भारत और पाकिस्तान के बीच अगर कभी युद्ध होता है तो क्या तुर्किये भी पाकिस्तान की तरफ से मैदान में उतर जाएगा? क्या पाकिस्तान पर हमला तुर्किये पर हमला माना जाएगा? इन सवालों को लेकर तुर्किये की संसद में बहस छिड़ गई है. राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन (Recep Tayyip Erdogan) चारों ओर से घिरे हुए नजर आ रहे हैं. दरअसल, सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किये के बीच हुए मक्का संयुक्त रक्षा समझौते (Mecca Joint Defence Agreement) को तुर्किये की संसद ने मंजूरी दे दी है. इस समझौते में प्रावधान है कि तीन देशों में से किसी एक पर बाहरी सशस्त्र हमला बाकी दोनों देशों पर हमला माना जाएगा. इसी प्रावधान को लेकर विपक्षी सांसद गुलिस्तान किलिक कोच्यिगित ने सवाल उठाया कि अगर भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध होता है तो क्या तुर्किये को भी इसमें शामिल होना पड़ेगा?

तुर्किये की संसद ने गुरुवार, 5 नवंबर को इस समझौते को 279 वोटों के समर्थन और 119 वोटों के विरोध से मंजूरी दी. हालांकि, सरकार ने स्पष्ट किया है कि समझौते का मतलब यह नहीं है कि किसी सदस्य देश पर हमला होते ही तुर्किये की सेना अपने आप युद्ध में उतर जाएगी. सैनिकों की तैनाती के लिए संसद की अलग से मंजूरी जरूरी होगी. ऐसे में यह समझौता भारत-पाकिस्तान के संभावित टकराव के संदर्भ में रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण जरूर है, लेकिन इसे तुर्किये के स्वतः युद्ध में शामिल होने की गारंटी नहीं माना जा सकता.

तुर्किये की संसद में भारत-पाकिस्तान युद्ध का मुद्दा क्यों उठा?

तुर्किये की विपक्षी पार्टी पीपुल्स इक्वालिटी एंड डेमोक्रेसी पार्टी (DEM Party) की डिप्टी संसदीय समूह नेता गुलिस्तान किलिक कोच्यिगित (Turkish opposition MP Gulistan Kilic Kocyigit) ने रक्षा समझौते पर चर्चा के दौरान भारत और पाकिस्तान के बीच लंबे समय से चले आ रहे तनाव का जिक्र किया. उन्होंने सवाल उठाया कि अगर भारत भविष्य में पाकिस्तान पर हमला करता है तो क्या उसे तुर्किये पर हमला माना जाएगा? क्या ऐसी स्थिति में तुर्किये को पाकिस्तान की मदद के लिए युद्ध में उतरना होगा?

कोच्यिगित ने कहा कि भारत और पाकिस्तान दोनों परमाणु हथियार संपन्न देश हैं और उनके बीच संघर्ष का इतिहास रहा है. ऐसे में इस तरह के समझौते में शामिल होने से पहले यह स्पष्ट होना चाहिए कि किसी युद्ध की स्थिति में तुर्किये का रुख क्या होगा. उन्होंने सवाल किया, "अगर हमें युद्ध में शामिल होना है तो इसका फैसला कैसे होगा? संसद ने इस पर फैसला नहीं लिया और न ही जनता ने इस पर फैसला किया." उनकी आपत्ति का मुख्य आधार यह था कि किसी दूसरे देश के साथ रक्षा समझौता करने से तुर्किये ऐसे संघर्ष में उलझ सकता है, जिसमें शामिल होने का फैसला उसने खुद नहीं किया हो.

कौन हैं Gulistan Kilic Kocyigit?

