी के दाम कब तक नीचे आ सकते हैं?

चीनी के कारोबारी प्रदीप के मुताबिक राहत तुरंत आने की गारंटी नहीं है. अल्प अवधि में त्योहारी मांग बनी रहने के कारण कीमतों पर दबाव रह सकता है. अगर सरकार के स्टॉक नियंत्रण से बाजार में अतिरिक्त स्टॉक निकलता है या आयात को मंजूरी मिलती है तो आने वाले हफ्तों में तेजी कुछ कम हो सकती है. वहीं अगर सरकार इथेनॉल डायवर्जन को सीमित करती है तो उसका ज्यादा असर अगले शुगर सीजन की सप्लाई पर पड़ेगा.

फिलहाल, 75 रुपये किलो तक पहुंचने की संभावना को अभी बाजार का अनुमान समझना चाहिए, जबकि कीमतों में स्थायी राहत इस बात पर निर्भर करेगी कि सरकार कितनी जल्दी सप्लाई बढ़ाती है और नई फसल का उत्पादन कैसा रहता है. चीनी की कहानी में सबसे बड़ा दबाव है- कमजोर स्टॉक त्योहारी मांग, मौसम की चिंता और इथेनॉल डायवर्जन. यही चारों कारक मिलकर आपकी चाय की मिठास को महंगा बना रहे हैं.

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