इस्‍लामिक क्रांति के बाद ईरान में सबसे ज्‍यादा लोगों को उतारा गया मौत के घाट? 47 साल पहले के उस खूनी मंजर को याद कर कांप उठेंगे

ईरान में जारी विरोध प्रदर्शन दुनिया भर में सुर्खियों में है. सरकार और विपक्ष एक-दूसरे पर हिंसा बढ़ाने का आरोप लगा रहे हैं. इस आंदोलन को 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद ईरान का सबसे बड़ा आंदोलन माना जा रहा है. इससे पहले 1988 में सबसे बड़ा नरसंहार हुआ था, जब हजारों राजनीतिक कैदियों को गुप्त आदेश पर फांसी दी गई थी. ईरान की सरकार ने इस बात को कभी स्वीकार नहीं किया. यह कहानी आज भी लोगों की रूह कंपा देती है.;

By :  स्टेट मिरर डेस्क
Updated On : 15 Jan 2026 4:40 PM IST

ईरान में दिसंबर 2025 से लेकर अब तक चल रहे जन आंदोलन ने 1979 की इस्लामी क्रांति की चर्चा छेड़ दी है. इस क्रांति के दम पर खुमैनी ने एक नया शासन जरूर खड़ा किया, लेकिन इसके नौ साल बाद जो हुआ, उसने मानवता को शर्मसार कर दिया. 1988 की गर्मियों में ईरान की जेलें अचानक कब्रिस्तान में बदलने लगीं. न कोई दंगा, न कोई जन-आंदोलन, न कोई खुला युद्ध, फिर भी हजारों लोगों को चुपचाप मौत के घाट उतार दिया गया. कैदियों को रातों-रात कोठरियों से निकाला गया, दो-तीन मिनट की पूछताछ हुई और फिर रस्सी कस दी गई. परिवारों को न तो आखिरी बार मिलने दिया गया, न शव सौंपे गए, न कब्र का पता बताया गया. यह सब एक गुप्त फतवे के तहत हुआ, जिसने विचारधारा को अपराध बना दिया. इस घटना को इस्लामिक क्रांति के बाद सबसे डरावना नरसंहार मानता है. जानिए, ईरान में जारी सत्ता परिवर्तन की लड़ाई के बीच क्या है 1988 में हुए सबसे बड़े नरसंहार की कहानी.

दरअसल, ईरान में 1979 में इस्लामिक क्रांति में राजशाही का अंत होने के बाद सर्वोच्च धार्मिक नेता का सत्ता स्थापित हुआ, लेकिन तत्कालीन सरकार स्थायित्व और जनता के भरोसे की समस्या से जूझ रही थी. ऐसा इसलिए कि शाह पहलवी के समर्थक रह रहकर आवाज उठाते रहते थे. इससे पार पाने और इस्लामिक क्रांति से बनी सत्ता को स्थापित करने के लिए तत्कालीन ईरान की सरकार ने ऐसा फैसला लिया, जिसे इस्लामिक क्रांति के बाद वहां का सबसे बड़ा नरसंहार माना जाता है. हालांकि, सरकार ने इस बात को भी स्वीकार नहीं किया.

वहीं, पुख्ता सबूत बताते हैं कि 1988 में ईरानी अधिकारियों द्वारा हजारों राजनीतिक कैदियों का सामूहिक रूप से फांसी पर लटका दिया गया. इस घटना को दुनिया भर में मानवता के विरुद्ध अपराध माना गया. ह्यूमन राइट्स वॉच के मुताबिक 1988 में, तत्कालीन सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह रुहोल्लाह खुमैनी के आदेश पर कार्रवाई करते हुए, ईरानी अधिकारियों ने पूरे देश में हजारों राजनीतिक कैदियों को बिना किसी कानूनी प्रक्रिया के तुरंत मौत की सजा दे दी.