  • गुलिस्तान किलिक तुर्किये की एक प्रमुख कुर्द मूल की राजनेता, सांसद और पीपल्स इक्वैलिटी एंड डेमोक्रेसी पार्टी (DEM Party) की संसदीय समूह की उप-अध्यक्ष (Deputy Chairperson) हैं.
  • उनका जन्म 1979 में तुर्की के तुंजेली (Tunceli) प्रांत के मज्गिर्त में हुआ था. उन्होंने सार्वजनिक प्रशासन (Public Administration) और समाजशास्त्र (Sociology) में पढ़ाई की है और राजनीति में आने से पहले वे एक नर्स के रूप में काम करती थीं.
  • गुलिस्तान ने लंबे समय तक नागरिक समाज संगठनों, मानवाधिकार संघों और ट्रेड यूनियनों में काम किया है. साल 2018 में वे पहली बार 'एचडीपी' (HDP) पार्टी से मुश (Muş) प्रांत की सांसद चुनी गईं. इसके बाद 2023 के चुनावों में वे डीईएम पार्टी (DEM Party) से कार्स (Kars) क्षेत्र की सांसद बनीं और वर्तमान में तुर्की की संसद में अपनी पार्टी की डिप्टी ग्रुप चेयरपर्सन हैं.
  • नवंबर 2026 में तुर्किये की संसद में पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की के बीच हुए 'मक्का रक्षा समझौते' (Mecca Joint Defence Agreement) पर बहस के दौरान उन्होंने अपनी सरकार को घेरा. उन्होंने संसद में यह कड़ा सवाल पूछा, "अगर भारत कल को पाकिस्तान पर हमला कर देता है, तो क्या इस समझौते के तहत यह तुर्किये पर हमला माना जाएगा? क्या तुर्किये को भी भारत के खिलाफ इस युद्ध में उतरना पड़ेगा?" उनके इस बयान ने अंतरराष्ट्रीय मीडिया का ध्यान खींचा है.
  • गुलिस्तान ने कहा, अगर तुर्किये  भारत के खिलाफ पाकिस्तान के साथ युद्ध में शामिल होगा तो इसका फैसला एर्दोआन कैसे कर सकते हैं? संसद ने कोई फैसला नहीं लिया है, जनता ने भी कोई फैसला नहीं लिया है, फिर तुर्किये भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध का हिस्सा क्यों बने?... और अगर मक्का समझौता ईरान को घेरने की रणनीति का हिस्सा है तो ईरान के साथ हमारे ऐतिहासिक संबंध हैं. और अगर यह समझौता ईरान के खिलाफ नहीं है तो एर्दोआन सामने आकर बताएं. एक अस्पष्ट समझौते पर साइन करके एर्दोआन ने तुर्किये की जनता के भविष्य को दांव पर लगा दिया है. हम तुर्किये के युवाओं को यमन की धरती पर मरने की इजाजत कभी नहीं देंगे.
  • गुलिस्तान संसद में महिला अधिकारों, स्वास्थ्य नीतियों, सामाजिक न्याय और कुर्द मुद्दे के लोकतांत्रिक समाधान के लिए मुखर होकर आवाज उठाने के लिए जानी जाती हैं.

क्या है मक्का डिफेंस पैक्ट, जिस पर मची है बहस?

मक्का संयुक्त रक्षा समझौता सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किये के बीच हुआ एक त्रिपक्षीय रक्षा समझौता है. तीनों देशों ने 7 अगस्त 2026 को सऊदी अरब के मक्का में इस समझौते पर हस्ताक्षर किए थे. इस दौरान सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान, तुर्किये के राष्ट्रपति रेचेप तैयप एर्दोगन और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ मौजूद थे. समझौते का मुख्य उद्देश्य तीनों देशों के बीच रक्षा सहयोग बढ़ाना, सुरक्षा खतरों से निपटने के लिए आपसी तालमेल मजबूत करना और सामूहिक सुरक्षा व्यवस्था तैयार करना है.

इस समझौते में कुल 16 अनुच्छेद हैं. इसका सबसे महत्वपूर्ण प्रावधान अनुच्छेद-2 है. इसके मुताबिक, तीनों देशों में से किसी एक पर बाहरी सशस्त्र हमला होने की स्थिति में उसे तीनों देशों पर हमला माना जाएगा. ऐसी स्थिति में बाकी सदस्य देश हमले का सामना कर रहे देश को सहायता देंगे. हालांकि, समझौते में यह भी स्पष्ट किया गया है कि सहायता का स्वरूप और उसकी सीमा संबंधित देशों की जरूरतों और उपलब्ध क्षमताओं का आकलन करने के बाद तय होगी. इसमें सैन्य मदद भी शामिल हो सकती है.

क्या पाकिस्तान पर हमला हुआ तो तुर्किये को सेना भेजनी ही पड़ेगी?

इस पूरे विवाद में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है. समझौते में किसी एक सदस्य पर हमला होने को सभी सदस्यों पर हमला माना गया है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि बाकी दोनों देशों की सेनाएं बिना किसी प्रक्रिया के युद्ध में उतर जाएंगी. समझौते के अनुच्छेद-2 में कहा गया है कि हमले की स्थिति में सदस्य देश आपसी सहायता देंगे. लेकिन सहायता की प्रकृति और उसका दायरा आकलन के बाद तय किया जाएगा. मदद सैन्य और गैर-सैन्य दोनों तरह की हो सकती है.

