अपनों से ऐसा कौन करता है? चाहिए बच्चों की लाश तो देना होगा चार लाख! ईरान में बुलडोजर से शवों को लगाया जा रहा ठिकाने
तेहरान में हालात इतने खराब है कि अब वहां इंसानियत भी जिंदा नहीं रह गया है. अस्पताल में लाशों के ढेर लगे हैं. परिजन जब लाश की डिमांड करते हैं, तो अस्पताल कर्मी उसे देने के लिए लाख रुपये देने की मांग करते हैं. पैसा देने पर ही उन्हें लाश दिया जा रहा है. यहां तक कि परिजनों से उस गोलियों की कीमत भी मांग रहे हैं, जिसके लगने से मौत हुई.;
ईरान की राजधानी तेहरान सहित अधिकांश शहरों के हालात इंसानियत को शर्मसार करने वाले हैं. प्रोटेस्टर्स पर पुलिस फायरिंग की वजह से अस्पताल लाशों से भरे पड़े हैं. बुल्डोजर से लाश हटाए जा रहे हैं. परिजनों को उन गोलियों के पैसे देने पर मजबूर किया जा रहा है, जिनसे उनके बच्चों की जान चली गई. पैसे भी हजारों में नहीं, बल्कि लाखों रुपये मांगे जा रहे हैं. किसी माता-पिता के लिए इससे ज्यादा मर्माहत करने वाली स्थिति और क्या हो सकती है कि वे अपने बच्चों की लाश भी नीलामी में खरीदने के लिए मजबूर हों. भला, अपने देशवासियों के साथ ही ऐसा कौन करता है?
दरअसल, ईरान की राजधानी तेहरान से जो रिपोर्ट सामने आ रही हैं, वो दिल को तोड़ने वाली हैं. ऐसा लगता है ईरान में सत्ता की जंग में इंसानियत मर गई है. वहां की तस्वीरें और आरोप इंसानियत को झकझोर देने वाले हैं. टीओआई की रिपोर्ट के मुताबिक कहा जा रहा है कि अस्पतालों में शवों के ढेर लगे हैं और अपनों को खो चुके परिवारों से मृत शरीर सौंपने के बदले लाखों की भारी रकम मांगी जा रही है.
दर्द में डूबे परिजन जब अपने मृतक को आखिरी बार देखने की उम्मीद लेकर अस्पताल पहुंचते हैं, तो वहां उनसे 3 से 4 लाख रुपये तक की मांग किए जाने के आरोप लगाए जा रहे हैं. सूत्रों के मुताबिक यह दावा किया जा रहा है कि हालात इतने बदतर हो चुके हैं कि मौत के बाद भी गरीब और मध्यम वर्ग को कीमत चुकानी पड़ रही है. इन आरोपों ने न सिर्फ ईरान की स्वास्थ्य व्यवस्था, बल्कि मानवाधिकारों और नैतिकता पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं.
सड़कों पर लाश का अंबार
तेहरान की रहने वाली आबगीने खाकी, जो अब दक्षिण भारत के एक शहर में रहती हैं, ने TOI को बताया कि उन्होंने मंगलवार शाम को अपने माता-पिता से बात की थी. उन्होंने बताया कि वे सुरक्षित हैं, लेकिन चारों ओर लाशें ही लाशें हैं. उन्होंने कहा, "मेरे पिता ने मुझे बताया कि अस्पताल लाशों से भरे हुए हैं. प्रशासन सड़कों को साफ करने के लिए बुलडोजर का इस्तेमाल कर रहा है. वे तब तक लाशें परिवारों को नहीं सौंप रहे जब तक वे पैसे नहीं देते. शव देने के लिए लगभग 500 मिलियन तोमान यानी भारतीय मुद्रा में करीब चार लाख रुपये. कुछ अधिकारी तो गोली की कीमत भी मांग रहे हैं, जिससे बच्चे व लोगों की मौतें हुई हैं.
ऐसा तो नहीं था ईरान
वहां के नागरिकों के मुताबिक ईरान अब कुछ और ही बन गया है. थकान और जिंदा रहने की लड़ाई. खाकी ने कहा, लोग रोटी और अंडे भी नहीं खरीद पा रहे हैं. हमारे माता-पिता की पीढ़ी को पछतावा है कि जब वे बोल सकते थे, तब वे नहीं बोले. अब वे हमारा साथ दे रहे हैं. हम चाहते हैं कि यह सरकार चली जाए. किसी भी कीमत पर.
हमें नहीं पता माता पिता जिंदा हैं या नहीं
खाकी ने आगे बताया मंगलवार को, जब कुछ समय के लिए इंटरनेशनल कॉल की इजाजत मिली, तो वह अपने रिश्तेदारों से बात कर पाईं, लेकिन सिर्फ 30 सेकंड के लिए. उन्हें अब भी नहीं पता कि तेहरान में उनके माता-पिता सुरक्षित हैं या नहीं. उन्होंने कहा, "हर दिन दोपहर 3 बजे से सुबह तक कर्फ्यू रहता है." "रिवोल्यूशनरी गार्ड सड़कों पर हैं, लेकिन लोग फिर भी बाहर आते हैं. उन्हें पता है कि उनकी जान जा सकती है, लेकिन वे फिर भी आते हैं." उन्होंने आगे कहा कि सुरक्षा बलों ने पेलेट गन का इस्तेमाल बंद कर दिया है. वे अब असली गोलियां चला रहे हैं. किसी को नहीं छोड़ रहे - न महिलाओं को, न बच्चों को."
अपनों के लिए आवाज उठाने आए हैं
नई दिल्ली में बुधवार को ईरानियों का एक ग्रुप अपने दूतावास के बाहर इकट्ठा हुआ. 1979 से पहले का राष्ट्रीय झंडा लहराया जिस पर शेर और सूरज का निशान था. यह विरोध का एक छोटा सा काम था, लेकिन उन्होंने इसे जरूरी बताया. मोहम्मद ने फोन पर कहा, "हम यहां अपने भाइयों और बहनों के लिए आवाज उठाने आए हैं। हम चाहते हैं कि भारतीयों को पता चले कि क्या हो रहा है और हम उनका सपोर्ट चाहते हैं." ईरान में कम से कम 3,000 भारतीय स्टूडेंट्स हैं, जिनमें से लगभग 2,300 कश्मीर के हैं.
भारत सरकार से मदद की जरूरत
श्रीनगर के ही शमीक परवेज ने बताया कि उनकी 19 साल की चचेरी बहन दिसंबर में तेहरान यूनिवर्सिटी ऑफ मेडिकल साइंसेज में शामिल हुई थी. "हमें यह भी नहीं पता कि उसने एडवाइजरी देखी है या नहीं. इसे ट्विटर पर पोस्ट किया गया था, लेकिन अब कौन उसे एक्सेस कर पा रहा है? हमें भारतीय सरकार से दखल देने और मदद करने की जरूरत है."