अमेरिका के मिड टर्म इलेक्शन में डोनाल्ड ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी को बड़ा झटका लगा है. डेमोक्रेटिक पार्टी ने कांग्रेस के दोनों सदनों में बहुमत हासिल कर लिया है. इस नतीजे को केवल अमेरिका की इंटरनल पॉलिटिक्स में सत्ता के संतुलन में बदलाव के तौर पर नहीं देखा जा रहा, बल्कि इसका असर अमेरिका की विदेश नीति पर भी पड़ सकता है. खासतौर से भारत और पाकिस्तान के साथ रिश्तों को लेकर ट्रंप प्रशासन के फैसलों पर अब सवाल और निगरानी बढ़ सकती है.

ईरान के साथ लंबे युद्ध, बढ़ती महंगाई और आम लोगों पर आर्थिक दबाव को रिपब्लिकन पार्टी की हार की प्रमुख वजहों में गिना जा रहा है. हालांकि, भारत और पाकिस्तान के मामले में तस्वीर थोड़ी अलग है. ट्रंप ने एक तरफ भारत पर व्यापार शुल्क और वीजा संबंधी सख्ती दिखाई, वहीं दूसरी तरफ पाकिस्तान के सैन्य नेतृत्व और वहां के कारोबारी प्रस्तावों को महत्व दिया. इतना ही नहीं, ट्रंप प्रशासन को जब भी मौका मिला उसने पाकिस्तान की तुलना में भारत को नीचा दिखाने की कोशिश की. अब सवाल है कि क्या नई कांग्रेस इस नीति में बदलाव का रास्ता तैयार करेगी या ट्रंप पहले की तरह अपनी रणनीति जारी रखेंगे?

मिडटर्म चुनाव में ट्रंप को क्यों लगा झटका?

अमेरिकी चुनाव नतीजों के मुताबिक, डेमोक्रेट्स ने सीनेट और प्रतिनिधि सभा दोनों में बहुमत हासिल कर लिया है. इस तरह 2027 में नई कांग्रेस के कामकाज संभालने के बाद ट्रंप को दोनों सदनों में विपक्ष का सामना करना पड़ेगा. यह उनके दूसरे कार्यकाल के आखिरी दो वर्षों के लिए बड़ी राजनीतिक चुनौती होगी.

अमेरिकी मिड टर्म चुनाव के नतीजों ने से न केवल विदेश नीति, बल्कि घरेलू अर्थव्यवस्था भी बड़ी वजह रही. ईरान के साथ युद्ध के कारण ऊर्जा कीमतों में बढ़ोतरी और महंगाई ने अमेरिकी मतदाताओं की नाराजगी बढ़ाई. ऐसे में यह कहना सही नहीं होगा कि भारत-पाकिस्तान नीति अकेले उनकी हार की वजह बनी, लेकिन इस नीति पर भी राजनीतिक निगरानी बढ़ सकती है.

अमेरिका पाकिस्तान को भारत से ज्यादा तवज्जो क्यों देता है?

भारत और पाकिस्तान के प्रति अमेरिका के रुख को समझने के लिए दोनों देशों की अलग-अलग रणनीतिक उपयोगिता को देखना जरूरी है. भारत अमेरिका के लिए बड़ा बाजार, तकनीकी साझेदार और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन के प्रभाव को संतुलित करने वाला अहम देश है. दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग भी लगातार बढ़ा है. अक्टूबर 2025 में दोनों ने 10 साल के रक्षा सहयोग समझौते पर हस्ताक्षर किए थे.

इसके बावजूद पाकिस्तान को नजरअंदाज करना अमेरिका के लिए आसान नहीं है. पाकिस्तान की भौगोलिक स्थिति उसे पश्चिम एशिया, अफगानिस्तान और ईरान से जुड़े मामलों में अहम बनाती है. वहां की सेना का क्षेत्रीय सुरक्षा मामलों में प्रभाव भी काफी है. खासकर ईरान के साथ संघर्ष के दौरान पाकिस्तान ने अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत कराने में भूमिका निभाई. पाकिस्तान के सेना प्रमुख आसिम मुनीर के साथ ट्रंप के व्यक्तिगत संबंध भी इस नजदीकी की एक वजह बने. ट्रंप उन्हें अपना पसंदीदा फील्ड मार्शल तक कह चुके हैं.

