साल 1951 में असम के मुख्यमंत्री बने विष्णु राम मेधी अपने गांव हाजो लौटे तो उन्होंने साधारण जीवन जीते हुए लोगों को दिखाया कि सच्चा नेता सत्ता का नहीं, जनता का होता है. मिट्टी के आंगन में दरी बिछाकर बैठा मेधी अपने साधारण धोती और शांत चेहरे के साथ जनता के बीच मौजूद रहे. 1964 में मद्रास के राज्यपाल रहते हुए उन्होंने निजी संपत्ति, धन और गहनों से परहेज़ किया और अपनी अधिकांश संपत्ति समाज को दान कर दी. राजनीति उनके लिए कमाई का जरिया नहीं, बल्कि त्याग और सेवा का माध्यम थी. यही कारण है कि इतिहास उन्हें सिर्फ नेता नहीं, बल्कि त्याग और ईमानदारी का प्रतीक मानता है.