आज हमदर्द, कल कातिल! जॉर्डन में फिलिस्तीनियों पर गोलियां बरसाने वाले Pakistan का काला सच

पाकिस्तान खुद को दुनिया भर के मुसलमानों का हमदर्द बताता है, लेकिन इतिहास का एक कड़वा सच इसकी सियासत पर बड़े सवाल खड़े करता है. 1970 के ‘ब्लैक सितंबर’ में जॉर्डन की ज़मीन पर वही पाकिस्तान फिलिस्तीनी लड़ाकों के खिलाफ खड़ा नजर आया था.

Edited By :  समी सिद्दीकी
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When Pakistan Attack Palestinians: पाकिस्तान वैसे तो खुद को फिलिस्तीनियों और मुसलमानों के हक में बोलने वाला बताता है, लेकिन एक वक्त में उसने उन्हीं फिलिस्तीनियों की हत्याएं की थी. खुद को मुसलमानों के रहनुमा दिखाने वाले पाकिस्तान ने जमकर फिलिस्तीनी मुसलमानों पर गोलियां बरसाई थीं. ये पूरा किस्सा उस दौर का है जब ज़िया उल हक पाकिस्तान आर्मी के मेजर थे और वह फिलिस्तीनी लड़ाकों के खिलाफ जंग में मदद के लिए जॉर्डन गए थे.

पाकिस्तान ऐसा ही कुछ अफगानिस्तान में कर रहा है. 17 मार्च को ही पाकिस्तान ने एक काबुल के एक अस्पताल पर हमला किया, जिसमें 400 लोगों की जान चली गई. इससे सीधे तौर पर पता लगता है कि पाक केवल सियासत और हमदर्दी बटोरने के लिए मुस्लिम कार्ड खेलता है, असल में वह सिर्फ अपने नफे के लिए काम करता है.

कब फिलिस्तीनियों को पाकिस्तान ने उतारा मौत के घाट?

इस घटना को समझने के लिए 1970 के उस दौरा में जाना होगा जिसे इतिहाल में 'ब्लैक सितंबर' भी कहा जाता है. आमतौर पर फ़लस्तीनी-इसराइली टकराव की बात होती है, लेकिन यह कम लोगों को पता है कि लगभग 55 साल पहले फ़लस्तीनी लड़ाकों और पाकिस्तानी सेना के बीच जॉर्डन की सरज़मीन पर जंग हुई थी. इस दौरान कई फिलिस्तीनी मारे गए थे.

कैसे शुरू हुआ था ये संघर्ष

यह संघर्ष 16 सितंबर से 27 सितंबर 1970 तक चला, जिसे इतिहास में ‘ब्लैक सितंबर’ के नाम से जाना जाता है. इसकी पृष्ठभूमि 1967 के छह-दिवसीय युद्ध से जुड़ी थी, जिसमें जॉर्डन, मिस्र और सीरिया को इसराइल के हाथों भारी हार का सामना करना पड़ा था. जॉर्डन को यरूशलम, ग़ज़ा और वेस्ट बैंक जैसे अहम इलाकों से हाथ धोना पड़ा, जिससे देश के भीतर तनाव बढ़ गया.

इसी माहौल में फ़लस्तीनी “फ़िदायीन” समूहों ने जॉर्डन के वेस्ट बैंक से लगे इलाकों में अपनी मौजूदगी बढ़ा दी. ये लड़ाके समय-समय पर इसराइल के कब्ज़े वाले क्षेत्रों पर हमले करते थे, जिससे उनकी लोकप्रियता बढ़ने लगी. धीरे-धीरे उन्हें सीरिया और इराक जैसे देशों का समर्थन भी मिलने लगा, जिसने जॉर्डन सरकार की चिंताएं और बढ़ा दीं.

उस समय के जॉर्डन के शासक शाह हुसैन को लगा कि उनकी पावर धीरे-धीरे कम हो रही है, तो उन्होंने पाकिस्तान के ब्रिगेडियर ज़िया-उल-हक़ से मदद मांगी. उस समय ज़िया-उल-हक़ ओमान में पाकिस्तानी दूतावास में डिफेंस अताशे के तौर पर तैनात थे. अमेरिका में प्रशिक्षण पूरा करने के बाद ज़िया-उल-हक़ को जॉर्डन भेजा गया था, जहां उनका काम सैन्य सहयोग बढ़ाना था.

इस दौरान फिलिस्तीनी लड़ाकों, जॉर्डन और पाकिस्तानी के बीच कई मुठभेड़ हुईं. कई जगहों पर छापे मारे गए. ये सीधे तौर पर जॉर्डन के लिए करो या मरो वाली स्थिति थी, जिसमें उसने पाकिस्तान से मदद लेना बेहतर समझा.

ज़िया-उल-हक़ जॉर्डन में तीन साल से मौजूद थे और उनकी जिम्मेदारी पाकिस्तान और जॉर्डन की सेनाओं के बीच संबंध मजबूत करना और घटनाओं की रिपोर्ट पाकिस्तान भेजना था. हालांकि, बाद के घटनाक्रम में उनकी भूमिका इससे कहीं आगे बढ़ती नजर आती है. 1970 में जब सीरियाई सेना टैंकों के साथ जॉर्डन की सीमा पर पहुंच गई और अमेरिका की तरफ से तत्काल मदद नहीं मिली, तब शाह हुसैन बेहद चिंतित हो गए. उन्होंने ज़िया-उल-हक़ से स्थिति का आकलन करने और उन्हें जमीनी हालात की जानकारी देने को कहा.

जब जॉर्डन के अधिकारियों ने ज़िया-उल-हक़ से स्थिति के बारे में पूछा, तो उन्होंने साफ कहा कि हालात बेहद खराब हैं. ब्रूस रिडेल लिखते हैं कि इसी दौरान ज़िया-उल-हक़ ने शाह हुसैन को सीरियाई सेना के खिलाफ जॉर्डन की वायु सेना का इस्तेमाल करने की सलाह दी. इस फैसले को युद्ध का टर्निंग प्वाइंट माना गया, जिससे जॉर्डन को बढ़त मिली.

ज़िया-उल-हक़ की जंग के दौरान भूमिका क्या थी?

इस संघर्ष में ज़िया-उल-हक़ की भूमिका को लेकर सबसे महत्वपूर्ण बयान शाह हुसैन के भाई और तत्कालीन क्राउन प्रिंस हसन बिन तलाल ने दिया था. उन्होंने ब्रूस रिडेल से बातचीत में कहा था कि ज़िया-उल-हक़ शाह हुसैन के करीबी और भरोसेमंद थे. उनके मुताबिक, युद्ध के दौरान उनकी मौजूदगी इतनी अहम थी कि वे लगभग सेना का नेतृत्व कर रहे थे.

शाह हुसैन की सिफारिश के बाद ज़िया-उल-हक़ को ब्रिगेडियर से मेजर जनरल के पद पर पदोन्नत कर दिया गया. भुट्टो के पूर्व सलाहकार राजा अनवर ने अपनी किताब ‘द टेररिस्ट प्रिंस’ में लिखा है कि अगर यह सिफारिश नहीं होती, तो ज़िया-उल-हक़ का करियर शायद ब्रिगेडियर के पद पर ही रुक जाता.

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