साध्वी प्रेम बाईसा को अग्नि अंतिम संस्कार की जगह क्यों दी गई समाधि? शोक में डूबा राजस्थान; व्यापारियों ने सम्मान में बंद किया बाजार
राजस्थान की प्रसिद्ध कथावाचक साध्वी प्रेम बाईसा के निधन ने पूरे प्रदेश को शोक में डुबो दिया है. 28 जनवरी 2026 को जोधपुर स्थित आश्रम में जुकाम-बुखार के इलाज के दौरान लगाए गए इंजेक्शन के बाद उनकी तबीयत अचानक बिगड़ गई और अस्पताल ले जाते समय उन्हें मृत घोषित कर दिया गया. उनकी मौत को लेकर मेडिकल लापरवाही, एलर्जिक रिएक्शन और साजिश जैसे सवाल उठ रहे हैं.;
Sadhvi Prem Baisa Death : साध्वी प्रेम बाईसा के निधन ने सभी को हिला के रख दिया है. वह राजस्थान की एक बहुत प्रसिद्ध और सम्मानित कथावाचक थी. वे हिंदू धर्मग्रंथों जैसे रामायण, महाभारत, भागवत पुराण आदि पर बहुत ही सरल और प्रभावशाली ढंग से प्रवचन देती थी. उनकी आवाज़ मीठी थी, ज्ञान गहरा था और लाखों लोग उनकी कथाओं को सुनने के लिए इकट्ठा होते थे. खासकर पश्चिमी राजस्थान में उनकी बहुत बड़ी भक्तों की संख्या थी. वे न सिर्फ धार्मिक प्रवचन देती थीं, बल्कि समाज में नशामुक्ति, महिलाओं की शिक्षा और परिवार के मूल्यों पर भी जोर देती थी. बचपन से ही उन्होंने साधु जीवन अपनाया था और संत परंपरा में रहकर तप, त्याग और सेवा का जीवन जिया.
अब बात करते हैं कि उनके अंतिम संस्कार की तो उन्हें समाधि दी गई. हिंदू संत परंपरा में जब कोई सच्चा संत, साधु या साध्वी देह त्याग करता है, तो उनकी अंतिम यात्रा को सामान्य लोगों की तरह दाह-संस्कार (अग्नि में जलाना) नहीं किया जाता. इसके बजाय उन्हें समाधि दी जाती है. समाधि का मतलब है - शरीर को जमीन में दफनाना या एक विशेष जगह पर रखकर उस पर समाधि स्थल बनाना. यह इसलिए किया जाता है क्योंकि संतों को माना जाता है कि वे जीते जी ही ईश्वर में लीन हो जाते हैं. उनकी मृत्यु को 'देह त्याग' या 'समाधि लेना' कहा जाता है, न कि साधारण मौत. यह एक सम्मानजनक और पवित्र रिवाज है, जो बताता है कि वह व्यक्ति सांसारिक बंधनों से मुक्त होकर परमात्मा में विलीन हो गया है.
परंपरा के अनुसार दी गई समाधि
साध्वी प्रेम बैसा को भी ठीक इसी परंपरा के अनुसार समाधि दी गई. उनका अंतिम संस्कार और समाधि समारोह 30 जनवरी 2026 को उनके पैतृक गांव पारेउ (जिला बालोतरा, राजस्थान) में शिव शक्ति धाम में हुआ. यह जगह उनके परिवार और भक्तों के लिए बहुत महत्वपूर्ण थी. समारोह में बड़ी संख्या में साधु-संत, भक्त और स्थानीय लोग शामिल हुए. पूरा गांव शोक में डूबा हुआ था- बाजार बंद रहे, लोग रात भर भजन-कीर्तन करते रहे और अंतिम दर्शन के लिए लंबी कतारें लगीं. यह सब दिखाता है कि समाज उन्हें कितना सम्मान देता था. संत परंपरा में समाधि देना एक तरह से यह संदेश भी देता है कि संत कभी मरते नहीं, वे तो बस शरीर छोड़कर ईश्वर के साथ एकाकार हो जाते हैं इसलिए उनके समाधि स्थल पर लोग आगे भी पूजा-अर्चना और श्रद्धा व्यक्त करते रहेंगे.
मौत पर उठे सवाल
उनकी मौत के बारे में बहुत सारे सवाल उठे हैं. 28 जनवरी 2026 को जोधपुर के उनके आश्रम में उन्हें जुकाम-बुखार की शिकायत हुई. परिजनों ने एक कंपाउंडर को बुलाया, जिसने इंजेक्शन लगाया. बताया जाता है कि इंजेक्शन लगने के महज 5 मिनट या 30 सेकंड बाद ही उनकी हालत बहुत बिगड़ गई. अस्पताल ले जाते समय वे बेहोश हो गईं और डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया. कुछ लोग इसे गलत इंजेक्शन, मेडिकल लापरवाही या एलर्जिक रिएक्शन बताते हैं. वहीं कुछ लोग साजिश या अन्य कारणों की बात करते हैं. मौत के चार घंटे बाद उनके इंस्टाग्राम अकाउंट से एक पोस्ट आई, जिसमें न्याय की मांग और 'अग्नि परीक्षा' का जिक्र था. यह पोस्ट उनके पिता ने स्टाफ से करवाई बताई है, लेकिन इससे मामला और उलझ गया. पहले भी एक वायरल वीडियो जिसे AI से बनाया गया बताया गया, ने उन्हें परेशान किया था, जिसमें उनके चरित्र पर सवाल उठाए गए थे. पुलिस ने पोस्टमॉर्टम कराया और जांच शुरू की है, लेकिन अभी तक मौत का सटीक कारण सामने नहीं आया है. जांच में हर पहलू देखा जा रहा है - इंजेक्शन क्या था, कंपाउंडर योग्य था या नहीं, कोई लापरवाही हुई या कुछ और.