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मसलन, किसी देश को हथियार, सैन्य उपकरण, खुफिया जानकारी, तकनीकी सहायता, ट्रेनिंग या लॉजिस्टिक सपोर्ट दिया जा सकता है. जरूरत और सहमति के आधार पर सैन्य सहयोग का स्वरूप भी तय हो सकता है. तुर्किये के अधिकारियों ने भी स्पष्ट किया है कि विदेशी जमीन पर सैनिकों की तैनाती के लिए संसद की अलग मंजूरी जरूरी होगी. यानी समझौते के तहत रक्षा सहयोग की प्रतिबद्धता और सीधे युद्ध में सैनिक भेजना दो अलग-अलग बातें हैं. इसलिए अगर भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध होता है तो तुर्किये पर पाकिस्तान की मदद करने का दबाव जरूर बन सकता है, लेकिन तुर्किये की सेना सीधे भारत के खिलाफ युद्ध में उतर जाएगी, ऐसा निष्कर्ष निकालना अभी सही नहीं होगा.

तुर्किये के अधिकारियों ने क्या सफाई दी?

तुर्किये की संसद की विदेश मामलों की समिति के अध्यक्ष और राष्ट्रपति एर्दोगन की सत्तारूढ़ पार्टी के नेता फुआत ओक्ताय ने विपक्ष की आशंकाओं पर जवाब दिया. उन्होंने कहा कि तुर्किये को उसकी इच्छा के विरुद्ध किसी अनियंत्रित प्रक्रिया में नहीं घसीटा जाएगा. उनके मुताबिक, सैनिकों की तैनाती के लिए संसद की मंजूरी आवश्यक होगी.

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सत्तारूढ़ पार्टी के सांसद जिया अल्तुनयालदिज ने भी कहा कि समझौते का मकसद किसी तीसरे देश के खिलाफ मोर्चा खोलना नहीं, बल्कि क्षेत्रीय सुरक्षा सहयोग बढ़ाना और संघर्षों को रोकना है. तुर्किये के अधिकारियों ने यह भी कहा है कि यह समझौता किसी विशेष देश के खिलाफ नहीं है. पाकिस्तान के अधिकारियों ने भी स्पष्ट किया है कि इसका उद्देश्य ईरान या किसी अन्य देश को निशाना बनाना नहीं है.

आखिर सऊदी अरब को तुर्किये और पाकिस्तान की जरूरत क्यों पड़ी?

इस समझौते के पीछे केवल भारत-पाकिस्तान का मुद्दा नहीं है. पश्चिम एशिया में बदलते सुरक्षा हालात भी इसकी एक बड़ी वजह हैं. सऊदी अरब को यमन के हूती विद्रोहियों की ओर से हमलों का खतरा बना हुआ है. हूती विद्रोहियों को ईरान का समर्थन प्राप्त है। क्षेत्र में अमेरिका और ईरान के बीच तनाव बढ़ने की आशंकाओं ने भी सऊदी अरब की सुरक्षा चिंताएं बढ़ाई हैं. ऐसे में सऊदी अरब अपनी सुरक्षा साझेदारी को मजबूत करना चाहता है. वह केवल अमेरिका पर निर्भर रहने के बजाय दूसरे क्षेत्रीय देशों के साथ भी रक्षा सहयोग बढ़ा रहा है.

तुर्किये के लिए भी यह समझौता महत्वपूर्ण है. पिछले कुछ वर्षों में सऊदी अरब और तुर्किये के संबंधों में उतार-चढ़ाव रहे हैं। अब दोनों देश रक्षा और रणनीतिक सहयोग को नए स्तर पर ले जाना चाहते हैं.  पाकिस्तान की भूमिका भी अहम है. उसके पास बड़ी सैन्य क्षमता और परमाणु हथियार हैं। वहीं, तुर्किये का रक्षा उद्योग ड्रोन, एयर डिफेंस सिस्टम और सैन्य तकनीक के क्षेत्र में तेजी से विकसित हुआ है.  इस तरह तीनों देशों के हित अलग-अलग होने के बावजूद सामूहिक सुरक्षा और सैन्य सहयोग के मुद्दे पर एक साथ आए हैं.

क्या यह NATO के आर्टिकल-5 जैसा समझौता है?

मक्का डिफेंस पैक्ट की तुलना NATO के आर्टिकल-5 से भी की जा रही है. NATO के आर्टिकल-5 के तहत किसी एक सदस्य देश पर सशस्त्र हमला सभी सदस्य देशों पर हमला माना जाता है और सदस्य देश हमले का सामना कर रहे देश की सहायता करने के लिए प्रतिबद्ध होते हैं. मक्का समझौते में भी इसी तरह का सामूहिक रक्षा प्रावधान रखा गया है. हालांकि, दोनों व्यवस्थाएं एक जैसी नहीं हैं. मक्का समझौते में तीन देशों के बीच सहायता का स्वरूप और सीमा आपसी आकलन, उपलब्ध संसाधनों और संबंधित देशों के संवैधानिक प्रावधानों के आधार पर तय होगी. इसका मतलब यह है कि किसी देश पर हमला होने के बाद बाकी देशों को सहायता के विकल्पों पर काम करना होगा, लेकिन हर स्थिति में सीधे सैन्य युद्ध में उतरना अनिवार्य नहीं है.

