संतोष गंगवार की बेटी के अलावा क्या है श्रुति की पहचान, जिन्हें राज्यसभा भेज रही BJP, मिशन 2027 में कहां और कैसे हो रहीं फिट?
संतोष गंगवार की बेटी श्रुति गंगवार की राज्यसभा एंट्री से BJP की 2027 रणनीति, बरेली-रुहेलखंड की राजनीति और Kurmi समीकरण फिर चर्चा में हैं.
उत्तर प्रदेश में 2027 की सियासी बिसात बिछने लगी है और बीजेपी के हर फैसले को अब चुनावी चश्मे से देखा जा रहा है. ऐसे में राज्यसभा के लिए श्रुति गंगवार का नाम सामने आना सिर्फ एक टिकट की कहानी नहीं है. बरेली के पुराने सियासी घराने से आने वाली श्रुति को बीजेपी ने ऐसे समय आगे बढ़ाया है, जब पार्टी के सामने गैर-यादव OBC समीकरण को मजबूत रखने और सपा के PDA नैरेटिव का मुकाबला करने की चुनौती है. कुर्मी समाज, महिला प्रतिनिधित्व, नई पीढ़ी और संतोष गंगवार की राजनीतिक विरासत- क्या इन चारों समीकरणों को एक साथ साधने की कोशिश है श्रुति गंगवार?
क्या गंगवार परिवार की पकड़ सिर्फ कुर्मी वोटरों तक?
श्रुति गंगवार की राज्यसभा एंट्री के साथ एक पुराना सवाल फिर चर्चा में है- क्या संतोष गंगवार की राजनीतिक विरासत अब भी बरेली और रुहेलखंड के कुर्मी मतदाताओं को प्रभावित करती है? बरेली, पीलीभीत, बदायूं, शाहजहांपुर और रामपुर के कुछ हिस्सों में गंगवार-कुर्मी समुदाय की मौजूदगी रही है. राजनीतिक आकलनों में बरेली लोकसभा क्षेत्र में करीब 3.5 लाख गंगवार मतदाताओं का अनुमान लगाया गया है.
किन विधानसभा सीटों पर दिख सकता है असर?
बरेली लोकसभा क्षेत्र की बरेली शहर, बरेली कैंट, नवाबगंज, मीरगंज और भोजीपुरा सीटों में गंगवार-कुर्मी मतदाताओं की मौजूदगी लंबे समय से राजनीतिक चर्चा का विषय रही है. इसके अलावा बहेड़ी, पीलीभीत और आसपास के इलाकों में भी कुर्मी मतदाताओं का प्रभाव माना जाता है. रामपुर के मिलक और बिलासपुर में भी गंगवार समुदाय की महत्वपूर्ण मौजूदगी का उल्लेख शोध अध्ययनों में मिलता है.
यूपी में कितनी है कुर्मी आबादी, और कितना असर?
उत्तर प्रदेश में कुर्मी आबादी का कोई हालिया आधिकारिक जातीय जनगणना आंकड़ा उपलब्ध नहीं है, इसलिए प्रतिशत का निश्चित दावा करना उचित नहीं होगा. लेकिन राजनीतिक रूप से कुर्मी समुदाय को राज्य के प्रमुख गैर-यादव OBC समूहों में गिना जाता है. बीजेपी की मौजूदा राज्यसभा सूची में श्रुति गंगवार को कुर्मी चेहरे के तौर पर शामिल किए जाने को 2027 से पहले इस सामाजिक समूह तक पार्टी की पहुंच मजबूत करने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है.
क्या बाप की विरासत का लाभ बेटी को भी मिलेगा?
यह सबसे बड़ा सवाल है. 2024 में संतोष गंगवार का टिकट काटे जाने के बाद बरेली और आसपास के कुर्मी समर्थकों में नाराजगी की रिपोर्ट सामने आई थी, लेकिन बीजेपी ने बरेली सीट जीत ली.
ऐसे में क्या परिवार की पुरानी सामाजिक पकड़ अब भी उतनी ही प्रभावी है, या श्रुति को अपनी अलग राजनीतिक स्वीकार्यता बनानी होगी? फिलहाल इतना जरूर है कि बीजेपी ने श्रुति के जरिए गंगवार परिवार, महिला नेतृत्व और कुर्मी OBC समीकरण को एक साथ राजनीतिक मंच दिया है.