खास बात यह है कि मारे गए लोगों की सही संख्या तो ज्ञात नहीं है. पूर्व ईरानी अधिकारियों के अनुमानों और मानवाधिकार एवं विपक्षी समूहों द्वारा संकलित सूचियों के अनुसार, ईरानी अधिकारियों ने कम से कम 32 शहरों में 5,000 से अधिक कैदियों को मौत की सजा दी थी, जिसमें राष्ट्रपति अब्राहम रायसी भी शामिल हैं. 1988 के नरसंहार को अक्सर देश के इतिहास में असंतुष्टों की सबसे व्यवस्थित सामूहिक हत्या के रूप में बताया जाता है. एमनेस्टी इंटरनेशनल जैसे समूहों के न्यूनतम अनुमानों के अनुसार मृतकों की संख्या 5,000 है. हालांकि, MEK जैसे विपक्षी समूह दावा करते हैं कि 30,000 लोगों को फांसी दी गई थी.

क्या है नरसंहार की पूरी कहानी?

ह्यूमन राइट्स वॉच ने वरिष्ठ ईरान शोधकर्ता तारा सेपेहरी फार के हवाले से कहा, “दशकों से 1988 के सामूहिक नरसंहार के पीड़ितों के परिवार अपने प्रियजनों के लिए सच्चाई और न्याय की अथक लड़ाई लड़ रहे हैं, लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली है. अब जब स्वीडन में एक मुकदमे ने ईरान के आधुनिक इतिहास के सबसे काले अध्यायों में से एक पर फिर से ध्यान केंद्रित किया है, तो अन्य देशों के अभियोजकों के लिए इन जघन्य अपराधों के लिए न्याय की मांग करना शुरू कर दिया."

इसके जवाब में ईरानी सरकार ने न तो सामूहिक हत्याओं को स्वीकार किया और न ही मारे गए कैदियों की संख्या के बारे में कोई जानकारी दी. इसके बजाय, अधिकारियों ने इन कथित अपराधों के लिए सच्चाई और न्याय की मांग करने वालों को चुप कराने की कोशिश की.

साल 2016 में, अयातुल्ला हुसैन अली मोंटाजेरी के बेटे अहमद मोंटाजेरी,  जो फांसी के समय उप-सर्वोच्च नेता थे, वरिष्ठ अधिकारियों की सामूहिक फांसी की योजना पर चर्चा करते हुए एक ऑडियो टेप जारी किया. ऑडियो फाइल के जारी होने के बाद, विशेष धार्मिक न्यायालय ने मोंटाजेरी को 'व्यवस्था के विरुद्ध दुष्प्रचार फैलाने' और 'राज्य की घरेलू या विदेश नीतियों से संबंधित योजनाओं, रहस्यों या निर्णयों का खुलासा करने... जो जासूसी के समान है' सहित कई आरोपों में दोषी ठहराया. नवंबर 2016 में उन्हें 21 साल की जेल की सजा सुनाई गई, जिसे बाद में निलंबित कर दिया गया.

ह्यूमन राइट्स वॉच के अनुसार जुलाई से सितंबर 1988 के बीच ईरानी अधिकारियों ने निष्पक्ष न्यायिक प्रक्रिया के मौलिक अधिकार का उल्लंघन करते हुए हजारों कैदियों को फांसी दी. अंतर्राष्ट्रीय कानून के तहत इसे गैर-न्यायिक हत्याएं और अमानवीय अपराध माना गया. यह मानवता के विरुद्ध अपराध था. ईरान में कराए गए सामूहिक नरसंहार सुनियोजित थे.

अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत गंभीर अपराधों के लिए दायित्व केवल उन लोगों तक सीमित नहीं है जो ऐसा करते हैं, बल्कि उन लोगों पर भी लागू होता है जो वैसा करने का आदेश देते हैं. या इस तरह की हत्याओं में सहायक की भूमिका निभाते हैं.

 5 दशकों में ईरान में हुई बड़ी घटनाएं

फरवरी 1979 : अयातुल्ला रूहोल्लाह खुमैनी इराक और फ्रांस में 14 साल के देश निकाला के बाद लौटे. अप्रैल में एक रेफरेंडम के बाद, ईरान को इस्लामिक रिपब्लिक घोषित किया गया. नवंबर में  यूनाइटेड स्टेट्स ने ईरान पर अपने पहला बैन लगाया. तेहरान में US एम्बेसी में रखे गए अमेरिकी बंधकों को पकड़कर सही ठहराया गया. US ने हटाए गए शाह, या राजा, मोहम्मद रजा पहलवी का समर्थन किया था. इससे पहले, 1953 के तख्तापलट में डेमोक्रेटिक रूप से चुने गए प्रधानमंत्री, मोहम्मद मोसद्देग को हटाने में मदद की थी, जिसे US और UK इंटेलिजेंस एजेंसियों ने भी समर्थन दिया था.