क्या इस समझौते में शामिल हो सकता है कोई चौथा देश?

मक्का समझौते में भविष्य में दूसरे देशों को शामिल करने का रास्ता भी रखा गया है. इसके लिए तीनों संस्थापक देशों की सहमति जरूरी होगी. समझौते के तहत विदेश मंत्रियों, रक्षा मंत्रियों और सैन्य प्रमुखों वाली एक रणनीतिक राजनीतिक एवं रक्षा समिति बनाई गई है. यह समिति तीनों देशों के बीच रक्षा सहयोग की दिशा तय करेगी और समझौते को लागू करने से जुड़ी समस्याओं पर काम करेगी. इसका मुख्यालय सऊदी अरब में होगा. समझौते के अनुसार, समिति की बैठक साल में दो बार होगी और जरूरत पड़ने पर तीनों देशों के नेता भी बैठक कर सकते हैं.  समझौते की एक खास बात यह भी है कि इसके लागू होने के बाद शुरुआती 10 वर्षों तक कोई सदस्य देश इससे बाहर नहीं निकल सकता. इसके बाद बाहर निकलने के लिए कम से कम तीन महीने पहले लिखित सूचना देनी होगी.

सबसे पहले सऊदी अरब पर हो सकता है समझौते का परीक्षण

इस रक्षा समझौते की पहली बड़ी परीक्षा सऊदी अरब की सुरक्षा जरूरतों के संदर्भ में हो सकती है. यमन के हूती विद्रोहियों के हमलों के बीच तीनों देशों ने सितंबर में सामूहिक रक्षा प्रतिबद्धताओं को लागू करने की दिशा में कदम बढ़ाने पर सहमति जताई थी. इसमें सऊदी अरब में सहमत सैन्य बलों और क्षमताओं की तेजी से तैनाती की व्यवस्था भी शामिल है. हालांकि, इसकी विस्तृत जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई है.

तुर्किये की ओर से सऊदी अरब को सैन्य उपकरण, खुफिया जानकारी और तकनीकी सहायता देने की संभावनाओं पर भी चर्चा हुई है. तुर्किये के रक्षा मंत्री यासर गुलर पहले कह चुके हैं कि उनकी सेना हूतियों के खिलाफ लड़ाकू या आक्रामक अभियान में शामिल होने की योजना नहीं बना रही है. ऐसे में सऊदी अरब को मिलने वाली वास्तविक सहायता यह समझने में महत्वपूर्ण होगी कि भविष्य में पाकिस्तान की ओर से मदद मांगे जाने पर तुर्किये किस तरह का रुख अपनाता है.

भारत के लिए इस समझौते के क्या मायने हैं?

भारत के नजरिए से इस समझौते पर नजर रखना महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसमें पाकिस्तान के साथ तुर्किये भी शामिल है.  भारत और तुर्किये के संबंध पहले से ही कई रणनीतिक मुद्दों पर संवेदनशील रहे हैं। तुर्किये ने अतीत में कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान के पक्ष में बयान दिए हैं और पाकिस्तान के साथ रक्षा सहयोग भी बढ़ाया है. अब सऊदी अरब के भी इस त्रिपक्षीय समझौते का हिस्सा बनने से क्षेत्रीय सुरक्षा समीकरण में एक नया आयाम जुड़ गया है.

हालांकि, इस समझौते को भारत के खिलाफ सैन्य गठबंधन घोषित करना फिलहाल सही नहीं होगा.  तीनों देशों ने इसे सामूहिक रक्षा और क्षेत्रीय सुरक्षा सहयोग का समझौता बताया है। तुर्किये और पाकिस्तान दोनों ने कहा है कि इसका उद्देश्य किसी तीसरे देश को निशाना बनाना नहीं है. सबसे अहम बात यह है कि समझौते में सहायता की प्रकृति तय करने का अधिकार सदस्य देशों के पास है और तुर्किये में सैनिकों की तैनाती के लिए अलग संसदीय मंजूरी जरूरी है. इसलिए भविष्य में भारत-पाकिस्तान के बीच किसी सैन्य टकराव की स्थिति में तुर्किये क्या करेगा, इसका जवाब समझौते के प्रावधानों के साथ-साथ उस समय की राजनीतिक और रणनीतिक परिस्थितियों पर भी निर्भर करेगा