यानी अमेरिका का पाकिस्तान से जुड़ाव भारत की तुलना में उसकी आर्थिक या सामरिक ताकत के आधार पर नहीं, बल्कि कुछ खास सुरक्षा और कूटनीतिक जरूरतों के आधार पर भी तय होता है. इसे भारत की अहमियत कम होने का सीधा संकेत मानना ठीक नहीं होगा.

पाकिस्तान के साथ ट्रंप के कारोबारी समझौते जांच के दायरे में आएंगे?

पाकिस्तान ने ट्रंप प्रशासन के दौरान अमेरिका के साथ आर्थिक और रक्षा सहयोग बढ़ाने की कोशिश की है. इसमें कुछ ऐसे समझौते भी हैं जिनका संबंध ट्रंप परिवार या उसके करीबी लोगों से जुड़ी कंपनियों से है.

जनवरी 2026 में पाकिस्तान ने ट्रंप परिवार से जुड़ी क्रिप्टो कंपनी वर्ल्ड लिबर्टी फाइनेंशियल की सहयोगी कंपनी एससी फाइनेंशियल टेक्नोलॉजीज के साथ समझौता ज्ञापन किया था. इसका उद्देश्य डिजिटल मुद्रा USD1 के जरिए सीमा पार भुगतान की संभावनाएं तलाशना था.

इसी तरह सितंबर 2026 में अमेरिकी ड्रोन कंपनी पावरस ने पाकिस्तान की सेना के साथ समझौता किया. इसमें मानवरहित हवाई प्रणालियों की शुरुआती आपूर्ति का भी जिक्र है. पावरस का एक ऐसी कंपनी में विलय प्रस्तावित था, जिसमें ट्रंप के बेटे एरिक और डोनाल्ड ट्रंप जूनियर से जुड़ा निवेश है. हालांकि, कंपनी के अधिकारियों ने कहा था कि इस निवेश का पाकिस्तान के साथ हुए समझौते पर प्रभाव नहीं पड़ा.

इसके अलावा, न्यूयॉर्क के रूजवेल्ट होटल को लेकर भी पाकिस्तान और अमेरिका के बीच सहयोग का समझौता हुआ. फरवरी 2026 में दोनों देशों ने होटल के संचालन, नवीनीकरण और पुनर्विकास के लिए एक रूपरेखा तैयार की थी. इसमें अमेरिकी विशेष दूत स्टीव विटकॉफ की भूमिका रही.

डेमोक्रेट्स ने ट्रंप परिवार के कारोबारी हितों और प्रशासन के फैसलों की जांच के संकेत दिए हैं. ऐसे में इन समझौतों पर कांग्रेस में सवाल उठ सकते हैं. हालांकि, केवल जांच शुरू होने से किसी सौदे में गड़बड़ी साबित नहीं होती. इसके लिए दस्तावेज और ठोस सबूत जरूरी होंगे.

क्या भारत को ट्रेड डील और टैरिफ के मामले में राहत मिलेगी?

भारत के लिए सबसे बड़ा सवाल अमेरिका की व्यापार नीति है. ट्रंप प्रशासन ने भारतीय उत्पादों पर शुल्क बढ़ाने के साथ व्यापार समझौते को लेकर भी दबाव बनाया. फरवरी 2026 में दोनों देशों के बीच एक अंतरिम व्यापार समझौते की रूपरेखा बनी थी, जिसके तहत ज्यादातर भारतीय उत्पादों पर अमेरिकी शुल्क 50 प्रतिशत से घटाकर 18 प्रतिशत करने की घोषणा हुई थी. लेकिन बाद में बातचीत फिर अटक गई. रूस से भारत की तेल खरीद और अमेरिकी बाजार तक पहुंच जैसे मुद्दे विवाद की वजह बने रहे.

