अर्थव्यवस्था की चर्चा, पर्दे के पीछे कुछ और! दावोस समिट में 4000% तक क्यों बढ़ी S*# वर्कर की मांग?
दावोस समिट 2026 के दौरान एक निजी सेवा की मांग 4000% बढ़ने का दावा. अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट्स ने समिट के ऑफ-स्टेज खर्च और गतिविधियों पर सवाल खड़े किए.;
स्विट्ज़रलैंड के दावोस में जब विश्व आर्थिक मंच के दौरान दुनिया की अर्थव्यवस्था, युद्ध, जलवायु और निवेश पर मंथन चल रहा था, उसी समय शहर का एक दूसरा चेहरा भी अंतरराष्ट्रीय मीडिया की नजर में आ गया. समिट के दिनों में होटल, रेस्तरां और निजी सेवाओं में असामान्य गतिविधियों की चर्चा होने लगी. रिपोर्ट्स में दावा किया गया कि सम्मेलन के दौरान कुछ खास सेवाओं की मांग अचानक कई गुना बढ़ गई, जिसने आधिकारिक एजेंडे से हटकर नई बहस छेड़ दी.
दावोस समिट आमतौर पर राष्ट्राध्यक्षों और कॉर्पोरेट दिग्गजों की वजह से खबरों में रहता है, लेकिन इस बार पर्दे के पीछे की गतिविधियों ने भी ध्यान खींचा. अंतरराष्ट्रीय मीडिया में ऐसी खबरें सामने आईं कि समिट के दौरान शहर में निजी और एस्कॉर्ट सेवाओं की मांग में असाधारण उछाल देखा गया. बताया गया कि यह उछाल सिर्फ संयोग नहीं, बल्कि समिट के सबसे व्यस्त दिनों से सीधे जुड़ा हुआ था.
4,000 फीसदी तक बढ़ी मांग
स्विट्ज़रलैंड स्थित एक एरॉटिक सर्विस प्लेटफॉर्म के आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा गया कि समिट के उद्घाटन वाले दिन, 19 जनवरी को, इन सेवाओं की मांग में करीब 4,000 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी दर्ज की गई. प्लेटफॉर्म के अनुसार, दुनिया भर से आए प्रतिनिधियों और आगंतुकों की दिलचस्पी अचानक बहुत तेज़ी से बढ़ी. यह आंकड़ा अपने आप में चौंकाने वाला बताया जा रहा है.
खर्चों को लेकर भी उठे सवाल
कुछ रिपोर्ट्स में यह भी दावा किया गया कि समिट के दौरान इन सेवाओं पर भारी रकम खर्च की गई. एक उदाहरण में कहा गया कि एक प्रतिभागी ने चार दिनों में पांच महिलाओं के साथ समय बिताने के लिए लाखों रुपये के बराबर राशि खर्च की. हालांकि, इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन इतनी बड़ी रकम की चर्चा ने दावोस समिट के खर्चीले पक्ष पर सवाल जरूर खड़े कर दिए.
अलग-अलग प्रोफाइल, एक जैसी मांग
इन खबरों में यह भी सामने आया कि इस मांग में सिर्फ पेशेवर लोग ही शामिल नहीं थे. रिपोर्ट्स के मुताबिक, छात्रों, शिक्षकों, यात्रियों और यहां तक कि संपन्न कारोबारी वर्ग के लोग भी अतिरिक्त आय के लिए ऐसी सेवाओं से जुड़े नजर आए. खासतौर पर उन दिनों में मांग ज्यादा रही, जब समिट का कार्यक्रम अपने चरम पर था और शहर पूरी तरह भरा हुआ था.
दावोस की दो तस्वीरें, एक बड़ा सवाल
एक तरफ दावोस समिट दुनिया के भविष्य पर चर्चा का मंच बना, तो दूसरी तरफ शहर में चल रही इन गतिविधियों ने एक अलग ही बहस को जन्म दिया. सवाल यह उठ रहा है कि क्या ऐसे वैश्विक आयोजनों के साथ यह सब अनिवार्य रूप से जुड़ा हुआ है, या फिर यह सिर्फ अतिरंजित रिपोर्टिंग है. फिलहाल इतना तय है कि इस बार दावोस सिर्फ नीतियों और अर्थव्यवस्था के लिए नहीं, बल्कि अपनी ‘अनदेखी’ कहानी के लिए भी याद किया जाएगा.