जिस घर को इंसान सालों की मेहनत, खून-पसीने की कमाई और छोटी-छोटी बचत जोड़कर खड़ा करता है, जब वही घर कुछ घंटों में मलबे में बदल जाए, तो दर्द सिर्फ दीवारों का नहीं होता - पूरी ज़िंदगी का होता है. दिल्ली से सटे आली गांव में चला बुलडोजर इसी हकीकत को बयां कर रहा है. जहां कल तक बच्चों की हंसी थी, वहां आज टूटे दरवाज़े, बिखरा सामान और लाचार आंखें हैं. लोग सवाल पूछ रहे हैं - क्या नोटिस का समय काफी था, क्या कोई दूसरा रास्ता नहीं था? देखिए जीतेंद्र चौहान की ग्राउंड रिपोर्ट.