श्रुति गंगवार कौन हैं, BJP ने क्यों लगाया दांव?
क्या श्रुति गंगवार सिर्फ पूर्व केंद्रीय मंत्री संतोष गंगवार की बेटी हैं या बीजेपी ने उनके जरिए यूपी की राजनीति में एक बड़ा सामाजिक और क्षेत्रीय संदेश देने की कोशिश की है? राज्यसभा के लिए श्रुति गंगवार का चयन 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले बीजेपी की रणनीति से जोड़कर देखा जा रहा है. बरेली और रुहेलखंड की राजनीति में गंगवार परिवार की पुरानी पकड़ है और इसी विरासत को अब पार्टी नए सियासी चेहरे के साथ आगे बढ़ाना चाहती है.
श्रुति की अपनी पहचान क्या?
श्रुति गंगवार बीजेपी के वरिष्ठ नेता और बरेली से लंबे समय तक सांसद रहे संतोष कुमार गंगवार की बेटी हैं. संतोष गंगवार बरेली से आठ बार लोकसभा सांसद रहे और केंद्र सरकार में मंत्री भी रहे. श्रुति ने इंजीनियरिंग और मैनेजमेंट की पढ़ाई की है और राजनीति में आने से पहले कॉरपोरेट और सामाजिक क्षेत्र में सक्रिय रही हैं. वह बरेली अर्बन कोऑपरेटिव बैंक की चेयरपर्सन भी रह चुकी हैं. बीजेपी संगठन में उनकी सक्रियता को भी पार्टी के भीतर उनके बढ़ते राजनीतिक कद के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है.
कुर्मी वोट और OBC समीकरण पर बीजेपी की नजर?
श्रुति गंगवार के चयन का सबसे अहम पहलू उनका सामाजिक समीकरण है. वह कुर्मी समाज से आती हैं और उत्तर प्रदेश की राजनीति में कुर्मी समुदाय प्रभावशाली गैर-यादव OBC समूहों में माना जाता है. बीजेपी लंबे समय से गैर-यादव OBC वोट बैंक को अपने साथ बनाए रखने की रणनीति पर काम करती रही है. ऐसे में श्रुति को राज्यसभा भेजकर पार्टी क्या 2027 से पहले कुर्मी समाज को राजनीतिक प्रतिनिधित्व का संदेश देना चाहती है?
खासकर 2024 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को जिन सामाजिक समूहों में नुकसान हुआ, उन्हें दोबारा अपने पाले में लाने की कोशिश के तौर पर भी इस फैसले को देखा जा रहा है.
बरेली से रुहेलखंड तक कितना असर?
श्रुति गंगवार का सबसे मजबूत राजनीतिक आधार बरेली और आसपास का रुहेलखंड क्षेत्र माना जा रहा है. बहेड़ी विधानसभा क्षेत्र में उनकी राजनीतिक सक्रियता का भी जिक्र होता रहा है. गंगवार परिवार की पुरानी राजनीतिक पहचान बरेली के साथ-साथ आसपास के क्षेत्रों में भी है.
यही वजह है कि बीजेपी के लिए श्रुति केवल राज्यसभा की एक उम्मीदवार नहीं, बल्कि आने वाले विधानसभा चुनाव के लिए एक संभावित क्षेत्रीय चेहरा भी हो सकती हैं. हालांकि अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि उनका प्रभाव सीधे तौर पर किसी खास विधानसभा सीट के चुनावी परिणाम को बदल सकता है.
2024 के बाद गंगवार परिवार को साधने की कोशिश?
बीजेपी ने 2024 के लोकसभा चुनाव में संतोष गंगवार को बरेली से टिकट नहीं दिया था. उनकी जगह छत्रपाल सिंह गंगवार को मैदान में उतारा गया. इसके बाद संतोष गंगवार को झारखंड का राज्यपाल बनाया गया और अब उनकी बेटी को राज्यसभा भेजने का फैसला सामने आया है. ऐसे में क्या बीजेपी गंगवार परिवार के राजनीतिक प्रभाव को फिर से सक्रिय करना चाहती है? राजनीतिक तौर पर यह संदेश महत्वपूर्ण है कि पार्टी ने पुराने प्रभावशाली परिवार को पूरी तरह किनारे करने के बजाय नई पीढ़ी को जिम्मेदारी देने का रास्ता चुना है.