इसके अलावा, अमेरिकी प्रशासन ने ट्रेड एक्ट की धारा 301 के तहत भारत के खिलाफ जांच भी शुरू की. इसका मकसद यह पता लगाना है कि भारत समेत दूसरे देश जरूरत से ज्यादा औद्योगिक उत्पादन करके अमेरिकी उद्योगों को नुकसान तो नहीं पहुंचा रहे हैं. ऐसे में डेमोक्रेट्स के नियंत्रण वाली कांग्रेस में टैरिफ के असर और अमेरिकी कंपनियों पर पड़ने वाले नुकसान को लेकर बहस बढ़ सकती है.

भारत को इससे बातचीत में कुछ अतिरिक्त गुंजाइश मिल सकती है. हालांकि, कांग्रेस के नियंत्रण में बदलाव से ट्रंप के लगाए शुल्क अपने आप खत्म नहीं होंगे. राष्ट्रपति के पास कुछ कार्यकारी अधिकार अब भी बने रहेंगे.

H-1B वीजा पर क्या ट्रंप की सख्ती कम होगी?

भारत के लिए दूसरा बड़ा मुद्दा H-1B वीजा है. अमेरिका में काम करने वाले विदेशी कुशल पेशेवरों में भारतीयों की बड़ी हिस्सेदारी है. ट्रंप प्रशासन ने सितंबर 2025 में अमेरिका के बाहर से आने वाले कुछ H-1B कर्मचारियों के लिए 1 लाख डॉलर के भुगतान की शर्त लागू की थी. सितंबर 2026 में इस व्यवस्था को एक साल और बढ़ा दिया गया. इससे भारतीय तकनीकी पेशेवरों और उन्हें नौकरी देने वाली कंपनियों पर असर पड़ सकता है.

डेमोक्रेटिक सांसदों ने इस तरह की सख्ती के आर्थिक प्रभावों पर सवाल उठाए हैं. उनका तर्क है कि विदेशी कुशल कर्मचारियों पर ज्यादा पाबंदियों से अमेरिकी तकनीकी कंपनियों को भी नुकसान हो सकता है. अब कांग्रेस में उन्हें इस मुद्दे को उठाने का ज्यादा अवसर मिलेगा. हालांकि, वीजा नीति में तत्काल बदलाव की उम्मीद करना जल्दबाजी होगी, क्योंकि इसे लागू करने के अधिकार राष्ट्रपति प्रशासन और संबंधित संघीय एजेंसियों के पास भी हैं.

क्या ट्रंप अब पाकिस्तान को किनारे कर भारत को देंगे प्राथमिकता?

मध्यावधि चुनावों के नतीजों के बाद यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या ट्रंप अपनी पाकिस्तान नीति बदलेंगे? फिलहाल ऐसा कोई स्पष्ट संकेत नहीं है कि अमेरिका पाकिस्तान के साथ अपने संबंध पूरी तरह सीमित करने जा रहा है. ईरान के साथ बातचीत, क्षेत्रीय सुरक्षा और आतंकवाद से जुड़े मामलों में पाकिस्तान की भूमिका अमेरिका के लिए अब भी उपयोगी है.

दूसरी तरफ, भारत के साथ अमेरिका के व्यापार, रक्षा, तकनीक और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सहयोग के अपने बड़े हित हैं. इसलिए दोनों देशों के साथ रिश्तों को केवल एक-दूसरे के विकल्प के तौर पर देखना सही नहीं होगा.

सबसे अहम बात यह है कि डेमोक्रेट्स के पास अब ट्रंप प्रशासन के फैसलों की जांच करने, सुनवाई कराने, बजट पर प्रभाव डालने और कानून बनाने की प्रक्रिया में बाधा डालने की ताकत होगी. लेकिन विदेश नीति का पूरा नियंत्रण उनके हाथ में नहीं आ जाएगा. ट्रंप राष्ट्रपति बने रहेंगे और वीटो जैसे अधिकारों का इस्तेमाल कर सकेंगे.

इसलिए मिडटर्म चुनाव के नतीजों का भारत के लिए मतलब ट्रंप की पाकिस्तान नीति का तत्काल अंत नहीं, बल्कि अमेरिकी फैसलों पर बढ़ती निगरानी और भारत को अपने हितों के लिए बातचीत का एक नया अवसर मिलना हो सकता है.