सितंबर 1980 : इराक ने ईरान पर हमला किया.  एक अनुमान के मुताबिक इस लड़ाई में मरने वालों की संख्या लगभग 5,00,000 थी. ईरान को सबसे ज्यादा नुकसान हुआ था. इस लड़ाई में पहले वर्ल्ड वॉर की तरह ही बड़े पैमाने पर खाइयां, मशीनगन और संगीनों का इस्तेमाल किया गया. हालांकि, इराक ने ईरानियों और इराकी कुर्दों के खिलाफ केमिकल हथियारों का भी इस्तेमाल किया.

जनवरी 1981: इस साल ईरान की सरकार ने US के सभी बंधकों को रिहा कर दिया गया, जिससे ईरानी बंधक संकट खत्म हो गया. जून माह में तेहरान में इस्लामिक रिपब्लिकन पार्टी के हेडक्वार्टर में हुए बम धमाके में दर्जनों सीनियर अधिकारी मारे गए, जिसमें ज्यूडिशियरी के हेड मोहम्मद बेहेश्टी भी शामिल थे, जिन्हें खुमैनी के बाद ईरान में दूसरा सबसे अहम आदमी माना जाता था. उसी साल अगस्त में तेहरान में एक मीटिंग में हुए बम धमाके में प्रेसिडेंट मोहम्मद-अली राजई और प्राइम मिनिस्टर मोहम्मद जवाद बहोनार की हत्या कर दी गई. अधिकारी इसके लिए वामपंथी क्रांतिकारी सोच वाले विपक्षी मोजाहिदीन-ए-खल्क (MEK) ग्रुप को दोषी मानते हैं, जिस पर पिछले साल कार्रवाई हुई थी.

जून 1982: इजरायल ने लेबनान पर हमला किया. ईरान ने लेबनान के विरोध आंदोलन हिज्बुल्लाह को फंडिंग देना शुरू किया.

जून 1989: सुप्रीम लीडर अयातुल्ला रूहोल्लाह खुमैनी की 3 जून को मौत हो गई. उनके बाद आने वाले अयातुल्ला अली खामेनेई को अगले दिन एक्सपर्ट्स की असेंबली ने चुना.

जून 1990: ईरान में एक बड़ा भूकंप आया. लगभग 40,000 लोग मारे गए.

मार्च और मई 1995: US ने ईरान पर तेल और व्यापार से जुड़े बैन लगाए. उसने ईरान पर टेररिज्म को स्पॉन्सर करने और न्यूक्लियर हथियार बनाने का आरोप लगाया.

सितंबर 1998: तालिबान ने माना कि अफगानिस्तान में आठ ईरानी डिप्लोमैट और एक पत्रकार मारे थे. जब ग्रुप ने उत्तरी शहर मजार-ए-शरीफ पर कब्जा कर लिया था. जवाब में ईरान ने अफगानिस्तान के साथ अपने बॉर्डर पर हजारों सैनिक तैनात कर दिए.

छात्र आंदोलन 1999 : साल 1999 के छात्र आंदोलन के दौरान कम से कम 4 लोग मारे गए थे. लगभग 1,200 से 1,400 छात्र  घायल हुए थे. हजारों की संख्या में छात्रों को गिरफ्तार किया गया था.

जनवरी 2002: US प्रेसिडेंट जॉर्ज डब्ल्यू बुश ने ईरान को नॉर्थ कोरिया और इराक के साथ बुराई की धुरी का हिस्सा बताया और कहा कि ये देश टेररिज्म के सपोर्टर हैं.

मार्च 2003: US ने इराक पर हमला किया. ईरान ने जमीन पर शिया मिलिशिया और पॉलिटिकल ग्रुप्स को फाइनेंस और सपोर्ट करना शुरू कर दिया. ऐसे ग्रुप्स पर इसका असर आज भी बना हुआ है. नवंबर में ईरान ने घोषणा की कि वह अपने यूरेनियम एनरिचमेंट प्रोग्राम को रोक देगा और UN को अपनी न्यूक्लियर साइट्स की और अच्छी तरह से जांच करने देगा. इंटरनेशनल एटॉमिक एनर्जी एजेंसी (IAEA) का कहना है कि न्यूक्लियर वेपन प्रोग्राम का कोई सबूत नहीं है. यह खुलापन एक बदलाव है क्योंकि ईरानी अधिकारियों ने पिछले इंस्पेक्शन को रोक दिया था या उनमें रुकावट डाली थी. दक्षिणी ईरान में बाढ़ और भूकंप से 40,000 लोग मारे गए.

दिसंबर 2006: UN सिक्योरिटी काउंसिल (UNSC) ने ईरान के सेंसिटिव न्यूक्लियर मटेरियल और टेक्नोलॉजी के ट्रेड पर बैन लगा दिए. क्योंकि ईरान जर्मनी और यूनाइटेड स्टेट्स से डिप्लोमैटिक और इकोनॉमिक इंसेंटिव के बदले में अपना न्यूक्लियर प्रोग्राम रोकने में नाकाम रहा.

ग्रीन मूवमेंट 2009 : साल 2009 में ग्रीन मूवमेंट के दौरान स्वतंत्र और मानवाधिकार समूहों के अनुसार लगभग 100 से ज्यादा लोगों की हत्या हुई थी. 4,000 से अधिक लोग गिरफ्तार किए गए थे. सैकड़ों की संख्या में लोग घायल हु थे.

आर्थिक विरोध प्रदर्शन 2017–2018 : साल 2017-18 आर्थिक विरोध प्रदर्शन के दौरान कम से कम 22 लोगों का कथित तौर पर मौतें हुई थी. 3,700 लोग हिरासत में लिए गए थे. काफी संख्या में लोग घायल हुए थे.

खूनी नवंबर 2019 : साल 2019 के विरोध प्रदर्शनों को क्रांति के बाद से बड़े घातक कार्रवाई में से एक माना गया. इसमें मृतकों की आधिकारिक सरकारी आंकड़ों में 230 बताया जाता है. मानवाधिकार संगठनों के मुताबिक लगभग 1,500 लोग मारे गए थे. उस दौरान भी ईरान में इंटरनेट सेवा बंद कर दिया गया था. यह आंदोलन ईंधन की कीमतों में अचानक वृद्धि से शुरू हुए विरोध प्रदर्शन जल्दी ही सर्वोच्च नेता को हटाने की मांग में बदल गया था.

 महसा अमीनी आंदोलन 2022–2023 : साल 2022 में महिला, जीवन, स्वतंत्रता या मानवाधिकार को लेकर हुए महसा अमीनी आंदोलन के दौरान भी सैकड़ों की संख्या में लोग मारे गए. इस आदोलन में महिलाओं को ईरानी सत्ता ने जमकर जुल्म ढाए थे. मानवाधिकार समूहों ने कम से कम 551 मौतों की पुष्टि की. इनमें दर्जनों महिलाएं और बच्चे शामिल थे. यह आंदोलन पुलिस हिरासत में महसा अमिनी की मौत के बाद शुरू हुआ था. यह आंदोलन सभी 31 प्रांतों में फैल गया था.

 ईरानी विरोध प्रदर्शन 2025-2026 : देशव्यापी अशांति की मौजूदा लहर जो 28 दिसंबर 2025 को शुरू हुई थी, को 1979 के बाद से इस्लामिक गणराज्य के लिए सबसे बड़ी और सबसे घातक चुनौती बताया जा रहा है. यह आंदोलन आर्थिक संकट और उच्च मुद्रास्फीति के कारण शुरू हुआ. यह आंदोलन एक व्यापक राजनीतिक चुनौती में बदल गया है. इसमें शासन परिवर्तन की मांग प्रदर्शनकारी कर रहे हैं. ईरान में आंदोलन की वजह से इंटरनेट सेवा ठप है. प्रदर्शनकारियों को गोलियों का इस्तेमाल कर रोका जा रहा है. सरकार का यह भी कहना है कि विरोध प्रदर्शनों के पीछे विदेशी दखल है. यह 1979 की क्रांति के बाद ईरान के शासन सिस्टम के खिलाफ प्रदर्शनों का सबसे नया दौर है, जिसने शाह को हटा दिया था और एक इस्लामिक रिपब्लिक की शुरुआत की थी.

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